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जबलपुर की मन्नत वाली काली मां:श्रद्धा ऐसी कि मूर्ति स्थापना के लिए 35 साल तक बुकिंग, 2038 तक के लिए FD सौंप चुके हैं भक्त; ढाई लाख तक आता है खर्च

जबलपुरएक वर्ष पहलेलेखक: संतोष सिंह

मन्नत वाली माता। जबलपुर के रांझी में हर साल स्थापित मां काली की मूर्ति को इसी नाम से लोग पुकराते हैं। लोगों की श्रद्धा ऐसी है कि 2038 तक मूर्ति स्थापना के लिए समिति को FD सौंप चुके हैं। मूर्ति स्थापना की बुकिंग 2056 तक के लिए हो चुकी है। मूर्ति स्थापना के लिए शहर के साथ-साथ विदेशों में रह रहे NRI भी शामिल हैं। यानी किसी भक्त को मूर्ति स्थापना करनी है तो उसे 35 साल इंतजार करना पड़ेगा। मूर्ति स्थापित करने से लेकर विसर्जन तक में ढाई लाख रुपए खर्च आता है। जानिए प्रतिमा स्थापना के पीछे की कहानी...

25 साल पहले वर्ष 1997 में रांझी आजाद नगर में बच्चों ने खेल-खेल में मां काली की मूर्ति बनाकर स्थापित किया था। वहां रहने वाले रमेश शर्मा और टीटू दुआ ने बच्चों को रुपए देकर विधिवत माता रानी की स्थापना कराई, तभी से यहां मूर्ति की स्थापना होने लगी। क्षेत्र के रहने वाले सतीश कुरुप ने जॉब लगने की मन्नत मांगी थी। जॉब लगी, तो उन्होंने अगली बार मूर्ति की स्थापना का खर्च उठाया। कुछ समय बाद छोटे भाई की भी जॉब लगने की मन्नत पूरी हो गई। यहीं से इसे मन्नत वाली माता का नाम मिला।

पुजारी रमेश शर्मा उर्फ पंडा जी मां काली मूर्ति का जयकारा लगाते हुए।
पुजारी रमेश शर्मा उर्फ पंडा जी मां काली मूर्ति का जयकारा लगाते हुए।

हजारों की संख्या में लोग मन्नत मांगने पहुंचते हैं
मनोकामना की महाकाली समिति रांझी के उपाध्यक्ष रमेश शर्मा के मुताबिक, लोग सूनी गोद भरने से लेकर जॉब लगने, बीमारी ठीक होने, घर बनाने, बच्चों की शादी होने सहित हर तरह की मन्नतें मांगने आते हैं, जिसकी मन्नत पूरी होती है, वो श्रद्धा के अनुसार मां के चरणों में चढ़ावा चढ़ाने पहुंचते हैं। मां की महिमा ऐसी है कि मनोकामना महाकाली की मूर्ति बनाने के लिए मूर्तिकारों की कतार लगी रहती है। बिना पैसे लिए वे मूर्ति बनाते हैं। मां की सेवा में न्योछावर का पैसा मिल जाए, इतने की इच्छा रखते हैं।

हजारों की संख्या में पहुंचते हैं श्रद्धालु।
हजारों की संख्या में पहुंचते हैं श्रद्धालु।

51 हजार तक की FD
मन्नत वाली माता के नाम पर 11 हजार से लेकर 51 हजार तक की FD श्रद्धालु कराते हैं। मूर्ति विराजित करने के लिए जिसे सौभाग्य मिलता होता है, वह उस पूरी नवरात्र का खर्च उठाता है। पंडाल की साज-सज्जा, लाइटिंग, भंडारे से लेकर विसर्जन तक की। इस पर पूर दो से ढाई लाख रुपए का खर्च आता है।

13 साल बाद मौका मिला
जबलपुर के रविंद्र सिंह लांबा ने बताया कि उन्होंने नौकरी के लिए मां काली से मन्नत मांगी थी। उनकी नौकरी लगी तो उन्होंने काली माता की स्थापना के लिए बुकिंग कराई थी। 13 साल बाद उन्हें मौका मिला। उन्होंने इस बार अपनी बारी आने पर प्रतिमा की स्थापना कराई है। यह रांझी के रहने वाले हैं।

रविंद्र लांबा, जिन्होंने इस बार मां की मूर्ति स्थापित कराई है।
रविंद्र लांबा, जिन्होंने इस बार मां की मूर्ति स्थापित कराई है।

अखंड ज्योति का तेल लेने के लिए लगती है कतार
मन्नत वाली महाकाली के कई चमत्कार के बारे में कई तरह की आस्था है। मान्यता है कि यहां 9 दिनों तक जलने वाली अखंड ज्योति का तेल किसी भी तरह के चर्म संबंधी विकार में जादुई असर करता है। घाव पर मलहम जैसा आराम मिलता है। नवमी पर यहां तेल लेने वालों की भीड़ लगती है। वहीं, मनोकामना महाकाली में 11 हजार थालियों के साथ पंगत में बैठाकर सभी आने वालों को भर पेट भंडारा कराया जाता है।

मनोकामना वाली महाकाली मां की विशेषता

  • समिति इस वर्ष मन्नत वाली महाकाली की प्रतिमा स्थापना की रजत जयंती मना रही है।
  • इस वर्ष विशाल पंडाल 35 फुट ऊंचे मंदिर में मां की प्रतिमा स्थापित की गई हैं।
  • लगातार माता की चौकी जागरण का कार्यक्रम भक्तों के द्वारा रखा गया है।
  • नवरात्र के प्रथम दिन मां काली की प्रतिमा स्थापित होती है और 11वें दिन ग्वारीघाट में विसर्जन के लिए ले जाया जाता है।
  • शहर में रांझी की मां काली को जहां मन्नत वाली रानी मां कहा जाता है, वहीं गढ़ा फाटक में स्थापित महाकाली की भी इसी तरह प्रसिद्ध है।
  • मां की अंखड ज्योति का तेल असाध्य घाव को भी भर देता है। नवमीं को लोग तेल लेने लाइन लगाते हैं।
  • यहां आखिरी दिन भंडारे में 11 हजार थालियों में भंडारे की पंगत लगती है।

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