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रोजगार संकट:कुंदा में से रेत निकालने दो या हमें इच्छामृत्यु दो

खरगोनएक महीने पहले
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  • 8 गांवों के 150 से ज्यादा लोग रैली में पहुंचे, बोले-किनारे से निकालेंगे रेत ताकि जीवों को न हो नुकसान

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की रेत खदानों पर रोक से नदी किनारे के मजदूरों का रोजगार बंद हो गया है। इसे लेकर कुंदा किनारे के 8 से ज्यादा गांवों के 150 से ज्यादा मजदूर रैली में जिला मुख्यालय पहुंचे। उन्होंने कहा कि रोजगार दो या इच्छामृत्यु दे दो। मजदूरों ने आजीविका का संकट बताकर खदान की वैकल्पिक तौर पर चालू करने की मांग की। अपर कलेक्टर एमएल कनेल को कलेक्टर के नाम पत्र सौंपकर कहा कि 9 साल बाद काली रेत खदानों के ठेके हुए हैं लेकिन पिछले 6 माह से खदान मालिक चालू नहीं कर रहे हैं। उनका कहना है कि एनजीटी के आदेश से 1 अक्टूबर तक खदान शुरू नहीं की जा सकती है। एनजीटी के आदेश में प्रावधान है कि नदी के अंदर जलीय जीव जंतुओं को नुकसान हो सकता है। जबकि हम नदी के अंदर से रेत न लाकर किनारे से लाते हैं। मांगरूल, भाडली, भसनेर, उमरखली, मोहना, आवली, बिस्टान, पेनपुर क्षेत्र में ज्यादातर परिवार रेत खनन की मजदूरी करते हैं। मानवीय आधार पर ऐसी व्यवस्था हो ताकि खनिज की चोरी भी न हो और मजदूरों को रोजगार भी मिलता रहे। एडीएम ने नियमानुसार कार्रवाई का भरोसा दिलाया।

रेत व्यवसायी बोले- रॉयल्टी चुकाकर लाते हैं रेत
बालू रेत व्यवसायियों ने भंडारण में आ रही समस्याएं दूर करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि होशंगाबाद, आलीराजपुर व गुजरात से डंपर, आईवा व लोडेड वाहनों से विधिवत राॅयल्टी चुकाकर शहर में बालू रेत लाकर एकत्रित कर बेचते हैं। ग्राहक की मांग पर थैलियों से या ट्रॉलियों से शहर बेचते हैं। ज्यादातर मांग के मुताबिक ट्रॉलियों से रेत भिजवाना होती है। दोबारा रॉयल्टी कैसे चुकाना विधिवत अनुचित है।

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