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  • 156 Years Old Is The History Of Unity, 350 Kg Silver Chariot, Then Both The Bundelkhandi Style Statues Are Adorned With 8 Kg Gold, 150 Kg Silver, Diamonds And Rubies.

नवरात्र में नगर सेठानियों की कहानी:बुंदेलखंडी शैली की मूर्तियों का 5 करोड़ के सोने-चांदी और हीरों से शृंगार, 350 किलो का है चांदी का रथ; सुरक्षा में 12 जवान

जबलपुर4 महीने पहलेलेखक: संतोष सिंह

पश्चिम बंगाल के बाद अगर नवरात्र का उत्सव देखना है तो मध्यप्रदेश के जबलपुर चले आइए। यहां की दो प्रतिमाओं को 5 करोड़ से ज्यादा सोने-चांदी, हीरा, माणिक और पन्ना से शृंगार किया गया है। बिंदी और नथ हीरे और माणिक के होते हैं। ये हैं सराफा की सुनरहाई और नुनहाई की प्रतिमाएं। इनकी सुरक्षा के लिए 24 घंटे के तीन शिफ्ट में 12-12 सशस्त्र गार्डों की ड्यूटी लगती है। नुनहाई 350 किलो चांदी के रथ से चल समारोह में निकलती हैं। दोनों मूर्तियों के गहनों की वजह से इन्हें नगर सेठानियां कहा जाता है। जानिए दोनों प्रतिमाओं के गहनों और उसके पीछे के इतिहास के बारे में...

सराफा में 156वें वर्ष में सुनरहाई की प्रतिमा स्थापित होती है। श्री दुर्गाउत्सव समिति सुनरहाई नंबर-1 के अध्यक्ष नवीन सराफ के मुताबिक नगर सेठानी के नाम से सुनरहाई मां को जाना जाता है। वर्ष 2020 में कोविड के चलते प्रतिमा स्थापित नहीं हो पाई थी, पर तब भी उनकी फोटो रखकर पूजन किया गया था।

सुनरहाई की प्रतिमा 156 वर्षों से स्थापित हो रही है।
सुनरहाई की प्रतिमा 156 वर्षों से स्थापित हो रही है।

कौमी एकता का प्रतीक है ये प्रतिमा
सुनरहाई की ये प्रतिमा कौमी एकता का प्रतीक है। समिति के अध्यक्ष नवीन सराफ के मुताबिक, देश विभाजन से पहले 1865-66 के आसपास यहां मुनीर अहमद नाम का मुस्लिम परिवार रहा करता था। उस परिवार की मां में अटूट आस्था थी। प्रतिमा स्थापना में परिवार भी शामिल होता था। आज भी उस परिवार की निशानी के तौर पर प्रतिमा के पीछे हरा कपड़ा लगाया जाता है। देश विभाजन के बाद ये परिवार पाकिस्तान चला गया, पर कौमी एकता की उस परंपरा को आज भी समिति ने सहेज कर रखा है। हर वर्ष आयोजन में 15-20 लाख रुपए खर्च होते हैं।

मां सुनरहाई की प्रतिमा का ढाई किलो सोना, 100 किलो चांदी, हीरा, माणिक जैसे रत्नों से श्रृंगार किया गया है।
मां सुनरहाई की प्रतिमा का ढाई किलो सोना, 100 किलो चांदी, हीरा, माणिक जैसे रत्नों से श्रृंगार किया गया है।

असली जेवर से होता है मां सुनरहाई की प्रतिमा का शृंगार
सुनरहाई मां का श्रृंगार असली सोने-चांदी के शस्त्र और जेवरों से किया जाता है। मां का त्रिशूल, तलवार, छत्र, तोरण पायल आदि में जहां 100 किलो से अधिक चांदी का उपयोग किया गया है। वहीं मां के हार, झुमके, बाजू बंद आदि में 2.50 किलो सोने के जेवरों का प्रयोग किया गया है। इसके अलावा उनकी नथ डायमंड की है, तो बिंदी माणिक व डायमंड से बनी है।

सशस्त्र बलों की रहती है पूरे नौ दिन तैनाती, कैमरे में कैद करने को आतुर रहती है श्रद्धालुओं की भीड़।
सशस्त्र बलों की रहती है पूरे नौ दिन तैनाती, कैमरे में कैद करने को आतुर रहती है श्रद्धालुओं की भीड़।

प्रतिमा के सारे जेवर भी बुंदेलखंडी शैली के हैं। हर शारदीय नवरात्र के प्रथम दिन मां की प्रतिमा की स्थापना होती है और विजयदशमी के दिन हनुमानताल तालाब में मां का विसर्जन किया जाता है। घाट पर ही जेवर उतार कर उसे लॉकर में सहेज दिया जाता है।

152 वर्षों से नुनहाई की प्रतिमा स्थापित हो रही है। मैसूर के बाद चांदी का दूसरा रथ जबलपुर में बना है।
152 वर्षों से नुनहाई की प्रतिमा स्थापित हो रही है। मैसूर के बाद चांदी का दूसरा रथ जबलपुर में बना है।

मैसूर के बाद जबलपुर में मां के लिए बना है चांदी का रथ
सुनरहाई के सामने वाली गली में 50 मीटर की दूरी पर नुनहाई की प्रतिमा भी 152 वर्षों से स्थापित हो रही है। नुनहाई दुर्गोत्सव समिति के अध्यक्ष विनित उर्फ पप्पू सोनी के मुताबिक, मैसूर के बाद जबलपुर में मां के लिए चांदी का रथ बनाया गया है। 350 किलो चांदी से निर्मित ये रथ 30 फीट लंबा, 12 फीट चौड़ा और 17 फीट ऊंचा है।

नुनहाई में स्थापित प्रतिमा भी बुंदेलखंडी शैली में और उसी के अनुरूप असली सोने-चांदी के से शृंगार किया गया है।
नुनहाई में स्थापित प्रतिमा भी बुंदेलखंडी शैली में और उसी के अनुरूप असली सोने-चांदी के से शृंगार किया गया है।

इस रथ में चांदी के ही 5 शेर भी बने हैं। चांदी की मां की चरण पादुका है। 4 किलो के लगभग सोने के हार, झुमके सहित अन्य जेवर हैं। वहीं 50 किलो से अधिक चांदी के बुंदेलखंडी शैली के जेवरों से मां का शृंगार किया गया है। यहां भी नथ में डायमंड तो बिंदी में डायमंड और माणिक का प्रयोग किया गया है।

मां की साड़ी की होती है हाथ से बुनाई
समिति से जुड़े सदस्यों की चार पीढ़ियां मां की प्रतिमा को स्थापित करते चले आ रहे हैं। नवरात्र के प्रथम दिन प्रतिमा लाई जाती हैं। फिर हाथ की बुनी साड़ी पहनाई जाती है। मां के शृंगार में चढ़ाए जाने वाले जेवर भी कई पीढ़ियों की निशानियों को समेटे हुए हैं। यहां भी सुरक्षा के लिए गार्ड लगाया गया है। विजयदशमी को मां का हनुमानताल में विसर्जन होता है।

सुनरहाई दुर्गा समिति के अध्यक्ष नवीन सराफ और नुनहाई दुर्गोस्तव समिति के अध्यक्ष विनित उर्फ पप्पू सोनी ने बताया दोनों नगर सेठानियों का इतिहास।
सुनरहाई दुर्गा समिति के अध्यक्ष नवीन सराफ और नुनहाई दुर्गोस्तव समिति के अध्यक्ष विनित उर्फ पप्पू सोनी ने बताया दोनों नगर सेठानियों का इतिहास।

स्ट्रांग रूम बनवाने की तैयारी
समिति जेवर व रथ को सुरक्षित रखने के लिए स्ट्रांग रूम बनवाने की तैयारी में जुटी है। समिति से जुड़े शरद सोनी और राजेश पंडा के मुताबिक, सप्तमी में यहां की महाआरती का अद्भुत नजारा होता है। दोनों ही प्रतिमाओं की एक झलक पाने के लिए पूरा शहर उमड़ रहा है।

इस बार 1500 प्रतिमाओं को अनुमति
इस बार जबलपुर में करीब 1500 प्रतिमाओं की स्थापना की गई है। इसमें से 93 काली मां की प्रतिमाएं हैं। यह आंकड़ा प्रशासन का है, जिन्हें अनुमति दी गई है।

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