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घाटों की बुरी दुर्दशा:नर्मदा तट फिर पुराने ढर्रे पर, शनिवार को ही रविवार की भरपाई हर तरफ फैल रहा सिंगल यूज प्लास्टिक और पॉलीथिन का कचरा

जबलपुरएक महीने पहले
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  • जबलपुर: कोई घाट ऐसा नहीं जो पूरी तरह से साफ हो, छह दिनों में 7 दिनों के बराबर गंदगी

कोरोना संकट से पहले तक नर्मदा तट शनिवार और रविवार को ज्यादा गंदे रहते थे। अब कोरोना काल में रविवार को विराम डे होने से तटों पर तो ज्यादा लोग नहीं पहुँच पाते पर शनिवार के दिन ही रविवार की भरपाई हो रही है। शनिवार को ही ज्यादा संख्या में लोग घाटों पर पहुँचकर पहले की तरह ही गंदा करने लगे हैं। छह दिनों में पूरे सात दिनों का कचरा जमा हो रहा है। तीन माह लॉकडाउन के समय जो थोड़ा सा सुधार तटों पर सफाई को लेकर हुआ था वह अब पूरी तरह से चौपट हो गया है। जिलहरीघाट से लेकर अंतिम सीमा तक सरस्वती घाट में भी किसी तरह की सफाई अभी नहीं देखी जा सकती है। ग्वारीघाट, तिलवाराघाट, लम्हेटा, भेड़ाघाट सभी में प्लास्टिक, पाॅलीथिन, अगरबत्ती के पैकेट, लेमीनेटेड दोने और कई किस्म के खाली पैकेटों का कचरा देखा जा सकता है। एक तरह से कहा जाए तो हमने कुछ नहीं सीखा, तटों पर सब कुछ पुराने ढर्रे पर है।

घाटों को सबसे ज्यादा नुकसान लापरवाही से दीपदान करने वाले पहुँचा रहे हैं। दीपदान में प्लास्टिक परत चढ़े दोने का इस्तेमाल लगातार किया जा रहा है। इसी के साथ अगरबत्ती का पैकेट व अन्य पूजन सामग्री उपयोग के बाद घाट पर ही फेंकी जा रही है। प्लास्टिक की परत वाला दोना जैसे निर्मल जल के लिए जहर साबित हो रहा है। यह आसानी से पानी में अपघटित नहीं होता है। और तो और इसकी खतरनाक प्लास्टिक परत लंबे समय तक पानी में रहकर जहरीले रसायन पैदा करती रहती है।

  • तट पर हर तरफ ऐसे नजारे 
  • 80 दिनों की सफाई 34 दिनों में चौपट। 
  • आसपास के कोई भी घाट अभी क्लीन नहीं। 
  • आवारा जानवर भी घाटों पर सक्रिय। 
  • ये भी गंदगी को कई गुना बढ़ा रहे हैं। 
  • डस्टबिन हैं पर इनका उपयोग न के बराबर। 
  • डस्टबिन का कचरा आवारा जानवर बिखेर देते हैं। 
  • सफाई कर्मी किसी घाट पर नजर नहीं आते। 

तट के दुकानदार बन गए बेरहम

तटों पर जो दुकान लगाकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं वे निर्मल जल के लिए बेरहम साबित हो रहे हैं। बेधड़क प्लास्टिक बेच रहे हैं और आसपास खुद बड़ी मात्रा में कचरा जमा कर सीधे बहते पानी में फेंकने में कसर नहीं छोड़ते हैं। जिस माँ के आँचल में बैठकर अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं उसे ही हानि पहुँचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। न तो खुद जागरूक बनकर सफाई को कभी बढ़ावा देते हैं, न तट पर आये लोगों से इसको लेकर कोई पहल करते हैं। एक तरह से तटों पर लग रहीं दुकानें भी स्वच्छ जल के लिए हानिकारक साबित हो रहीं हैं। दुकानदार तटों की सुंदरता को चौपट तो कर ही रहे हैं, साथ ही स्वच्छ, निर्मल जल के दुश्मन भी साबित हो रहे हैं।  

निगम कर्मियों की भीड़ लेकिन सफाई नाम की

किसी भी घाट पर आप चले जाइए घाट में सफाई होते नहीं देख सकते हैं। नगर निगम ने अच्छी खासी संख्या में सफाई कर्मी तैनात किये हैं। अलग-अलग घाटों पर सफाई को लेकर बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं पर हकीकत में दिन में जितनी बार तटों को साफ िकया जाना चाहिए उतना सफाई के प्रति ध्यान नहीं दिया जाता है। अब तो हालात ऐसे हैं कि आवारा जानवर तटों पर खड़े रहते हैं। ये आवारा जानवर जो डस्टबिन लगाये गये हैं उनसे कचरा यहाँ-वहाँ बिखेरते रहते हैं। जो थोड़ी बहुत सफाई के बाद कचरा डस्टबिन में जाना चाहिए तो वह पानी में समाहित करा दिया जाता है। अनलॉक में  हद दर्जे की लापरवाही तटों पर इन दिनों देखी जा सकती है।

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