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विज्ञापन का खेल:फर्जी साबित हो चुके सोलर डस्टबिन अभी भी बने हुए हैं कमाई का जरिया जिस घोटाले को पीएस ने पकड़ा उसे भी पी गए कमीशनबाज अधिकारी

जबलपुर5 महीने पहले
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  • 10 लाख का एक सोलर डस्टबिन दिखाया और लगाया 50 हजार का टीन का डिब्बा
  • सपने दिखाए थे कि डस्टबिन में होगी वाई-फाई सुविधा, मोबाइल चार्जिंग प्वाॅइंट, जीपीएस से कंट्रोलिंग
  • टेंडर निरस्त होने के बाद भी चल रहा विज्ञापन का खेल

एक साल से भी अधिक का समय हो चुका है जब 5 करोड़ के फर्जी सोलर डस्टबिन के टेंडर को निरस्त किया गया था, लेकिन अभी तक पूरे डस्टबिन निकाले नहीं जा सके हैं और एजेंसी संचालक जमकर कमाई कर रहा है। सबसे चौंकाने वाली बात तो यह है कि फर्जी सोलर डस्टबिन के खेल को खुद तत्कालीन प्रमुख सचिव संजय दुबे ने पकड़ा था। उन्होंने स्मार्ट सिटी कार्यालय मानस भवन के सामने लगे सोलर डस्टबिन को खोलकर देखा तो पता चला कि उसमें सूखा और गीला कचरा रखने अलग से कोई व्यवस्था ही नहीं है।

उन्होने जब टेंडर की शर्तों को देखा तो पता चला कि एक डस्टबिन की कीमत 10 लाख रुपए है और उसे स्मार्ट सोलर डस्टबिन के नाम पर लगाया जा रहा है। श्री दुबे ने तत्काल ही टेंडर निरस्त करने के निर्देश दिए और कहा था कि ये कबाड़ जितनी जल्दी हो सके निकाल दिए जाएँ, लेकिन उनके आदेश का पालन नहीं किया गया।

नगर निगम स्मार्ट सिटी लिमिटेड की ओर से सोलर डस्टबिन लगाने का ठेका 20 नवम्बर 2018 को एसएस कम्युनिकेशन प्रेस काॅम्प्लेक्स सिविक सेंटर को 10 सालों के लिए दिया गया था। इसके तहत शहर के 50 प्रमुख स्थानों पर सोलर डस्टबिन लगाने थे जिनमें सोलर प्लेट लगी हो, वाई-फाई सुविधा हो, मोबाइल चार्जर प्वाॅइंट हो।

जिन सोलर डस्टबिन को लगाया जाना था उनकी प्रति डस्टबिन कीमत करीब 10 लाख रुपए थी, क्योंकि वह पूरी तरह आधुनिक तकनीक के थे, बल्कि एजेंसी ने मॉडल के तौर पर उसी की फोटो अधिकारियों को दिखाई थी और उसका कोटेशन भी दिया था। इसके ठीक विपरीत ऐसे टीन के डिब्बे लगाए गए थे जो किसी काम के नहीं थे। वाई-फाई सुविधा तो छोड़िए उनमें सोलर प्लेट तक नहीं थी, जबकि नाम दिया गया था सोलर डस्टबिन।

ऐसे सामने आया था मामला
पिछले साल नगरीय विकास और आवास विभाग के प्रमुख सचिव रहे संजय दुबे शहर आए थे और उन्होंने एक डस्टबिन की जाँच की तब पूरा मामला उनकी समझ में आ गया। असली बोलकर नकली सोलर डस्टबिन लगाए गए थे जिनमें सूखा और गीला कचरा एक ही बिन में जाता था यानी उनमें दो खाने तक नहीं बने थे, जबकि बाहर से देखने पर ऐसा लगता था कि डस्टबिन में तीन खाने बने हैं। उन्होंने निगम अधिकारियों को तत्काल ही टेंडर निरस्त करने के आदेश दिए जिस पर उस समय निगमायुक्त रहे आशीष कुमार ने टेंडर निरस्त करने के आदेश जारी कर दिए थे।

मीडिया पॉलिसी की धज्जियाँ उड़ाईं
सोलर डस्टबिन के नाम पर मीडिया पॉलिसी 2017 के नियमों का घोर उल्लंघन किया गया था। मीडिया पॉलिसी में उल्लेख है कि जमीन पर अब केवल यूनिपोल ही लगाए जा सकेंगे वह भी नियमों के तहत, ऐसे में सोलर डस्टबिन पर लगने वाले विज्ञापन पूरी तरह अवैध थे। पाॅलिसी में किसी भी चौराहे और तिराहे पर विज्ञापन के प्रदर्शन पर पाबंदी है उसका भी उल्लंघन किया गया था। यह टेंडर 10 सालों के लिए दिया गया था, जबकि पॉलिसी के अनुसार 3 सालों से अधिक का कोई टेंडर नहीं दिया जा सकता है।

दिखावे की कार्रवाई की गई थी
टेंडर निरस्त होने और खुद प्रमुख सचिव के आदेश होने के कारण नगर निगम के अधिकारियों ने आनन-फानन में कुछ सोलर डस्टबिन को निकालने की आधी अधूरी कार्रवाई की और उसके बाद चुप्पी साध ली। आज स्थिति यह है कि सभी फर्जी सोलर डस्टबिन पर विज्ञापन किए जा रहे हैं जिससे प्रदेश सरकार द्वारा बनाई गई मीडिया पॉलिसी का मजाक उड़ रहा है। एजेंसी संचालक इसके जरिए कमाई कर रहा है। पूर्व में मुख्यमंत्री रहे कमलनाथ ने आदेश दिए थे कि अवैध तरीके से यदि उनका भी होर्डिंग लगा हो तो उसे निकाल दिया जाना चाहिए, जबकि इस सरकार के राज में एक नहीं दर्जनों फर्जी सोलर डस्टबिन लगे हैं और अवैध तरीके से विज्ञापन हो रहा है फिर भी कोई कुछ नहीं कर रहा है।

कमीशन इतना कि एजेंसी को बचा लिया
नियम-कानून तो यही कहते हैं कि यदि कोई फर्जी कार्य किया जाए तो उसकी शिकायत पुलिस में होनी चाहिए, लेकिन इस मामले में अधिकारियों ने ऐसा कुछ नहीं किया। एजेंसी ने असली की बजाय फर्जी सोलर डस्टबिन लगाए, एक की कीमत 10 लाख बताई और लगाया साधारण टीन का डिब्बा इसके बाद भी अधिकारियों ने पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं कराई, जानकारों का कहना है कि 5 करोड़ का मामला था और अधिकारियों को इतना तगड़ा कमीशन मिला था कि वे एजेंसी संचालक को बचाने हर स्तर पर जाने तैयार थे।

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