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चातुर्मास:चातुर्मास कर रहे मुनिश्री ने किया केश लोचन

बड़वानी9 दिन पहले
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सिद्धक्षेत्र बावनगजा में चातुर्मास कर रहे मुनिश्री अध्ययन सागर महाराज ने बुधवार को केश लोचन किया। इस दौरान समाज के लोगों ने गुरुवर के वैराग्य की अनुमोदना की व केश लोच के समय सभी ने जाप पाठ व भजन किया। सुबह शांतिधारा, पूजन, विधान हुआ। आर्यिका माता ने प्रवचन दिए। यहां पर रोजाना अलग-अलग धार्मिक अनुष्ठान हाे रहे हैं। आर्यिका माता ने प्रवचनों में बताया गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का अर्थ वासना में डूबना है। अपितु वासना से ऊपर उठना है। विवाह का उद्देश्य वासना का नियंत्रण नहीं है। विवाह वासना का केंद्रीकरण है। अपनी असीम आकांक्षाओं को एक पर केंद्रित करना ही विवाह का उद्देश्य है। अपने असंयम पर नियंत्रण कर क्रमश पूर्ण संयम की ओर बढ़ना ही विवाह का ध्येय है। इस उद्देश्य से जुड़ जाने के कारण विवाह के बाद व्यक्ति के काम को पुरुषार्थ की संज्ञा दी गई है। विवाह के बाद गृहस्थ का काम एक पर सीमित हो जाता है। अपने पति अथवा पत्नी के अतिरिक्त अन्य सभी के प्रति ब्रह्मचर्य का भाव हो जाता है। इसलिए गृहस्थ स्वदार संतोष व्रत धारण करता है। विवाह व्यवस्था, सामाजिक मर्यादा और संबंधों की पवित्रता स्थापित करने के उद्देश्य से की गई है। जैसे कहीं कोई बांध बनाना होता है तो पहले सर्वेक्षण करते हैं। उसकी क्षमता के अनुरूप उसमें गेट लगाए जाते हैं। गेट को तभी खोला जाता है जब कोई खतरा हो। क्षमता से अधिक जल भर जाने के बाद भी यदि बांध का गेट न खोला जाए तो महासंकट उत्पन्न हो सकता है। विवाह भी एक प्रकार का सामाजिक बांध है। इसमें सब ओर ब्रह्मचर्य की सुदृढ़ दीवारें हैं। मात्र एक ही रास्ता खुलता है, वह है पति और पत्नी का। अपने पति और पत्नी में ही संतुष्ट रहना। वासना एक कसौटी है। अग्नि सोने काे परखती है और वासना मनुुष्य के मन को परखती है।

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