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नेपा लिमिटेड:5 साल में शुरू हो जाना था कागज का उत्पादन, 15 फीसदी भी काम पूरा नहीं

नेपानगरएक महीने पहले
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  • 6 देशी-विदेशी कंपनियां कर रही मिल में काम, लाॅकडाउन में भी दोबारा शुरू हुआ था काम

469.41 करोड़ रुपए की लागत के नेपा लिमिटेड प्रोजेक्ट का काम 5 साल बाद भी महज 15 फीसदी ही पूरा हो पाया है। जबकि अब तक मिल को खड़ाकर यहां से कागज उत्पादन का काम भी शुरू कर दिया जाना चाहिए था, लेकिन कुशल प्रबंधन के अभाव में लगातार मिल का काम लेट हो रहा है। इसके बीच कुछ अनुभवहीन और जिम्मेदारी से बचने वाले लोग जिम्मेदार हैं जो मिल को दोबारा खड़ा करने में देरी पर देरी किए जा रहे हैं। इससे निजी मिलों को लाभ भी पहुंच रहा है। परंतु वरिष्ठ प्रबंधन आंखें मूंदे बैठा है। नेपा मिल में 25 जुलाई 2016 से उत्पादन बंद है। यानी कमाई का कोई जरिया नहीं है इसके बावजूद अधिकारी, कर्मचारियों द्वारा इसे दोबारा अस्तित्व में लाने के जो प्रयास किए जाने चाहिए, वह नाकाफी साबित हो रहे हैं। अब तक मिल प्रबंधन 15 फीसदी से आगे काम ही नहीं कर पाया। जबकि यहां देश-विदेश की छह बडी नामी कंपनियां भी काम कर रही हैं। यहां आधुनिक विदेशी मशीनों के सहारे उम्दा क्वालिटी का न्यूज प्रिंट तैयार होगा। कई मशीनें चाइना से लाकर यहां लगाई गई है। मार्डनाइजेशन के कारण मिल का प्रोडक्शन करीब पांच साल से बंद होने के बावजूद कभी भी यहां के काम में तेजी नहीं देखी गई।

शहर के युवाओं को भी स्थानीय स्तर पर नहीं मिल रहा रोजगार
कोरोना संक्रमण के कारण लगे लाॅक डाउन के कारण अधिकांश युवाओं का रोजगार छिन गया है। ऐसे में स्थानीय युवा नेपा लिमिटेड में ही रोजगार मुहैया कराने की मांग भी उठा रहे हैं। उनका कहना है कि स्थानीय स्तर पर युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा है। नेपा मिल में करोड़ों की लागत से काम चल रहे हैं। ऐसे में यहां उन्हें भी काम का अवसर मिलना चाहिए। नगर के युवा पवन बोरासी, खोमेश फिरके, अंकित पांडे, पंकज पोनकाती, तुषार सोनवणे ने कहा हम लाॅक डाउन के कारण बेरोजगार हो गए हैं। ऐसे में नेपा लिमिटेड में ही काम मिलना चाहिए। इन दिनों अधिकांश मजदूर व अन्य लाॅक डाउन के कारण अपने घरों को जाने के बाद वापस नहीं लौटे हैं। उनके स्थान पर स्थानीय युवाओं को अवसर मिलना चाहिए।

देरी की एक वजह यह भी-सामंजस्य का पूरी तरह अभाव, राशि का अपव्यय
देरी एक वजह परस्पर सामंजस्य का अभाव है। जिसके कारण यह परियोजना लगातार पिछड़ती जा रही है। ऐसे में प्रोजेक्ट के लिए मिली करोड़ों की राशि का अपव्यय हो रहा है। साथ ही कर्मचारियों में प्रबंधन के प्रति आक्रोश भी है। कहीं न कहीं वरिष्ठ अधिकारी भी इसके लिए जिम्मेदार हैं कि वह यहां काम समय पर नहीं करा पा रहे हैं। क्योंकि प्रोजेक्ट को पांच साल हो गए हैं और अब तक इतना कम काम हुआ है। राशि का  अपव्यय भी जारी है। यही हाल रहे तो ऐसा न हो कि राशि खत्म हो जाए और प्रोजेक्ट ही शुरू न हो। जनप्रतिनिधि भी लगातार मॉनीटिरिंग नहीं कर रहे। नतीजा अफसरों की सुस्ती दूर नहीं हो रही। केंद्र सरकार ने रिवाइवल प्रोजेक्ट को मंजूरी दी है लेकिन दिल्ली से भी फीडबैक नहीं मंगाया जा रहा है।

मार्डनाइजेशन के बीच काम छोड़ गई एक कंपनी 

  •  पहले दिसंबर 2019 तक एक युनिट शुरू होने की उम्मीद जताई जा रही थी, लेकिन काम धीमा होने के कारण ऐसा नहीं हो सका। बाद में मार्च 2020 तक एक यूनिट चालू करने की उम्मीद जागी थी, लेकिन देशी-विदेशी कंपनियों की काम की गति धीमी रही। डी-इंकिंग प्लांट का काम अधूरा है। यह काम अब तक पूरा हो जाना चाहिए था।
  •  मार्डनाइजेशन के दौरान एक विदेशी कंपनी काम छोड़कर चली गई थी। जिसे काफी प्रयासों के बाद वापस लाया गया। काम चालू हुआ, लेकिन गति धीमी थी और अब भी धीमी है। 

पेपर मशीन के वह काम जो अब तक अधूरे हैं

 रेटरो फिटिंग, फिशिंग हाउस, वाटर पाइप लाइन इंस्टालेशन, फाउंडेशन, वायर पार्ट जो आदि अधूरे हैं। जबकि कुछ काम तो ऐसे हैं जिनकी प्रोग्रेस जीरो है। सबसे हैरानी की बात ये है कि इन कामों की प्रोग्रेस जीरो होने के बाद भी जो तेजी और गंभीरता दिखाई जानी चाहिए वो नदारद है। सैकड़ों लोगों के रोजगार और समूचे नेपानगर की अर्थव्यवस्था से जुड़े होने के बाद भी लापरवाही जारी है। अफसरों की मनमानी दूर होने पर ही अब काम में तेजी से संभाव है।

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