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नेशनल फॉसिल्स पार्क में इतिहास के पन्ने:यहां 6.5 करोड़ साल पुराने जीवाश्म; करोड़ों वर्ष पुराने डायनासोर के अंडों, यूकेलिप्टस के जीवाश्म को सहेजने वाला देश का एकमात्र फॉसिल्स पार्क

डिंडौरी3 महीने पहले
पार्क में सहेजित कर रखे गए फॉसिल्स।

डिंडौरी जिले के शहपुरा से 14 किमी दूर स्थित राष्ट्रीय जीवाश्म उद्यान, घुघुवा में पेड़-पौधों के करोड़ों वर्ष पुराने जीवाश्म संरक्षित हैं। यहां यूकेलिप्टस, नारियल प्रजाति के जीवाश्म, डायनासोर के अंडों के जीवाश्म समेत कई पेड़-पौधों के जीवाश्म मौजूद हैं। घुघुवा पार्क देश का पहला जीवाश्म राष्ट्रीय उद्यान है, जहां करीब 6.5 करोड़ साल पुराने वृक्षों के जीवाश्मों को संरक्षित किया गया है।

इसकी खोज अविभाजित मंडला जिले के सांख्यिकीय अधिकारी एवं जिला पुरातत्व के मानद सचिव डाॅ. धर्मेन्द्र प्रसाद ने की थी। जबलपुर के आदर्श विज्ञान महाविद्यालय के प्राध्यापक डाॅ. एसआर इंगले और लखनऊ के बीरबल साहनी पुरावनस्पति विज्ञान संस्थान के डाॅ. एमबी बांडे ने जीवाश्मों का अध्ययन भी किया।

क्या जानकारी देते हैं ये जीवाश्म

यहां मौजूद जीवाश्म हमें करोड़ों वर्ष पहले इस जगह विद्यमान वनस्पतियों के बारे में जानकारी देते हैं। यहां इतने सारे पादप जीवाश्म का मिलना संकेत करता है, प्राचीन काल में यहां और आसपास के क्षेत्र में घने वन थे। फिर ज्वालामुखी विस्फोट जैसी भयंकर प्राकृतिक विपदा हुई होगी, जिसमें यह पौधे एक साथ मर गए। ये जीवाश्म हमें प्राचीन कालों में इस जगह की जलवायु और भौगोलिक स्थिति की जानकारी देते हैं।

6.5 करोड़ वर्ष पुराना अभिलेख

घुघुवा में मुख्यतः पौधों के जीवाश्म मिले हैं, जो करीब 6.5 करोड़ वर्ष पहले यानि मध्य जीवी महाकल्प के अंतिम व नूतन जीव महाकल्प के प्रारंभ के बीच के समय के हैं। अब तक घुघुवा में 18 पादप कुलों के 31 परिवारों के जीवाश्म खोजे जा चुके हैं। यहां के जीवाश्मों में ताड़ वृक्षों, यूकेलिप्टस, नारियल प्रजाति और द्विबीजपत्री पौधे शामिल हैं।

आश्चर्यजनक है, यहां पाए गए जीवाश्मों में बदल गए पादपों के कुछ जीवित प्रजाति आज भी मौजूद हैं। इनमें से कुछ पश्चिमी घाट, सिक्किम और उत्तर-पूर्वी भारत में उगते हैं, तो कुछ अफ्रीका, मेडागास्कर और आस्ट्रेलिया में। यहां सफेदा वृक्ष (यूकेलिप्टस) के जीवाश्म मिले हैं। यह वृक्ष आज भी आस्ट्रेलिया में मिलता है और वहीं का माना जाता है। घुघुवा में प्राप्त जीवाश्मों में बदल चुके अन्य पौधों में प्रमुख रूप से खजूर, केला, रूद्राक्ष, जामुन और आंवला भी शामिल हैं।

अधिकांश पौधों को पसंद है नमी

वनस्पति विज्ञान के अनुसार इनमें से अधिकांश पौधे नमी-पसंद हैं। इससे पता चलता है, 6.5 करोड़ साल पहले घुघुवा आज से कहीं अधिक नम क्षेत्र था। उस काल में यहां अत्यधिक बारिश होती थी। औसत वर्षा दो हज़ार मिलीमीटर या अधिक थी। उन दिनों घुघुवा की जलवायु उमस से भरी थी। यहां साल भर एक समान तापमान बना रहता था।

घुघुवा राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में मटका, देवरीखुर्द, पलासुंदर, तिलठर घाटी पहाड़ियां और छारगांव में शल्कधारी जीवों के भी कुछ जीवाश्म मिले हैं। ये बताते हैं, यहां पहले बड़ा जल-स्त्रोत रहा होगा। यहां मिले पौधे उत्तर क्रिटशस युग और पुराजीवी कल्प के हैं। निम्न क्रिटेशस युग के अंतिम चरण में खुले बीजों वाले पौधे (जैसे टेरिडोफाइट्‌स और जिम्नोस्पर्म्स) जो काफी समय से पृथ्वी पर छाए हुए थे। धीरे-धीरे समाप्त होने लगे और उनका स्थान पुष्पी पौधों ने ले लिया।

सदारहित वनों से आच्छादित था यह भू-भाग

जाे भूभाग में डिंडौरी स्थित है, वह करीब 6.5 करोड़ वर्ष पूर्व पश्चिमी घाट और उत्तर-पूर्वी भारत में आज जिस प्रकार के सदाहरित और अर्ध-सदाहरित वन है, उसी प्रकार के वनों से आच्छादित था। इससे साबित होता है, प्राचीन काल में भारत, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका सब विशाल भूखंड के अंग थे। उन सबमें एक ही प्रकार की वनस्पति का फैलाव था। पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति और कोटि-कोटि जीवधारियों में उसका पल्लवन 4.5 अरब वर्षों के सुदीर्घ काल में हुआ है। यदि किसी परिचित पैमाने से उसे न जोड़ा गया, तो इतने बड़े कालखंड की कल्पना करना लगभग असंभव हो जाएगी।

व्याख्या केंद्र में हर जानकारी

घुघुवा प्राचीन उद्यान के व्याख्या केंद्र में प्रदर्शित जीवोत्पत्ति घड़ी में इस बड़े कालखंड को 24 घंटे में संकुचित किया गया है। मनुष्य की उत्पत्ति दो लाख वर्ष पहले हुई थी, जो इस घड़ी के अनुसार मात्र दो मिनट पूर्व की घटना है। बता दें, घुघुवा उद्यान के भ्रमण के दौरान यहां स्थित व्याख्या केंद्र में अवश्य जाना चाहिए। यहां मिले जीवाश्मों के संबंध में विस्तृत जानकारी आकर्षक ढंग से दी गई है। बारिश के मौसम को छोड़कर यहां वर्ष भर जाया जा सकता है।

डिंडौरी से भीमशंकर साहू की रिपोर्ट

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