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  • Betul's Potter, Who Came To Relieve The Pot In The Heat, Got Caught In The Mishap Due To No Sale; He Said: The Fare Of 30 Thousand Was Paid, Due To The Hunger Of Lying Hungry

कोरोना कर्फ्यू का असर:गर्मी में मटके लेकर राहत देने आए थे बैतूल के कुम्हार, बिक्री नहीं होने से आफत में फंसे; बोले - 30 हजार रु. भाड़ा चुकाया, अब भूखे रहने की नौबत

खंडवा6 महीने पहले
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सिविल लाइन रोड पर मटका व्यवसाय करते कुम्हार। - Dainik Bhaskar
सिविल लाइन रोड पर मटका व्यवसाय करते कुम्हार।

गर्मी के सीजन में लोगों को राहत देने के लिए बाहरी जिलों के व्यवसायी या कुम्हार मटके बेचने खंडवा आए हैं। कोरोना कर्फ्यू के चलते इनका व्यवसाय ठप हो गया है। पहले ही बैतूल से खंडवा के लिए 30 हजार रुपए का भाड़ा ट्रांसपोर्टर को दे चुके हैं। धंधा ठप होने से अब दो वक्त की रोटी भी मुश्किल हो रही है, जबकि वे इस कारोबार में मुनाफे से मटका निर्माण की लागत व आगे के लिए कच्चा माल समेत परिवार का भरण-पोषण कर लेते हैं।

गर्मी में बैतूल से पानी के मटके बेचने खंडवा आए कुम्हारों की कोरोना कर्फ्यू के चलते हालात खराब हैं। कोरोना कर्फ्यू के पहले ये लोग खंडवा आए थे, उन्हें क्या पता था एक बार फिर कोरोना संक्रमण तेजी से फैलने लगेगा। कर्फ्यू में अब इन कुम्हारों की हालत यह है कि पेट भरने के लिए भी मोहताज हो गए हैं। इन्हें भी मदद की दरकार है।

बैतूल जिले के खंडवा में कई लोग मटके बेचने आते हैं। भोजन पकाते महिला।
बैतूल जिले के खंडवा में कई लोग मटके बेचने आते हैं। भोजन पकाते महिला।

ये लोग सड़क किनारे ही मटके बेचते हैं। दिन-रात यहीं पर जीविका चलाते हैं। सड़क किनारे तपती गर्मी के बीच बैठकर ग्राहकों का इंतजार करते यह लोग अब बड़ी दुविधा में हैं। माल लेकर वापस जा नहीं सकते। इक्का-दुक्का बिकने वाले मटकों की स्थाई पूंजी खाकर पेट भर रहे हैं। मटके बनाने के लिए पिछले बारिश के सीजन से ही काम शुरू कर दिया था। इसी उम्मीद में कि इस बार गर्मी में कुछ कमा लेंगे, जिससे साल भर की राहत हो जाएगी, लेकिन कोरोना संक्रमण की वापसी ने पानी फेर दिया।

6 महीने मिट्टी खरीदकर मटके बनाते और पकाते हैं

कुम्हार अर्जुन प्रजापति का कहना है कि कोरोना कर्फ्यू के बाद भूखे मरने की नौबत देखते हुए बड़े बच्चों को तो रिश्तेदारों के साथ वापस भेज दिया, लेकिन छोटे बच्चे इनके साथ ही हैं। आजीविका का एकमात्र साधन यही है। खेती-बाड़ी नहीं है, 6 महीने मिट्टी खरीदकर मटके बनाते और पकाते हैं। इसी उम्मीद में कि गर्मी के सीजन में लोगों को ठंडा पानी पिला सकें और परिवार पाल सके, लेकिन लॉकडाउन के कारण वर्तमान के साथ भविष्य भी बर्बाद होता दिखाई दे रहा है।

यहां की मिट्‌टी के मटके अच्छे होते हैं

कुम्हार संतरी बाई के मुताबिक खंडवा में हर साल बैतूल और होशंगाबाद से कई परिवार मटके बेचने आते हैं। हमारे मिट्टी की तासीर ही ऐसी है, इस मिट्टी से बने मटके पानी को ठंडा करने में ज्यादा अच्छे होते हैं। इस कारण यहां इनकी मांग भी ज्यादा होती है। कोरोना कर्फ्यू की वजह से जनता बाहर नहीं निकल रही। इसी कारण धंधा चौपट हो चला है। यदि कोरोना कर्फ्यू लंबा खीच गया। बारिश का मौसम शुरू हो गया, तो मटकों का बोझ स्थिति ज्यादा खराब कर देगा।

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