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जबलपुर मेडिकल कॉलेज ने रचा इतिहास:प्रदेश में किडनी ट्रांसप्लांट करने वाला दूसरा सरकारी हॉस्पिटल बना; 25 साल के बेटे को अंगदान कर पिता ने बचाई जिंदगी

जबलपुरएक वर्ष पहले
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जबलपुर के नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज का सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल किडनी ट्रांसप्लांट करने वाला प्रदेश का दूसरा सरकारी हॉस्पिटल बन गया है। यहां ऑर्गन रिट्रीवल और ट्रांसप्लांट लाइसेंस मिलने के एक महीने बाद 26 सितंबर को पहला ऑपरेशन किया गया। कटनी के रहने वाले 25 साल के युवक को उसके 57 वर्षीय पिता ने किडनी डोनेट की है। खास बात यह है कि 5-7 लाख रुपए में होने वाला यह ऑपरेशन आयुष्मान कार्ड के जरिए नि:शुल्क हुआ है। इसके पहले भोपाल के हमीदिया हॉस्पिटल में 7 सितंबर को किडनी ट्रांसप्लांट हो चुका है।

मेडिकल कॉलेज और सुपर स्पेशलिटी की पूरी टीम इस ऑपरेशन के लिए 5 महीने से जुटी थी। इस ऑपरेशन की मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, चिकित्सा शिक्षा एवं स्वास्थ्य मंत्री विश्वास सारंग और प्रभारी मंत्री गोपाल भार्गव भी मॉनिटरिंग कर रहे थे। रविवार सुबह 10 बजे पिता-पुत्र को ऑपरेशन के लिए ले जाया गया और दो बजे टीम बाहर निकली तो सभी के चेहरे पर मुस्कान थी। पहला केस होने के चलते इसे बेहद गोपनीय रखा गया था। ऑपरेशन के 7 घंटे बाद जब पिता-पुत्र होश में आ गए और सब कुछ ठीक मिला तो डीन डॉक्टर प्रदीप कसार ने इस उपलब्धि को साझा किया। हालांकि, डॉक्टरों ने पिता-पुत्र के नाम का खुलासा नहीं किया है।

किडनी ट्रांसप्लांट करने वाली सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल की टीम।
किडनी ट्रांसप्लांट करने वाली सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल की टीम।

अभी ICU में रखे गए हैं पिता-पुत्र
ऑपरेशन करने वाली टीम की अगुवाई करने वाले यूरो सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. फणीन्द्र सोलंकी के मुताबिक अभी पिता-पुत्र को तीन दिन आईसीयू में रखा गया है। इसके बाद भी वे सुपर स्पेशलिटी की निगरानी में रहेंगे। सब कुछ नार्मल होने के बाद एक सप्ताह में वे डिस्चार्ज कर दिए जाएगा। डॉ. फणीन्द्र ने बताया कि इस ऑपरेशन के लिए टीम फरवरी से काम कर रही थी। कोविड की दूसरी लहर ने ब्रेक लगा दिया। मई के बाद टीम फिर इसके प्रयास में जुटी थी।

नाम का नहीं किया खुलासा
डीन डॉक्टर प्रदीप कसार के मुताबिक, कटनी के 25 वर्षीय युवक की दोनों किडनी पूरी तरह से खराब हो चुकी थीं। साधारण परिवार का यह युवक चारों तरफ इलाज कराने और महंगे ऑपरेशन खर्च की राशि सुनकर मायूस होकर पांच महीने पहले मेडिकल कॉलेज के सुपर स्पेशलिटी यूनिट में इलाज कराने आया था। वर्तमान में उसकी हालत ऐसी हो गई थी कि उसे सप्ताह में दो दिन डायलिसिस कराने कटनी से जबलपुर आना पड़ता था। बेटे की ये हालत पिता से देखी नहीं जा रही थी। उसने पहले ही अपनी किडनी का टेस्ट करा लिया था, जो बेटे के ब्लड ग्रुप से मैच कर गई थी।

पांच महीने पहले मेडिकल कॉलेज में इलाज कराने पहुंचे थे पिता-पुत्र।
पांच महीने पहले मेडिकल कॉलेज में इलाज कराने पहुंचे थे पिता-पुत्र।

पिता-पुत्र काे भरोसे में लेना था मुश्किल
किडनी ट्रांसप्लांट के लिए मरीज और डोनर दोनों उपलब्ध थे, लेकिन मुश्किल ये थी कि पहली बार ट्रांसप्लांट की बात सुनकर पिता-पुत्र तैयार नहीं हो रहे थे। उन्हें समझाने और भरोसे में लेने में ही डॉक्टरों को एक सप्ताह लग गया। आर्थिक हालत ठीक न होने और आयुष्मान कार्ड से फ्री में ऑपरेशन की बात पर वे किसी तरह तैयार हुए।

डोनर पिता की किडनी से तीन धमनियां जुड़ी थीं
डॉ. फणीन्द्र सोलंकी ने सर्जरी टीम की अगुवाई की। टीम में डॉक्टर अर्पण, डॉक्टर अविनाश, डॉक्टर प्रशांत और डॉक्टर अनुराग शामिल रहे। वहीं निश्चेतना विशेषज्ञ डॉ अपर्णा, डॉ मीना, डॉक्टर कमल व डॉक्टर अनिवेश ने जिम्मेदारी संभाली। सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के डायरेक्टर डॉ वाईआर यादव ने विशेष इंतजाम करते हुए सभी जरूरतों को समय पर उपलब्ध कराया। चार घंटे तक पिता-पुत्र का ऑपरेशन चला। डॉक्टर फणींद्र सोलंकी ने दैनिक भास्कर से बात करते हुए बताया कि डोनर पिता की किडनी से तीन धमनियां (खून की नली) जुड़ी थीं। दो से किडनी को खून पहुंच रहा था, तो एक से बाहर निकल रहा था। अमूमन दो धमनियां ही होती हैं।

काफी जटिल था ये ऑपरेशन
किडनी ट्रांसप्लांट के लिए जरूरी था कि कम समय में इसे बेटे के शरीर में प्रत्यारोपित कर दिया जाए। किडनी निकालने से प्रत्यारोपित करने के बीच में एक धमनी से खून देना पड़ता है और दूसरे से निकलने वाले खून को स्टोर करना पड़ता है। यहां तीन धमनियां थी। इसी कारण कई प्राइवेट अस्पताल वालों ने मना कर दिया था और किडनी के काम न करने की आशंका व्यक्त की थी, पर मेडिकल के चिकित्सकों ने इस चुनौती को स्वीकार किया। पिता की एक किडनी निकाल कर बेटे के शरीर में प्रत्यारोपित किया गया। तीनों धमनियों को बेटे के शरीर से जोड़ा गया।

मेडिकल कॉलेज के डीन डॉक्टर प्रदीप कसार ने ऑपरेशन के 7 घंटे बाद इस खुशी को साझा किया।
मेडिकल कॉलेज के डीन डॉक्टर प्रदीप कसार ने ऑपरेशन के 7 घंटे बाद इस खुशी को साझा किया।

शरीर किडनी स्वीकार करे, इसके लिए दे रहे दवाएं
डॉक्टर फणींद्र सोलंकी के मुताबिक, शरीर की प्रतिरोधक क्षमता जल्द दूसरी किडनी को स्वीकार नहीं करती। वे किडनी को खराब करने में जुट जाते हैं। इसे दवाओं के माध्यम से प्रतिरोधक क्षमता को कम किया जाता है। इससे शरीर नई किडनी को स्वीकार कर ले। इसी कारण अभी तीन दिन पिता-पुत्र आईसीयू में विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में रखे गए हैं। उम्मीद के मुताबिक तेजी से सुधार भी हो रहा है। अगले 6 से 7 दिनों में उन्हें डिस्चार्ज कर दिया जाएगा।

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