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गो-काष्ठ से होलिका दहन:गणेश गोशाला व अन्य स्थान से 50 क्विंटल गो-काष्ठ खरीदी

खंडवाएक महीने पहले
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गणेश गोशाला में तैयार गो-काष्ठ से लोगों से होलिका दहन किया। पर्यावरण प्रेमियों ने होलिका दहन के लिए गोशाला एवं एक निजी फर्म में तैयार लगभग 50 क्विंटल गो-काष्ठ की खरीदी की।

फरवरी से गणेश गोशाला में गाय के गोबर से काष्ठ तैयार की जा रही है। गणेश गोशाला से जुड़े भूपेंद्रसिंह चौहान ने बताया गो-काष्ठ को लेकर लोगों में जागरूकता है। होलिका दहन के लिए व्यक्ति व संस्थाओं के लोग अपनी आवश्यकता अनुसार गो-काष्ठ गोशाला से ले गए। दो माह में गोशाला में अच्छी तादाद में गो-काष्ठ का निर्माण किया था। साथ ही सिद्धिपुरम में दीपसिंह झाला भी गो-काष्ठ का निर्माण कर रहे हैं। वहां से भी लोगों ने होलिका दहन के लिए गो-काष्ठ लिया। रविवार को ब्रह्माणपुरी, भवानी माता, सिंधी कॉलोनी में 4 स्थानों, आनंद नगर, गुर्जर हॉस्पिटल के पास महावीर उद्यान, लकड़ी डिपो के पास एनवीडीए कॉलोनी, सिद्धिपुरम में गो-काष्ठ से होली जलाई गई। गो-काष्ठ से होली जलाकर पर्यावरण प्रेमियों ने पर्यावरण संरक्षण व वृक्ष बचाओ का संदेश दिया।

कोरोना से बेरंग हो गई होली, 25% रह गया रंग-पिचकारी का बाजार

इस साल कोरोना संक्रमण के चलते होली बेरंग हो गई। रंग और पिचकारी का बाजार 25% भी नहीं रहा। जो दुकानें 15 दिन पहले लगा करती थीं, अब दो दिन पहले लगने पर भी ग्राहकी नहीं दिखाई दी। कोरोना ने सभी त्योहारों का रंग फीका कर दिया है। वर्षों से रंग और पिचकारी का व्यापार करने वाले भी इस साल हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।

रंग बेचना पुश्तैनी काम, 70 साल में पहली ऐसी होली

बांबे बाजार में बरसों से रंग बेच रहे आबिद अली रंगवाला (80) ने जानकारी देते हुए बताया कि पुश्तों से रंग बेचते आ रहे हैं, मगर ऐसी होली पहली बार देखी। 15 दिन पहले दुकान पर भीड़ होती थी, यहां एक दिन पहले ग्राहक ही नहीं है।

पिचकारी का रंग भी फीका : पिचकारी व्यवसायी अमर ने बताया कई सालों से पिचकारी बेच रहे हैं, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है जब एक दिन पहले दुकान लगाने पर भी माल नहीं बिक रहा। इस साल दाम भी नहीं बढ़े फिर भी खरीदार नहीं दिख रहे। पहले भगोरिया, हाट बाजार लगते थे तो माल आसपास के ग्रामीण अंचलों में भी जाता था, लेकिन इस साल ऐसी बिक्री नहीं हुई।

लगे एक ही ढ़ग, बंगाली पिचकारियां मोदीजी का रंग

होली का त्यौहार "बैर मिटाने' का उत्सव है। मतलब जो हो गया "भूलो रे' इस चिंतन का त्यौहार है। "बैर मिटाने' का दूसरा अर्थ भी भाई लोग निकाल लेते हैं। इसका मतलब "हिसाब किताब' बराबर करना। राजनीति में तो दूसरे वाला अर्थ ही इस्तेमाल किया जाता है।

मथुरा वृंदावन की होली भी इसीलिए दो तरीके से मनाई जात है। "रंग वाली' और दूसरी "लट्‌ठ वाली' भी। "रंग वाली' गरीब गुरबो की कह लीजिए। आप-हम सरीखे सीधे मानुष की या लिक्खड़ टाइप के प्राणियों की। दूसरी वाली लट्‌ठ प्रणीत होली राजनैताओं की प्रिय रही है। अभी तो चैन्नई से लेकर कोलकाता तक चुनाव ही चुनाव है। स्मृति ईरानी चैन्नई में महिलाओं के साथ झूमर नृत्य कर रही है तो बंगाल में अमित शाह और योगी मिलकर दीदी की होली खराब करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। दीदी भी पैदल सड़क पर कभी हम कवियों की तरह मंच पर तो कभी "रगड़ कुर्सी' पर बैठकर अकेली ही पूरी बीजेपी को हलाकान किए हुए हैं।

ये मिदनापुर तो वो चौबीस परगना। ये जलपाईगुड़ी तो वो दार्जिलिंग। खैर, हम होली की बात कर रहे थे। होलिका का दहन और प्रहलाद का सुरक्षित बचना। यह आज के दौर की सबसे बड़ी चुनौती है। आतंकवाद की होली, भ्रष्टाचार की होली, राजनीतिक लोगों के झूठे वादों की होली, पेट्रोल-डीजल के भावों की होली, कोरोना वायरस की होली, अवैध घुसपैठ की होली, जातिवादी विचारधारा की होली, गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और अज्ञानता की होली। इन सबका दहन जरूरी है और तभी हम आम जनता रूपी निष्कलुष प्रहलाद को बचा पाएंगे। होली का त्यौहार केवल रंगों का त्यौहार केवल रंगों का त्यौहार नहीं है। खुद के भीतर ही खुद का रंग तलाशें तो बात चल रही थी चुनावों की। हम चले गए दर्शन के गलियारों में। तो भैया इस समय क्या देश क्या विदेश। हर घोंसलों के अंदर चिड़िया क्या और उसके चूजे क्या? सभी एक ही नाम की रट लगाए हुए हैं। वह नाम है मोदी। तो एक दोहे से आपको होली की रंगीन शुभकामनाएं देते हुए अपनी कलम पर नया रंग छिड़कते हैं- पूरब से पश्चिम तलक, लगे एक ही ढंग। बंगाली पिचकारियां मोदी का रंग।

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