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भागवत कथा:जिन मित्रों में प्रेम, समर्पण की भावना होती है वही मित्रता मजबूत होती है : पं. चतुर्वेदी

पेटलावद/बरवेट12 दिन पहले
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  • अंतिम दिन श्री कथावाचक ने कृष्ण सुदामा की मित्रता के बारे में बताया

जिन मित्रों में प्रगाढ़ प्रेम और समर्पण की भावना होती है। वही मित्रता मजबूत होती है। भगवान श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता में प्रगाढ़ प्रेम और समर्पण की भावना थी। कभी उनकी मित्रता को भुलाया नहीं जा सकता। आज के युग में मित्रता सिर्फ मतलब की रह गई है।

मतलब निकल जाने के बाद मित्रता भी तोड़ देते हैं। वर्तमान में कृष्ण और सुदामा जैसी मित्रता बहुत कम देखने को मिलती है, जिनमें प्रगाढ़ प्रेम और समर्पण की भावना हो वही सच्चे मित्र होते हैं। सच्चे मित्र वही जो एक दूसरे का सम्मान करें। यह बात भागवत वक़्ता पं. केशव चतुर्वेदी गड़ी भेसोला खाचरोद वाले ने कही।

वे ग्राम बावड़ी में चल रही भागवत कथा के अंतिम दिन श्री कृष्ण सुदामा की मित्रता के बारे में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि भगवान श्री कृष्ण ने सदैव प्रेम के वश में होकर अपने भक्तों व मित्रों की रक्षा की है। भक्त प्रेम से ही ईश्वर को अपने वश में कर सकता है।

मित्रता करने वाले व्यक्ति को मित्रता की सीख श्रीकृष्ण सुदामा की मित्रता से लेनी चाहिए। क्योंकि भगवान श्री कृष्ण ने मात्र दो मुट्ठी चावल के बदले अपने मित्र सुदामा को दो लोकों का स्वामी बना दिया था। दो मित्रो में मित्रता निष्काम भाव से होनी चाहिए। इसमें जाती पाती ऊंच-नीच का कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए।

उन्होंने कहा जिस मित्रता में छल कपट होता है उसका अंत बहुत बुरा होता है। भगवान श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता एक मिसाल है। श्रीकृष्ण सुदामा मित्रता की कथा का सार बताते हुए कहा कि मित्रता धनवान और निर्धनों में भी होती हैं। वह मित्रता तब मजबूत होती हैं जब एक मित्र दूसरे मित्र से बिना मतलब के मित्रता ओर निस्वार्थ भाव से एक दूसरे को सम्मान देने से होती हैं।

इंसान को ब्रह्म का ज्ञान होना जरूरी :

पं. चतुर्वेदी ने कहा सुदामा कि मित्रता में वह सम्मान और समर्पण था, जिसके कारण भगवान श्री कृष्ण को गरीब सुदामा के पैर धोने पर मजबूर कर दिया था। सुदामा भगवान श्री कृष्ण के प्रिय मित्र थे। जब भगवान से मिलने सुदामा द्वारका जाते है, तो श्रीकृष्ण उनसे मिलने के लिए नंगे पैर दौड़ पड़ते हैं।

सुदामा और श्रीकृष्ण की मित्रता के इस प्रसंग को सुनकर श्रद्धालु भाव विभोर हो गए। श्रद्धालुओं ने श्री कृष्ण और सुदामा का जयघोष किया, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। शास्त्री ने कहा ब्राह्मण कुल में जन्म लेने वाले इंसान को ब्रह्म का ज्ञान होना बहुत जरूरी है।

इसलिए ईश्वर की साधना में जीवन बिताना चाहिए। मानव देह में ईश्वर की प्रत्यक्ष अनुभूति ही ब्रह्म ज्ञान है। यदि हम भी इन कर्मों की बेड़ियों से निजात पाना चाहते हैं तो इसके लिए आवश्यकता है इस देह रूपी काया में प्रभु प्रकटीकरण की।

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