धर्म:राग- द्वेष को केवल समता भाव लाकर समाप्त किया जा सकता है

झाबुआ17 दिन पहले
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तपस्वी का सम्मान करते समाज के  पदाधिकारी। - Dainik Bhaskar
तपस्वी का सम्मान करते समाज के पदाधिकारी।

जैन शास्त्रों में सोलह भावनाओं का बहुत महत्व बताया गया है। इन भावनाओं को समझ कर चिंतन करे तो जीव आत्म साक्षात्कार की ओर अग्रसर हो सकता है। इन भावनाओं का हम कभी भी कही भी चिंतन कर सकते है, लेकिन इन भावनाओं का चिंतन भी हम तभी कर पाएंगे। जब हम समता भाव में आ जाएंगे। जो की ममत्व भाव को छोड़ने से आएगी। प्रेरक उद्बोधन आचार्य नित्यसेन सूरीश्वरजी एवं साधु साध्वी मंडल की निश्रा में चल रहे।

आत्मानंदी चातुर्मास अंतर्गत मुनि निपुण रत्न विजयजी ने बावन जिनालय स्थित श्री राजेंद्र सूरी पौषध शाला में रविवार को भावनाओं की दुनिया विषय पर आयोजित विशेष प्रवचन में कहे। उन्होंने इन 16 भावना तक पहुंचने के लिए सम्पूर्ण प्रक्रिया को उदाहरण के साथ समझाया। कहां कि संसार यानी सरकना जो कि हम जब तक संसार में है। चलता रहेगा संसार छोड़ने से यह सरकना यानी धीरे- धीरे खिसकना भी समाप्त हो सकता है।

संसार भी चार प्रकार के है, जिसमें प्रथम वस्तुओं का संसार यानी कई प्रकार की वस्तुएं हमने एकत्रित कर रखी है। जो की उपभोग कर रहे है जिसका कारण वस्तु पर ममत्व भाव है। जिसके कारण कर्म बंध हो रहे है। दूसरा व्यक्तियों का संसार यानी कई भव में हमने कई परिजन मिले है, और उनके प्रति ममत्व भाव रखा है। जो कि कर्म बंध का कारण बना है। तीसरा व्यक्तित्व का संसार जो की सूक्ष्म दृष्टि से ही देखा जा सकता है। यह अहंकार, सम्मान, अपमान, विचारों का सतत उतार चढ़ाव होने से बनता है। चौथा, विभावाें का संसार याने आत्मा से भिन्न अवस्था ही विभाव दशा है।

यदि इन चारो संसार को अटकाना है, या दूर करना है, तो ज्ञानियों ने श्रेष्ठ मार्ग बताया है। वह है, आत्म साक्षात्कार का लेकिन आत्म साक्षात्कार भी तभी होगा। जब हम विभिन्न प्रक्रिया से गुजरेंगे। सर्व प्रथम क्रोध, मान, माया, लोभ रूपी कषायाें को समाप्त करना होगा। जो की हमारी पांच इंद्रियों को नियंत्रित कर समाप्त कर सकते है, लेकिन इंद्रियों पर नियंत्रण करने के लिए गाड़ी के ड्राइवर रूपी मन को नियंत्रण में लाना होगा।

क्योंकि सब जड़ मन है, जो हमारे नियंत्रण से बाहर हो चुका है। उसके लिए राग -द्वेष को दूर कर ले तो मन शांत हो सकेगा। राग द्वेष को केवल समता भाव लाकर समाप्त किया जा सकता है। जैसे ही समता भाव आया समझो आत्मा से साक्षात्कार हुआ।

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