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  • If The Government Wants To Save The Industries, Then Relief Packages Will Have To Be Given Openly, As Well As Such A System Will Have To Be Made Which Automatically Becomes Active For The Benefit Of The Industry In The Epidemic.

सन पेटपैक मैनेजिंग डायरेक्टर रवि गुप्ता से बातचीत:सरकार उद्योगों को बचाना चाहती है तो दिल खोलकर राहत पैकेज देने होंगे, उद्योग हित के लिए सिस्टम तैयार करना होगा

जबलपुर19 दिन पहले
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  • कहा- जीएसटी, बिजली बिल, बैंक के ब्याज सब में रियायतें देनी होंगी और श्रमिकों के मन का खौफ दूर करना होगा

पैकेजिंग की दुनिया में नए प्रयोग करने वाले सन पेटपैक जबलपुर प्राइवेट लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर रवि गुप्ता का कहना है कि यदि सरकार उद्योगों को बचाना चाहती है तो उसे दिल खोलकर राहत पैकेज देने होंगे। इतना ही नहीं जीएसटी, बिजली बिल, लोन पर ब्याज के मामलों में भी नरम रुख अख्तियार करते हुए उद्योगों के हित में फैसले लेने होंगे। दैनिक भास्कर से लम्बी बातचीत में मनेरी उद्योग संघ के अध्यक्ष श्री गुप्ता ने कई समस्याएँ भी बताईं और सुझाव भी दिए। प्रस्तुत है उनसे हुई चर्चा के प्रमुख अंश:

सन पेटपैक एक नजर में

  • रिजिड प्लास्टिक कंटेनर बनाने वाली महाकौशल क्षेत्र की पहली इकाई।
  • वेस्ट पेपर पल्प से मोल्डिंग करके पैकेजिंग निर्माण की इकाई।
  • अनेक शू इंडस्ट्री को पेपर स्टफ़िंग ; शूट्रीद्ध की आपूर्ति, आयात का विकल्प।
  • थर्मोकोल पैकेजिंग का रिप्लेसमेंट, पर्यावरण उपयोगी उत्पाद।

थोड़ा स्पष्ट कीजिए कि आने वाले समय में उद्योगों को क्या संकट है?
पैकेजिंग इंडस्ट्री की बात करते हैं, पिछले 6 माह में जितने रेट बढ़े, उतने तो मैंने अपने 40 साल के औद्योगिक जीवन में नहीं देखे। भले ही इस इंडस्ट्री का अधिकांश कच्चा माल अब देश में मिलने लगा है, पर इसकी प्राइसिंग आयात आधारित ही है, जिस पर कंटेनर और जहाज की कमी तक का प्रभाव पड़ता है। ये कमी कोरोना के कारण पूरी दुनिया थम सी जाने के कारण आई थी और इसी कारण कच्चे माल के रेट भी बढ़ते गए।

ये पहली बार हुआ कि कच्चा माल मार्केट में ब्लैक में बिक रहा है। पूरी इंडस्ट्री उलझी हुई है। हमारा एक उत्पाद खाद्य तेल रखने का डिब्बा बनाना भी है। बढ़े रेट और लेबर शाॅर्टेज के बाद यदि हमने डिब्बा बना लिया और खाद्य तेल कम्पनी ने इसमें तेल भी भर दिया तो मार्केट बंद रहने पर इसे बेचेंगे कहाँ? नहीं बिकेगा तो कोई उद्योग नहीं चलेगा और आने वाले एक-डेढ़ साल में इतने अकाउंट एनपीए होंगे कि उसकी कल्पना नहीं की जा सकती।

कोरोना संक्रमण काल में आपके उद्योग ने क्या मुसीबतें झेलीं और कितना नुकसान हुआ?
मेरा उद्योग थोड़ा अलग तरह का जरूर है, पर समस्याएँ सभी उद्योगों की एक समान रहीं हैं। कच्चे माल का संकट, श्रमिकों की अनुपलब्धता, मार्केट में कैश की कमी, ये ऐसी समस्याएँ हैं, जिसने कोरोना काल में हर किसी को परेशान किया। ये समझ से परे है कि सरकार चाहती है कि उद्योग पूरी क्षमता से चलें और बाजार बंद रहें, तो माल बिकेगा कहाँ? और माल नहीं बिकेगा तो पैसा कहाँ से आएगा और पैसे के बिना कच्चा माल कैसे खरीदा जाएगा? बिना कच्चे माल के उद्योग कैसे चलेंगे? इन्हीं समस्याओं से हमारा उद्योग भी जूझता रहा। इस एक-डेढ़ साल में उत्पादन 30 प्रतिशत हो जाने से उद्योग की रीढ़ की हड्डी टूट गई। ब्रेक-ईवन तक पहुँचना मुश्किल हो गया है।

अगर इतने खराब हालात हैं, तो आप सरकार से क्या मदद या राहत चाहते हैं?
सरकार को कई स्तरों पर काम करना पड़ेगा। केंद्र और राज्य सरकारों को मिल-जुलकर उद्योगों के हित में निर्णय लेने होंगे। सरकार का काम है निर्बाध कच्चा माल उद्योग तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त करना। श्रमिकों का भय मिटाना और उन्हें फैक्टरी पहुँचने का प्रोत्साहन देना। इसके साथ ही लागत कम करने के लिए बिजली बिल में राहत देना। बिजली बिल के सारे न्यूनतम और फिक्स चार्ज तुरंत वापस करने चाहिए। गुजरात और एक-दो दूसरे राज्यों में ऐसा हुआ भी है। इसके बाद जितना जीएसटी सरकार वसूल रही है, उससे आधा अगले माह ही फैक्टरी के अकाउंट में क्रेडिट होना। बैंक आधा ब्याज तुरंत माफ करें। आगे भी जब तक संकट चले तब तक ये राहतें भी जारी रहें। अगर सरकार उद्योगों के पक्ष में ऐसे निर्णय नरमी से लेगी, तभी उद्योग बच पाएँगे।

सरकार से आपकी और क्या अपेक्षाएँ हैं?
सरकारों को एक सिस्टम बनाना होगा कि जब भी ऐसी मुसीबत आए, ये सिस्टम अपने आप सक्रिय हो जाए। साथ ही औद्योगिक क्षेत्रों में अवेयरनेस पैदा करनी होगी, ताकि 100 प्रतिशत श्रमिक और उनके परिजन वैक्सीन लगवाएँ। श्रमिकों तथा अन्य सभी वर्कर्स के लिए औद्योगिक क्षेत्रों में ही हेल्थ सेंटर खोले जाएँ, जो महामारी के समय मदद करे। ये सेंटर मनोवैज्ञानिक रूप से टूट चुके वर्कर्स के मन का खौफ निकालें और उन्हें कोरोना से उबारने में मदद करें।

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