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इंदौर में 55 साल बाद जी उठी 'सरस्वती':जिस नदी के पास से लोग गंदगी के कारण निकलना भी पसंद नहीं करते थे, वह नाला टैपिंग से इतनी साफ हो गई कि अब तैरने लगीं मछलियां

इंदौर10 दिन पहले
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सरस्वती नदी में ऑक्सीजन मिलने से अब मछलियां तैरने लगी हैं। - Dainik Bhaskar
सरस्वती नदी में ऑक्सीजन मिलने से अब मछलियां तैरने लगी हैं।

एक ओर जहां हम ऑक्सीजन के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। उसी के बीच इंदौर में एक सुखद खबर आई है। गंदगी से सराबोर सरस्वती नदी में अब ऑक्सीजन मिलने लगी है। इसी का ताजा उदाहरण है कि यहां के पानी में अब बड़ी संख्या में मछलियां तैरती दिखने लगी हैं। ऐसा नजारा यहां पर 55 साल पहले शहरवासियों को देखने को मिलता था। यह सब संभव केवल 100 फीसदी नाला टैपिंग और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के कारण हो पाया है।

मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालय ने तीन दिन पहले यहां के पानी के सैंपल टेस्ट के लिए दिए थे। उनकी सोमवार को रिपोर्ट आई तो जो आंकड़े सामने आए वे चौंकाने वाले थे। इसमें घुलित ऑक्सीजन की मात्रा एक दम से 4.3 मिलीग्राम प्रति लीटर दर्ज की गई। पानी में ऑक्सीजन मिलने के कारण ही मछलियां तैरती मिल रही हैं।

सरस्वती नदी के हरसिद्धी वाले क्षेत्र में मछलियाें के तैरने की सूचना मिलने पर तीन दिन पहले प्रदूषण विभाग का अमला पानी की टेस्टिंग करने पहुंचा। इसकी रिपोर्ट आई तो उसमें पता चला कि पानी इतना साफ हो गया है कि उसमें ना केवल ऑक्सीजन मिलने लगी है, बल्कि इतनी ऑक्सीजन मिलने लगी है कि मछलियां जिंदा रह सकें।

इस रिपोर्ट में पांच अलग-अलग तरह के मानकों में भी काफी सुधार देखने को मिला है। सबसे पहले जहां पीएच लेवल बढ़ा तो सस्पेंडेड सॉलिड भी काफी कम हो गए। इसके अलावा बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड भी केवल 6 ही रह गई। यह अगर 3 हो जाती है तो यहां का पानी नहाने योग्य हो जाएगा।

मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालय ने तीन दिन पहले यहां के पानी के सैंपल टेस्ट के लिए दिए थे।
मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालय ने तीन दिन पहले यहां के पानी के सैंपल टेस्ट के लिए दिए थे।

इसके अलावा केमिकल ऑक्सीजन डिमांड भी काफी कम आई है। असल में इन सभी पांच तत्वों की तुलना दिसंबर 2020 में आई रिपोर्ट के आधार पर की जा रही है। तब की रिपोर्ट में ऑक्सीजन थी ही नहीं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह कि अगर कुछ सुधार और किए गए तो यहां के पानी का पीएच लेवल भी नर्मदा नदी के पानी के पीएच लेवल के करीब पहुंच सकता है। अब प्रदूषण विभाग की तरफ से यहां के पानी की टेस्टिंग प्रतिमाह की जाएगी। यहां पर 10 एमएलडी की क्षमता वाला एसटीपी भी फरवरी व मार्च से ही शुरू हुआ है।

नाला टैपिंग और एसटीपी बड़ी वजह
सरस्वती नदी के कुछ हिस्से में ऑक्सीजन मिलने के सुखद समाचार के बाद अब बाकी के हिस्से को भी दिखवाया जा रहा है। साफ पानी और उसमें ऑक्सीजन मिलने की मुख्य वजह की बात करें तो यह सब संभव केवल 100 फीसदी नाला टैपिंग और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के कारण हो पाया है।

हरसिद्धि क्षेत्र में 10 एमएलडी की क्षमता वाला एसटीपी फरवरी और मार्च से ही शुरू हुआ है। इसी तरह नदी के किनारे बाकी जगहों पर भी एसटीपी शुरू करने से इसके अधिकतर हिस्सों में साफ पानी मिलने लगा है। अब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इसके अलग-अलग हिस्सों की नियमित रूप से मॉनिटरिंग करेगा और इसकी रिपोर्ट भोपाल मुख्यालय भी भेजेगा।

हरसिद्धी पर सरस्वती नदी के पानी की स्थिति

तत्वदिसंबर 2020मई 2021
पीएच7.647.83
सस्पेंडेड सॉलिड2210
घुलित ऑक्सीजननहीं4.3
बीओडी2006
सीओडी6028

ऐसे समझ सकते हैं तत्वों के आंकडों को

  • पीएच- पानी का पीएच लेवल जितना ज्यादा होगा, पानी उतना ज्यादा अच्छा व पीने योग्य होगा।
  • सस्पेंडेड सॉलिड- ये वे कण होते हैं जो कि पानी मे तैरते रहते हैं, जिसके कारण पानी मठमैला दिखता है।
  • घुलित ऑक्सीजन - नदी के पानी में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा 4 मिग्रा/ लीटर से अधिक होने पर ही मछलियां के जीवित रहने की स्थितियां निर्मित हो जाती हैं।
  • बीओडी - बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड की मात्रा 3 मिग्रा/लीटर से कम होने पर पानी नहाने योग्य माना जाता है।
  • सीओडी - नदी जल में केमिकल ऑक्सीजन डिमांड की मात्रा सामान्यतः 10 से 30 मिग्रा/लीटर पाई जाती है। रासायनिक प्रदूषण बढ़ने के साथ केमिकल ऑक्सीजन डिमांड की मात्रा बढ़ जाती है। (यह जानकारी सीपीसीबी के मुताबिक)

यह शुभ संकेत
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड साइंटिस्ट डॉ. दिलीप वाघेला का कहना है कि यहां के पानी में ऑक्सीजन का मिलना काफी अच्छा संकेत है। अब हर महीने पानी की टेस्टिंग की जाएगी और इसकी शुद्धता को लेकर नियमित तौर पर मॉनिटरिंग की जाएगी।

55 साल पहले दिखती थीं मछलियां
पर्यावरणविद् ओपी जोशी का कहना है कि 1965-66 में हायर सेकंडरी की थी। तब ओल्ड जीडीसी के आगे लालबाग का पुल बना हुआ है। वहीं पर क्रिकेट खेलने के बाद नदी के किनारे हाथ-पैर धोने आते थे। तब हमें इसमें मछलियां तैरती दिखाई देती थीं।

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