देश में सबसे ज्यादा सोयाबीन उत्पादन MP में:फसल कैसे बचाएं, बेहतर उपज कैसे लें? जानिए- MP की सबसे बड़ी एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के एक्सपर्ट से

जबलपुरएक वर्ष पहले

किसान सोयाबीन की खेती नकदी फसल के तौर पर करते हैं। सोयाबीन में सबसे अधिक रोग और कीटों का प्रकोप लगता है। खेत के खेत सूख जाते हैं। देश में सबसे अधिक सोयाबीन उत्पादन का तमगा एमपी के किसानों के पास है। ऐसे में किसान सोयाबीन की कौन से किस्मों का चयन करें? कैसे फसल को बचाएं? बेहतर उपज कैसे लें? आइए जानते हैं- भास्कर खेती किसानी सीरीज-18 में एक्सपर्ट डॉ. एमके श्रीवास्तव (प्रिंसिपल साइंटिस्ट सोयाबीन अनुसंधान परियोजना जेएनकेवी) से

एमपी में होता है सोयाबीन का सबसे अधिक उत्पादन।
एमपी में होता है सोयाबीन का सबसे अधिक उत्पादन।

देश का आधा सोयाबीन अकेला मध्यप्रदेश पैदा करता है

देश का 50 प्रतिशत सोयाबीन उत्पादन मध्यप्रदेश में होता है। वर्तमान में देश में 120 लाख हेक्टेयर में साेयाबीन की खेती हो रही है। एमपी में 58 लाख हेक्टेयर एरिया में ये लगाई जा रही है। सोयाबीन की खेती मालवा में अधिक सफल है। जवाहर लाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय ने अब तक 18 किस्मों का विकास किया है। 10 किस्में देश के 74 प्रतिशत क्षेत्रों में बोई जा रही हैं। ब्रीडर बीज के तौर पर देशभर में 14 हजार क्विंटल बीज की मांग है। इसमें 9 हजार क्विंटल बीज की मांग सिर्फ जवाहर सोयाबीन की है।

खाद व बीज की ये मात्रा लगती है

बुआई के समय 20 से 25 किलो नाइट्रोजन, 60 से 80 किलो फाॅस्फोरस, 20 से 25 किलो पोटाश एक ही बार में बेसल डोज के तौर पर खेत में मिला दें। 20 जून से पांच जुलाई तक बुआई कर दें। प्रति हेक्टेयर 80 किलो बीज लगता है। उत्पादन 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होता है।

फसल काे बीमारी से बचाएगी गर्मी की गहरी जुताई

रबी की फसल खाली होने पर खेत की गहरी जुताई करें। बहुत सारे कीट व बीमारी मिट्‌टी से पैदा होती है। मिट्‌टी उलटेगी, तो कीट व बीमारियों की तीव्रता कम हो जाएगी। खरीफ की फसल होने के चलते सोयाबीन में सबसे अधिक कीट व बीमारी लगती है। किसान समय पर प्रबंधन कर लें, तो कीट व बीमारियों से फसल को बचा लेंगे।

जवाहर किस्मों का करें प्रयोग

सोयाबीन किस्मों का चयन क्षेत्रीय अनुकूलता के आधार पर करनी चाहिए। हल्की जमीन है, तो वहां शीघ्र पकने वाली किस्मों का चुनाव करें। जेएनकेवी द्वारा विकसित 2069, 2034, 2098 और वर्तमान में विकसित की गई जवाहर 20-116 का प्रयोग करें। इससे अधिक उपज मिलेगी। इसमें बीमारी भी नहीं लगती है।

मृदा और विषाणु जनित रोग लगते हैं

सोयाबीन में मृदा जनित और विषाणु जनित बीमारी अधिक लगती है। सोयाबीन में पीला विषाणु रोग लगता है। यह सफेद मक्खी से फैलता है और पूरे खेत की फसल पीली होकर सूख जाती है। पुरानी जातियों में इसका प्रकोप अधिक देखा जा रहा है। नई चारों जातियों में इसकी तीव्रता कम देखने को मिली है। एक-दो पौधे दिखें, तो नष्ट कर दें। सफेद मक्खियों को कंट्रोल करने के लिए समय पर दवाओं का छिड़काव करें।

कीट व फफूद वाली बीमारी में ऐसी दिखती है फसल।
कीट व फफूद वाली बीमारी में ऐसी दिखती है फसल।

जड़ सड़न शुरू हुआ तो फसल बचानी मुश्किल

सोयाबीन में चारकोल जड़ सड़न रोग भी लगता है। ये पौधों को सुखा देता है। एक बार खेत में रोग फैला तो बचाव मुश्किल है। ऐसे में खेत में फफूद नाशक दवाओं का पहले ही छिड़काव कर दें। सोयाबीन पर अलग-अलग चरण में हरा सेमालूपर, कंबल कीट, चक्रभंग, तम्बाकू इल्ली, अलसी इल्ली हमला करते हैं। किसान अनुशंसित दवाओं का उपयोग करें।

जेएनकेवी सोयाबीन की नई किस्म विकसित करने में जुटा।
जेएनकेवी सोयाबीन की नई किस्म विकसित करने में जुटा।

सोयाबीन की नई किस्म विकसित करने में जुटा है कृषि विवि

जेएनकेवी के कृषि साइंटिस्ट सोयाबीन की नई किस्म विकसित करने में जुटे हैं। ये 85 दिन में पक जाएगी। इसका उत्पादन 25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होगा। यह बहुरोग रोधी होगा। देश के नौ राज्यों एमपी, महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात, तेलंगाना, नार्थ ईस्ट के राज्यों में इसका परीक्षण चल रहा है। अभी तक के परिणाम बेहतर हैं।

भास्कर खेती-किसानी एक्सपर्ट सीरिज में अगली स्टोरी होगी विभिन्न फसलों से उत्पाद बनाकर किसान कर सकते हैं अतिरिक्त कमाई। आपका कोई सवाल हो तो इस नंबर 9406575355 वॉट्सऐप पर सकते हैं।

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