जबलपुर के अस्पताल में मौत से संघर्ष के 18 मिनट:कैसे गुजरा आखिरी वक्त​​​​​​​; जानिए मरीज अपनी जान क्यों नहीं बचा सके

जबलपुर6 महीने पहलेलेखक: योगेश पाण्डे

आठ लोगों को मौत की नींद सुला देने वाले जबलपुर के अस्पताल पर कई सवाल उठ रहे हैं। इन सवालों से पूरा सिस्टम घिरा हुआ है। जिंदगी और मौत से संघर्ष के आखिरी मिनट कैसे गुजरे? आग क्यों लगी? कैसे भड़की? मरीज अपनी जान क्यों नहीं बचा सके? 1 अगस्त को हुए अग्निकांड के बाद प्रशासन क्या कर रहा है? दैनिक भास्कर ने इन सवालों का जवाब तलाशने के लिए पड़ताल की।

सारे सवाल की जड़ न्यू लाइफ अस्पताल का इकलौता 5 फीट का गेट था। गेट ने आग पकड़ ली। अस्पताल में घुसने और बाहर निकलने का रास्ता बंद हो गया। बिल्डिंग में धुआं भर गया। मरीजों को बाहर निकलने का मौका ही नहीं मिला। वे जान बचाने के लिए चीखते-चिल्लाते रहे। मौत से संघर्ष करते-करते कोई झुलसने से तो कोई दम घुटने से हमेशा के लिए सो गया।

अब समझिए ऐसे हालात क्यों बने। अस्पताल का संचालन शॉपिंग कॉम्पलेक्स में हो रहा था। 30 बाय 60 के फ्रंट एलिवेशन के 10 फीट हिस्से में जनरेटर रखा था। दूसरी तरफ 15 फीट में मेडिकल स्टोर था। बचे हुए 5 फीट हिस्से में गेट लगा था। बिल्डिंग के बाकी तीनों तरफ पक्की दीवारें हैं। छत का रास्ता टीन शेड लगाकर बंद कर दिया गया था। यहां बता दें, नियमानुसार अस्पताल में इमरजेंसी एग्जिट के लिए खिड़कियां या गेट होना चाहिए।

अब वो 18 मिनट का घटनाक्रम विस्तार से जानिए...

अस्पताल में इमरजेंसी गेट क्यों नहीं था?

हमने अस्पताल और जांच से जुड़े लोगों से बात की। इस सवाल का जवाब कोई नहीं दे रहा है। जिन पर जिम्मेदारी थी, वो सब एक-दूसरे को जिम्मेदार बता रहे हैं। न अस्पताल के डायरेक्टर्स ने इसकी परवाह की, न सीएमएचओ ने, और न ही नगर निगम के फायर ऑफिसर ने। सब चिट्ठी-चिट्‌ठी खेलते रहे। फिलहाल मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के आदेश पर सीएमएचओ और फायर ऑफिसर को सस्पेंड कर दिया गया है। लेकिन इस सस्पेंशन से 8 मृतकों के परिवारों की खुशियां नहीं लौट पाएंगी।

सीएमएचओ और फायर ऑफिसर को सस्पेंड कर दिया गया है। लेकिन इस आग में मरे 8 लोगों के परिवारों की खुशियां नहीं लौट पाएंगी।
सीएमएचओ और फायर ऑफिसर को सस्पेंड कर दिया गया है। लेकिन इस आग में मरे 8 लोगों के परिवारों की खुशियां नहीं लौट पाएंगी।

24 अस्पतालों के लाइसेंस कैंसिल

8 मौतों ने जिम्मेदारों को नींद से जगा दिया है। विभिन्न तरह की खामियों वाले 24 अस्पतालों के लाइसेंस आनन-फानन में रद्द कर दिए गए। उधर, संभागायुक्त की अध्यक्षता में सरकार की कमेटी भी जांच कर रही है। लेकिन रिपोर्ट 1 महीने में आएगी। तब तक शायद आम लोगों का गुस्सा भी खत्म हो जाएगा। फिर ये जांच रिपोर्ट भी दूसरे हादसों की रिपोर्ट की तरह सरकारी दफ्तर में रख दी जाएगी। लेकिन, ये सवाल शायद हमेशा धधकता रहेगा कि शॉपिंग कॉम्पलेक्स में अस्पताल की परमिशन कैसे दी?

आग से कुछ शव बुरी तरह झुलस गए थे। रेस्क्यू टीम ने ऐसे शवों को चादरों पर डालकर अस्पताल से बाहर निकाला।
आग से कुछ शव बुरी तरह झुलस गए थे। रेस्क्यू टीम ने ऐसे शवों को चादरों पर डालकर अस्पताल से बाहर निकाला।

FIR में सरकारी अफसरों को आरोपी क्यों नहीं बनाया?

ये सवाल हर आदमी पूछ रहा है। डायरेक्टर्स को गैरइरादतन हत्या का आरोपी बनाया गया तो अस्पताल को परमिशन देने वाले नगर निगम के अधिकारियों व सीएमएचओ को क्यों नहीं? आंखें मूंदकर परमिशन देने वाले भी तो गैरइरादतन हत्या के आरोपी हैं। हालांकि, एसपी सिद्धार्थ बहुगुणा कहते हैं कि जांच चल रही है, जिसकी भी भूमिका मिलेगी उसे आरोपी बनाया जाएगा।

दूसरे फ्लोर पर ज्यादा मौतें
अस्पताल तीन मंजिला था। इसमें 30 बेड थे। बिल्डिंग के दूसरे फ्लोर पर ज्यादा लोगों की मौत हुई, क्योंकि ज्यादातर लोग यहीं फंसे थे। आग लगने के बाद मरीजों को बचाने कुछ लोग अंदर गए, जो बाहर नहीं निकल सके। लपटें इतनी तेज थीं कि कमरे में फंसे लोगों को बाहर निकालना बेहद मुश्किल हो गया। कुछ लोगों को खिड़की और दरवाजे तोड़कर बाहर निकाला गया। इस अस्पताल का संचालन डॉक्टर सुदेश पटेल, संतोष सोनी, निशांत गुप्ता और संजय पटेल करते थे।

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