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धर्म:मानव जीवन चिंता मणिरत्न के समान है -आचार्य

बड़वाह6 दिन पहले
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छहढाला में कहा है कि दुर्लभ लही ज्यों चिंतामणि त्यों पर्याय लही तृष तणी। सातिशय पुण्य से प्राप्त, चिंता मणिरत्न के समान मानव जीवन बहुत दुर्लभता से प्राप्त होता है। चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के बाद हमने मनुष्य भव साथ ही जैन कुल व संतो का समागम पाया है।

चार प्रकार के दान में सर्वश्रेष्ठ दान आहारदान है। जो सतपात्र मुनि को देने व उसकी अनुमोदना से महान पुण्यार्जन होता है। पुण्य की व्याख्या व आहारदान के महत्व को समझाते राष्ट्र संत आचार्य श्री 108 विरागसागरजी के परम प्रभावक शिष्य परम पूज्य मयूर पिच्छिकाधारी भक्तांबर महाकाव्य सिद्धस्थ गुरुदेव आचार्य श्री 108 विमदसागरजी महाराज ने धर्मसभा में कहा। सुयश जैन ने बताया पिछले 8 दिनों से जैन मंदिर में विराजमान होकर संत सभी को अपनी अमृतमयी वाणी से रसपान करवा रहे हैं।

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