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भास्कर खास:लॉकडाउन में भुखमरी की कगार पर पहुंच गये 28 गाँवों के 1130 परिवारों के लिए देवदूत बने गाडरवारा के आठ युवा

नरसिंहपुरएक महीने पहले
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  • कोई सरकारी कारिंदा नहीं पहुंचा साढ़े आठ हजार भारिया आदिवासियों की खोज-खबर लेने
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गाडरवारा तहसील के जंगलों-पहाड़ों में दुर्गम स्थानों पर बसे 28 गांवों में 1460 भारिया आदिवासी परिवार रहते हैं। यहां की कुल जनसंख्या करीब साढ़े आठ हजार है। लॉक डाउन यहां के अधिकतर परिवारों के लिए कोरोना से बड़ा काल बन कर आया। शुक्र है कि एन वक्त पर कुछ युवा इन लोगों की खोज-खबर लेने वहां पर पहुंच गये। युवकों की टीम तो उन्हें मास्क और सेनेटाइजर देने के लिए गयी थी, पर पता चला कि  वहां तो खाने के लाले पड़ने वाले हैं। फिर क्या था वहां से लौटने के बाद युवकों ने आटा, दाल, चावल आदि की एक किट तैयार की और मोटरसाइकिल और घोड़े की मदद से 1130 परिवारों तक पहुँचाया।  दरअसल, अचानक घोषित लॉक डाउन से कारण साप्ताहिक बाजार बंद हो गये। परिणामस्वरूप आदिवासी लोग चिंरौजी, महुआ, शहद, मक्का, माहौर पत्ता, अमिया, कैरी, बांस, लठ, झाडू, बाबेर आदि वनोपज बेच ही नहीं पाये। और जब उनका सामान नहीं बिक पाया तो  अपने खाने-पीने के लिए आटा, दाल, चावल, तेल, मसाला, नमक, साबुन आदि भी नहीं खरीद सके। 

मार्च महीने के दूसरे पखवाड़े की शुरूआत में  बाजार से जो खरीद कर लाए थे, वह भी महीना बीतते-बीतते खत्म होने को आ गया। और खाने के लाले पड़ने लगे। घर में रखे शहद, मक्का, कैरी से तो पेट भरना नहीं था।

तीन नहीं दो माह का ही खाद्यान्न बँटा
नीचे वाले स्थानों माल्हनवाड़ा पुरवरिया, गोटीटोरिया, शाहपुर, निधोरा तथा सिलहटी जहां की राशन दुकानों से इन्हें अनाज मिलता था वहां से भी शासन की घोषणा अनुरूप तीन महीने का एक साथ राशन नहीं मिला। अप्रैल व मई महीने में दो किश्तों में मिला भी तो एक-एक किलो चावल और चार-चार किलो गेहूं। जहां सेल्समैन की मनमानी चल गई वहां केवल चावल भर बँटा। गेहूं की पिसाई की समस्या तो खाने के लिए बाकी सामान कहां से जुटाएं। इन स्थानों पर साल में एक-दो बार नजर आ जाने-वाले अफसर भी इन्हें नहीं दिखे। 
दर्द समझा तो सिर्फ युवा किसानों ने
इन आदिवासियों की के सामने मुँह बाये खड़े खाने के संकट को समझा पुरैना रन्धीर के किसान मुकेश बसेड़िया तथा गाडरवारा के उनके युवा किसान साथियों, प्रकाश दुबे, नेतराम कौरव, भूरा जाटव, कपिल शर्मा, जितेंद्र विश्वकर्मा, सुम्मि भरिया व गोरेलाल भरिया ने। पहले इन आदिवासियों को कोरोना के संक्रमण से बचाने ये लोग साढ़े 6 हजार मास्क और साबुन लेकर पहुंचे। कई लोगों ने मास्क तक नहीं लिया क्योंकि उन्हें लगता था कि इससे ही कोरोना होता है। बातों-बातों में पता चला कि यहां अधिकतर परिवारों के पास खाने के लिए आटा,दाल-चावल आदि है ही नहीं, किसी के पास कुछ बचा है तो केवल मक्का। 
ऐसे किया खाद्यान्न व अन्य सामग्री का इंतजाम
 मुकेश ने बताया कि अनाज तो बहुत था पर बाकी सामान की समस्या थी। लिहाजा सभी साथियों के सहयोग से करीब एक लाख रूपए का तेल, नमक, मिर्च, मसाला, साबुन आदि खरीदा गया। दस क्विंटल गेहूं का आटा पिसवाया गया और पांच कट्टी दाल तथा 2 क्विंटल चावल हमारी टीम द्वारा बाँटा गया। मोटर साइकिलों में पेट्रोल, घोड़ों का 350 रूपए प्रति फेरा प्रति किराया भी हम सबको वहन करना पड़ा। मुकेश कहते हैं कि घर का रखा अनाज लगा हो या बाजार से खरीदे गए सामान पर पैसा लगा हो, हम सबको खुशी है तो इस बात की कि हम उन लोगों की मदद करने में सफल रहे, जिन तक पहुंचने के पहले लोग कई बार सोचते हैं। टीम के सभी सदस्यों को सराहना प्रमाण पत्र वितरित करते हुए गाडरवारा एसडीएम राजेश शाह ने भी ये स्वीकारा कि वास्तव में ये लोग उन दुर्गम स्थानों तक मदद करने पहुंचे जहां सख्त लॉकडाउन के चलते प्रशासन भी नहीं पहुंच पा रहा था। (साथ में वारिज वाजपेयी)

वापस लौटे खाद्यान्न की किट लेकर

वापस लौट कर इन आठ युवा किसानों ने मशविरा किया और 5 किलो आटा, 2 किलो चावल, 1 किलो दाल,एक लीटर तेल, नमक, मिर्च-मसाला, बिस्किट, नहाने -धोने के साबुन के पैकेट (किट) बनाई और वापस सुदूर पहाड़ों पर बसे इन ग्रामों की ओर चल दिए। मुकेश और उनकी टीम के सदस्यों ने दर्जन भर ग्रामों में तीन मोटर साइकिलों से सामान पहुंचाया। तलैया, पटकना, बड़ागांव, बरियाढ़ाना, भिलमा ढ़ाना व भातौर जैसे पहाड़ की चोटी पर बसे ग्रामों तक पहुंचने 350 रूपए प्रति फेरा के हिसाब से गोटीटोरिया से घोड़े किराये पर लिए। और बिचला, रीछई जैसे ग्रामों में जहां घोड़े भी आगे नहीं बढ़ पा रहे थे, कंधे पर किट की बोरी रख कर पैदल ही तीन-चार किमी का सफर कर जरूरत का यह सामान पहुंचाया।  

... नहीं तो भूखों मरने की नौबत आ जाती
पटकना के काला भरिया, कुलसु भरिया, नन्हु भरिया ने बताया कि राशन दुकान गांव से 3 किलोमीटर दूर गोटीटोरिया में है, जहां से केवल चावल मिले। अन्य सामग्री बंद के दौरान खत्म हो गई। पुरैना गांव के पंडित जी और उनके साथियों की मदद से हमारे घरों में चूल्हे जले। बिच्छो भरिया व चमेली बाई के साथ तलैया के राम सिंह भरिया, राजू, महेश, मनोज व उद्दु भरिया ने बताया कि गांव के सभी परिवार मजदूरी करके और वनोपज बेच कर जीवन यापन करते हैं। हर हफ्ता चीचली या गोटीटोरिया के बाजार जाकर सामान लाते थे, बंद के कारण बड़ी समस्या बन गई थी। यदि हमें समय पर गाडरवारा के किसानों की मदद नहीं मिलती तो भूखों मरने की नौबत आ जाती।

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