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जलखा में जलसा:आसान नहीं है राम की लीला को निभाना, धन कम है पर मन रमा है

बामंदी5 दिन पहलेलेखक: विजय राठौड़
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रामलीला का मंचन करते कलाकार। दृश्य में राम सीता के वस्त्र देखकर सुग्रीव और हनुमान को बताते हैं कि ये सीता के हैं। - Dainik Bhaskar
रामलीला का मंचन करते कलाकार। दृश्य में राम सीता के वस्त्र देखकर सुग्रीव और हनुमान को बताते हैं कि ये सीता के हैं।
  • जिले में बंद हो गई रामलीला की परंपरा को काशी से आए कलाकार दे रहे नया जीवन, 25 बरस से निभा रहे अपनी भूमिका

कसरावद तहसील के बामंदी गांव से 4 किलोमीटर की दूरी पर जलखा गांव में रात होते ही जलसे जैसा माहौल है। मंगलवार रात 8 बजे जब हम पहुंचे तो गांव राममय नजर आया। काशी से आए कलाकार रामलीला के मंचन में रमे दिखे। रामसेतु निर्माण के समय वानरसेना में जो उत्साह की भावना रही होगी वैसा ही उत्साह ये देख जागा कि जिले में बंद हो गई रामलीला की परंपरा को नया जीवन दिया जा रहा है। 2 हजार की आबादी वाले छोटे गांव में मंच के सामने गांव की करीब आधी आबादी बैठी दिखी।

हालांकि इनमें सबसे ज्यादा संख्या, बच्चों, बुजुर्गों व महिलाओं की रही। गांव आने के दौरान ही हमें कई घरों में टीवी चलने की आवाज आई। जिसमें न्यूज एंकर और मेहमान चीख रहे थे। कुछ युवा मोबाइल फोन पर गेम खेलते दिखे। इन सबसे अलग संगीतमय और शांत वातावरण में रामलीला राम के जीवन आदर्श, संस्कार, श्रम, नैतिकता और आचरण के मूल्य सिखाने में लगी है। रामलीला खत्म होने के बाद काशी से आए कलाकारों से बातचीत की। पवन मिश्रा राम की भूमिका निभा रहे हैं।

उमेश दुबे बने रावण, शिवमणि पांडे को सुग्रीव व पंकज शुक्ला हनुमान की भूमिका मिले। इनके सहित लक्ष्मण, सीता और अन्य वानर सेना के लोग हैं। मिश्रा ने बताया कुल 13 कलाकार हैं। 25 बरस से रामलीला कर रहे हैं। ज्यादातर वाराणसी, प्रयागराज में ही करते हैं। लेकिन महाराष्ट्र, यूपी, गुजरात और राजस्थान में भी रामलीला कर चुके हैं। जलखा से पहले महेश्वर के पास करही व पाडल्या के जिजाखेड़ी में मंचन करने आए थे तब जलखा के लोगों ने अपने गांव आने का निमंत्रण दिया था।

और ये बदलाव... टी-20 की तरह छोटे प्रारूप की रामलीला अब चलन में
कलाकारों ने बताया एक वो दिन भी थे जब सवा महीने की रामलीला होती थी। आसपास के गांव भी उमड़ते थे। हमारी रामलीला में भी पहले 40-50 कलाकार थे। अब सिर्फ 13 हैं। रामलीला 7 दिन में समेटनी पड़ती है। टी-20 की तरह छोटे प्रारूप ही अब चलन में हैं। गांव में रहने वाले संतोष मंडलोई बताते हैं लोग रामलीला देखना चाहते हैं। खासतौर पर महिलाएं। लेकिन युवाओं का रूझान कम है। मंगलवार को जैसे रामलीला में मेघनाद और कुंभकर्ण के अंत पर जनता खुश हुई काश वैसे ही एक दिन इन कलाकारों को भी धन और प्रतिष्ठा मिले और इन्हें भी खुशी हो। जो भी हो कलाकार तो राम में रमे हैं।

आसान नहीं है राम-रावण बनना

हमारे सामने ही राम बने पवन मिश्रा और रावण बने उमेश दुबे के बीच 10-15 रुपए के हिसाब को लेकर नोंकझोंक चल रही थी। इससे हमें ये अंदाजा तो लग गया कि इन कलाकारों के लिए पाई-पाई की कितनी अहमियत है। फिर भी पूछा तो जैसे घाव छू दिया हो। उमेश बोले- राम-रावण बनना आसान नहीं है। 7 दिन की रामलीला पर 20-25 हजार का खर्च आता है।

आमदनी का जरिया वो लोग हैं जो रामलीला देखने आते हैं। कोई 10-20 रुपए देता है तो कोई 50-100 और ज्यादातर कुछ नहीं। अगले दिन सुबह हम उस इलाके के व्यापारियों से सहयोग राशि मांगते हैं। कभी-कभी 500-1000 रुपए मिल जाते हैं। लेकिन सब मिलाकर और खर्च काटकर 13 लोगों के हिस्से 2-4 हजार रुपए भी नहीं आते। गांव वाले लोग खाने को दे देते हैं तो थोड़ी मदद हो जाती है। श्रावण से कार्तिक माह तक मंचन करते हैं। यानी 4 महीने। उसके बाद अपने-अपने गांवों में थोड़ी बहुत खेती करते हैं। सभी 13 कलाकार ब्राह्मण हैं इसलिए गांव और आसपास पूजा-पाठ, शादी-ब्याह के कार्यक्रम से भी रोजी-रोटी चलाते हैं।

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