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कैलाश विजयवर्गीय को फिर महासचिव बनाने के मायने:पार्टी में चली अटकलों को लगा विराम, बंगाल की तरह किसी अन्य राज्य की मिल सकती है जिम्मेदारी

इंदौर9 दिन पहले

भाजपा ने कैलाश विजयवर्गीय को एक बार फिर राष्ट्रीय कार्यसमिति में महासचिव की जिम्मेदारी दी है। गुरुवार दोपहर तक विजयवर्गीय की अगली भूमिका को लेकर जो कयास लगाए जा रहे थे, उन पर विराम लग गया है। यह भी स्पष्ट हो है कि पार्टी उन्हें अब चुनाव नहीं लड़ाना चाहती। पहले उन्हें पश्चिम बंगाल चुनाव की जिम्मेदारी दी गई थी। आने वाले चुनाव में फिर उन्हें किसी राज्य की जिम्मेदारी दी जा सकती है।

इस बार मध्यप्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में उन्हें भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री के लिए दावेदार भी कहा जा रहा था। जीत कांग्रेस की हो गई। इसके बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थकों के साथ कांग्रेस से भाजपा में आए तो कमलनाथ सरकार गिर गई, तब दोबारा विजयवर्गीय को लेकर अटकलें लगने लगीं, लेकिन पार्टी ने शिवराज सिंह चौहान को ही मध्यप्रदेश की बागडोर सौंपी।

इसके पूर्व लोकसभा चुनाव के दौरान जब शंकर लालवानी का नाम तय नहीं हुआ था, तब भी उनके समर्थकों को विश्वास था कि विजयवर्गीय को इंदौर से लोकसभा चुनाव लड़ाया जा सकता है। तब विजयवर्गीय के पास पश्चिम बंगाल की जिम्मेदारी थी। हालांकि, एक-दो मौके पर उन्होंने यह भी कहा था कि पार्टी जो आदेश देगी, उसका पालन करेंगे। टिकट लालवानी को मिला और उन्होंने 5 लाख से ज्यादा मतों से जीत दर्ज कर अपनी जगह मजबूत बना ली।

पश्चिम बंगाल के चुनावी समीकरण
पश्चिम बंगाल में चुनाव के पहले तृणमूल कांग्रेस के कई विधायक भाजपा में आ गए और इससे भी विजयवर्गीय का कद बढ़ा। चुनाव में भाजपा की हार के बावजूद विजयवर्गीय का मजबूत पक्ष यह था कि कई हारी हुई सीटों पर वोटों का अंतर बहुत कम था। इस बीच स्मृति ईरानी को भी पश्चिम बंगाल भेजा गया। इस तरह के समीकरणों के बीच पार्टी में विजयवर्गीय की अगली भूमिका को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई जाने लगी।

इधर, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार बनते ही तृणमूल से भाजपा में आए विधायकों ने फिर अपना पाला बदला और ममता सरकार के साथ हो गए। इस तरह उतार-चढ़ाव के बीच विजयवर्गीय की भूमिका को लेकर सवाल उठने लगे। वैसे कुछ समय पहले ही पार्टी के एक धड़े ने यह भी प्रचारित किया कि राज्यसभा की एक सीट के लिए होने जा रहे उपचुनाव में मप्र कोटे से विजयवर्गीय का नाम तय किया जा सकता है, लेकिन पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति ने डॉ. एल मुरुगन के नाम पर मोहर लगा दी, जो अब केंद्र में सूचना प्रसारण मंत्री है।

हाल ही में कई नेताओं की घनिष्ठता से भी जोड़ा
वैसे पश्चिम बंगाल के चुनाव के बाद विजयवर्गीय की मध्यप्रदेश में ज्यादा सक्रियता रही। खासकर इंदौर में। इस दौरान केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, नरेंद्र सिंह तोमर, प्रदेश के गृृहमंत्री व इंदौर के प्रभारी मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने इंदौर आगमन पर उनके निवास पर भेंट की और खाना भी किया। तोमर तो हाल ही में विजयवर्गीय के एक पारिवारिक कार्यक्रम में भी शामिल हुए। इस बीच केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के इंदौर के कार्यक्रम में भी विजयवर्गीय साथ थे। इस तरह इन मुलाकातों के कई अर्थ निकाले गए।

वैसे वर्तमान स्थिति में सांसद शंकर लालवानी व जल संसाधन मंत्री तुलसी सिलावट की इंदौर में ज्यादा सक्रियता है। यह सक्रियता कोरोनाकाल से ही है और इंदौर से जुड़ी उन्हीं की राय व निर्णय पार्टी स्तर पर लिए जा रहे हैं। इनके साथ भी अब स्थानीय अन्य नेता मधु वर्मा, पूर्व विधायक सुदर्शन गुप्ता की भी सिंधिया गुट से नजदीकी बढ़ती जा रही है।

स्थानीय मुद्दे पर सामने आया था दर्द
पिछले महीने ही विजयवर्गीय का दर्द तब सामने आया था, जब वे सुपर कॉरिडोर से एयरपोर्ट जा रहे थे। तब वहां घुटनों तक बारिश का पानी भरने को लेकर उन्होंने सोशल मीडिया पर तीखा पोस्ट डाला था। (पढ़िए- फेसबुुक पर कैलाश विजयवर्गीय का दर्द)। इस पर पार्टी में ही अंदरुनी प्रतिक्रिया थी कि राष्ट्रीय महासचिव को स्थानीय मुद्दे पर क्यों इस तरह का पोस्ट डालना पड़ा। बहरहाल, अब राजनीतिक समीकरण काफी बदल रहे हैं और अब यह तस्वीर स्पष्ट हो चुकी है कि विजयवर्गीय की मप्र की राजनीति में दखल नहीं होगा और उन्हीं कोई और जिम्मेदारी दी जाएगी।

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