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पुरातत्व विभाग ने अब शुरू की कवायद:आकाशीय बिजली गिरी तो खतरे में पड़ सकता है प्राचीन धरोहरों का अस्तित्व

जबलपुर19 दिन पहले
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  • चौसठ योगिनी मंदिर को छोड़ किसी भी धर्म स्थल या इमारत पर नहीं है तड़ित चालक, सुरक्षा को लेकर पुरातत्व विभाग ने अब शुरू की कवायद

बारिश के मौसम में हमेशा आकाशीय बिजली गिरने का खतरा बना रहता है। इस साल आकाश से गिरने वाली बिजली के कारण सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है, इसके साथ ही कई प्राचीन इमारतों और धार्मिक स्थलों को भी भारी नुकसान हुआ है।

हाल ही में पुरी मंदिर के बाद जयपुर के आमरे किले जैसी पुरातात्विक धरोहरों पर जो तबाही हुई उसने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया है। पुरातत्व विभाग के अधीन आने वाली प्राचीन धरोहरें हमेशा से पर्यटन का केन्द्र रही हैं, इनसे शासन-प्रशासन हर साल लाखों-करोड़ों की कमाई भी करता है, लेकिन इनके रख-रखाव को लेकर सिर्फ औपचारिकताएँ होती हैं।

जबलपुर जिले की प्राचीन धरोहरों की बात करें तो यहाँ पुरातत्व विभाग के अधीन पाँच प्रमुख स्थान हैं, इनमें भेड़ाघाट चौसठ योगिनी की प्रतिमाएँ व इसी प्रांगण में बना गौरी-शंकर मंदिर, मदन महल किला, मझौली का विष्णु-वराह मंदिर और तेवर का त्रिपुर सुंदरी मंदिर शामिल हैं। इनमें से सिर्फ चौसठ योगिनी मंदिर में ही आकाशीय बिजली से बचाव के लिए तड़ित चालक लगा हुआ है, बाकी सभी धरोहरें भगवान भरोसे हैं। हालाँकि हाल ही की घटनाओं को देखते हुए पुरातत्व विभाग ने इन धरोहरों में तड़ित चालक लगाने के लिए कवायद शुरू कर दी है।

मदन महल फोर्ट

मदन महल की पहाड़ियों पर बने इस किले का निर्माण 11वीं शताब्दी में गौंड़ शासक राजा मदन शाह ने कराया था। इसलिए इस किले का नाम मदन महल पड़ा। इस किले को वॉच टॉवर और सैनिक छावनी भी कहा जाता था, क्योंकि इस किले से पूरे शहर पर नजर रखी जा सकती है। इस किले की पहचान वीरांगना रानी दुर्गावती के कारण ज्यादा होती है, क्योंकि इसी किले पर रहकर रानी दुर्गावती ने मुगलों से मुकाबला किया था।

चौसठ योगिनी मंदिर

भेड़ाघाट के धुआंधार जलप्रपात के समीप 7वीं शताब्दी के चौसठ याेगिनी मंदिर का धार्मिक और पौराणिक महत्व है। यह दुनिया का एक मात्र मंदिर है, जिसमें नंदी पर सवार शिव-पार्वती वैवाहिक मुद्रा में हैं। मंदिर के बाहरी हिस्से में चौसठ योगिनियों की प्रतिमाएँ हैं, जहाँ सदियों से तंत्र-मंत्र की साधना की जाती थी। मुगल शासक औरंगजेब ने इस मंदिर पर हमला किया था और चौसठ योगिनियों की प्रतिमाएँ खंडित कर दी थीं। इस मंदिर को शक्ति और शत्रु विनाशक होने का प्रतीक भी माना जाता है।

त्रिपुर सुंदरी मंदिर

भेड़ाघाट के तेवर में स्थित 11वीं सदी के इस मंदिर में एक ही पत्थर पर महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की छवि मौजूद है। इसलिए इसे त्रिपुर सुंदरी के नाम से जाना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार इस मंदिर से जुड़ीं कई कहावतें और किवदंतियाँ भी जुड़ी हुई हैं। ऐतिहासिक महत्व के कारण ये पुरातत्व विभाग के अधीन है, लेकिन इसका हर तरह से रख-रखाव जिला प्रशासन द्वारा किया जाता है।

विष्णु-वाराह मंदिर

मझौली में बना यह मंदिर 11वीं सदी में बनाया गया था। इतिहासकारों के अनुसार भगवान विष्णु के 12 अवतारों में से एक विष्णु-वाराह की यह प्रतिमा मंदिर से लगे नरीला तालाब में मछुवारे को मिली थी, जिसे मछुवारे ने तालाब के समीप एक जगह पर रख दिया था। कुछ ही दिनों में छोटी प्रतिमा का रूप बढ़ने लगा, करीब 10 फीट ऊँची होने पर मूर्ति के ऊपरी हिस्से में सोने की कील ठोंक दी, जिससे इसका बढ़ना बंद हो गया।

जबलपुर जिले में पाँच प्राचीन धरोहरें पुरातत्व विभाग के अधीनस्थ हैं। चौसठ योगिनी मंदिर के गौरी-शंकर मंदिर में तड़ित चालक लगी हुई है, लेकिन अन्य स्थानों पर नहीं है। लेकिन हाल की घटनाओं के बाद इनकी सुरक्षा के मद्देनजर सभी जगहों पर तड़ित चालक के साथ प्राकृतिक आपदा से होने वाले नुकसान के बचाव के लिए व्यवस्थाएँ की जाएँगी। -सुजीत नयन, अधीक्षण पुरातत्व विभाग जबलपुर सर्किल

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