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  • Revered Jinendra Muniji Said Even After Attaining Knowledge, Modesty Does Not Come, Then It Is Arrogance.

आत्मोद्धार वर्षावास:पूज्य जिनेंद्र मुनिजी ने कहा- ज्ञान प्राप्त करने पर भी विनय नहीं आए तो वह अहंकार है

झाबुआ24 दिन पहले
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शहर में चल रहे आत्मोद्धार वर्षावास में प्रवर्तक जिनेंद्र मुनिजी ने मेन बाजार स्थित स्थानक भवन में शनिवार को धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि यह जीव अनादि काल से मिथ्यात्व, अविरति, कषाय, प्रमाद, अशुभ योग से संसार में भ्रमण कर रहा है। उसमें मुख्य है मिथ्यात्व। अज्ञान आत्मा का सबसे बड़ा शुत्र है, आत्मा में कर्म बंध का प्रमुख कारण मिथ्यात्व है।

मिथ्यात्व दूर कैसे हो, सुगुरू का सानिध्य प्राप्त करके, भगवान की वाणी श्रवण करता है, तभी जीव का अज्ञान दूर होता है। जीव सम्यक मार्ग पर आकर भगवान की वाणी श्रवण करते हुए मोक्ष मार्ग पर गति करने लगता है। भगवती सूत्र एक शतक 9 उद्देशक कालाशय वेशी अणगार और भगवान महावीर के स्थविर शिष्यों के प्रश्न-उत्तर चल रहे है। उनके प्रश्नों के उत्तरों से कालाशय वेशी अणगार के ज्ञान में वृद्धि हुई। वे कहते है कि बहुत अच्छे से हमारी शंका का आपने समाधान किया।

तत्पश्चात कालाशयवेशी अणगार ने जाना कि ये स्थविर संत ज्ञानी है। जिससे उनका अज्ञान खत्म हुआ, और उन्होंने उनसे ज्ञान प्राप्त किया तो कालाश्यवेशी अणगार स्थविर भगवंतो के प्रति कृतज्ञ बनकर उनको वंदन नमस्कार करते है। ज्ञान से विनय प्राप्त‍ होता है। ज्ञान प्राप्त करके विनय नहीं आए तो वह अहंकार है। उन्होंने वंदन नमस्कार करके उन स्थविर भगवंतो से कहा कि- जो आपने ज्ञान प्रदान किया, उससे ‍हमारा अज्ञान दूर हुआ।

सच्चे ज्ञानी आत्मा वहीं होते है। जो ज्ञान प्राप्त करके सामने वाले के प्रति कृतज्ञ बन जाते है। जिस प्रकार इंद्र भूतिजी गौतम जो अपने आपको सबसे बड़ा ज्ञानी समझते थे, परन्तु भगवान महावीर स्वामीजी के चरणों में आकर वह विनयवान बनते है, और कहते है, मैं सबसे बड़ा अज्ञानी हूं।

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