दादा ने 8 महीने के पोते को दी नई जिंदगी:अपने लिवर का एक चौथाई हिस्सा देकर बचाई जान; जन्म से पीड़ित था नवजात

अमित जोशी, बड़वाह2 महीने पहले

जन्म लेने के 8 महीने बाद ही बच्चे के लिवर ने ठीक से काम करना बंद कर दिया। इससे पहले कि वो ठीक से दुनिया देखने जितना बड़ा हो पाता उसकी जिंदगी ही खतरे में पड़ गई। तभी उसके दादा सामने आए। उन्होंने अपने लिवर का 25 प्रतिशत हिस्सा देकर न सिर्फ पोते की जिंदगी बचाई बल्कि परिवार से दूर जा रही खुशियों को एकबार फिर समेट लाए।

आइए आपको बताते हैं दादा-पोते की ये इमोशनल कहानी।

खरगोन जिला मुख्यालय से करीब 70 किमी दूर है कातोरा गांव। सनावद तहसील के इस गांव में रहने वाले साध परिवार में 8 महीने पहले खुशियों ने दस्तक दी। परिवार में एक बेटे का जन्म हुआ। मां वैशाली और पिता पवन ने उसका नाम रखा-भौतिक। कुछ ही दिनों में भौतिक की तबीयत बिगड़ने लगी। फिर शुरू हुआ डॉक्टर्स और अस्पताल के चक्कर लगना।

जांच में पता चला कि भौतिक का लिवर सामान्य तरीके से काम नहीं कर रहा। इसे बदलने में 21 लाख का भारी-भरकम खर्च तो था ही साथ ही लिवर ट्रांसप्लांट के लिए लिवर का इंतजाम भी मुश्किल था। तब भौतिक के 47 साल के दादा भैयालाल साध ने जान की परवाह नहीं करते हुए लिवर का 25 प्रतिशत हिस्सा उसे बचाने के लिए दे दिया। अब भौतिक के परिवार में खुशियां लौट आई हैं। पर ये सबकुछ इतना आसान नहीं रहा।

मुंबई में हुआ ऑपरेशन
इलाज के लिए परिजन भौतिक को मुंबई लेकर गए। जहां ऑपरेशन करते हुए डॉक्टरों ने दादा के लिवर का एक चौथाई हिस्सा निकालकर भौतिक को लगा दिया। पूरी तरह ठीक होने के बाद भौतिक अपना सामान्य जीवन जी पाएगा। लिवर ट्रांसप्लांट सफल होने के बाद परिवार दोनों के सकुशल लौटने की कामना कर रहा है। फिलहाल, अस्पताल स्टाफ NICU में भर्ती भौतिक को वीडियो कॉल से परिवार को दिखाते हैं।

मुंबई के अस्पताल से वीडियो कॉल पर भौतिक को रोज माता-पिता को दिखाया जा रहा है।
मुंबई के अस्पताल से वीडियो कॉल पर भौतिक को रोज माता-पिता को दिखाया जा रहा है।

ऑपरेशन के बाद मुंबई से लौटी भौतिक की मां वैशाली ने बताया...
भौतिक का जन्म फरवरी 2022 में हुआ था। वह कुछ दिनों तक ही ठीक रहा। फिर अचानक से उसकी तबीयत खराब होने लगी। उसे पहले बुखार आया, उसका इलाज चल ही रहा था कि उसे पीलिया भी हो गया। पीलिया होने पर उसे सनावद में दिखाया। वहां भी उसे आराम नहीं मिल रहा था, तो हम उसे बड़वाह लेकर गए, लेकिन वहां भी हमारा समय ही खराब हुआ। इंदौर में भी हमने दो डॉक्टर बदल दिए, लेकिन कहीं पर भी भौतिक को आराम नहीं मिल रहा था।

हम काफी परेशान थे। मेरे मन में बच्चे को लेकर डर बढ़ता जा रहा था। फिर किसी ने हमें इंदौर में डॉक्टर जफर खान के बारे में बताया। हमने उन्हें दिखाया। भौतिक यहां कुछ दिन तक ठीक रहा, लेकिन फिर उसकी तबीयत खराब हो गई। डॉ खान ने अपने साथ स्पेशलिस्ट डॉक्टर निदा खान से कंसल्ट किया। उसके बाद बेंगलुरु और मुंबई में जांच के लिए रिपोर्ट भेजी गईं। इस दौरान हम भगवान से प्रार्थना कर रहे थे कि सब ठीक ही हो। लेकिन जब रिपोर्ट आई तो ऐसा लगा जैसे सब कुछ खत्म हो गया हो।

डॉक्टर ने बताया कि भौतिक का लिवर धीरे-धीरे खराब हो रहा है। भौतिक की जान को खतरा है, अगर उसका लिवर जल्द से जल्द ट्रांसप्लांट नहीं किया गया। यह सुनकर सब रोने लगे। मैंने कहा कि आप मेरा लिवर ले लीजिए, लेकिन मेरे बच्चे को बचा लीजिए। लेकिन डॉक्टर ने मना कर दिया। मेरा और भौतिक के पापा का ब्लड ग्रुप ए पॉजिटिव है। तब भौतिक के दादा डोनर बने। डॉक्टर ने पापा जी (भौतिक के दादा) की जांच की। दोनों का ब्लड ग्रुप भी एक था और लिवर ठीक था। दोनों का ब्लड ग्रुप ओ पॉजिटिव है।

लिवर ट्रांसप्लांट के लिए हमने तैयारियां शुरू कर दी थीं। हम जल्द जल्द भौतिक का ऑपरेशन कराना चाह रहे थे। हमने अहमदाबाद जाने का तय किया। वहां हमें किसी के जरिए मुंबई के डॉक्टर का पता चला। डॉक्टर से पता चला कि इलाज के लिए 21 लाख रुपए लगेंगे। यह एक मिडिल क्लास फैमिली के लिए बड़ी रकम है, लेकिन उसका इलाज तो करवाना ही था। इस दौरान भौतिक के नाना ने परिवार को हौसला दिया। फिर आखिरकार 24 नवंबर को मुंबई में भौतिक का लिवर ट्रांसप्लांट हुआ। दोनों अब ठीक हैं। पापा जी को जल्द छुट्‌टी मिलने वाली है। भौतिक को अभी कुछ दिन और अस्पताल में रहना पड़ेगा।

भौतिक के दादा भैयालाल साध लिवर का हिस्सा डोनेट करने के बाद पूरी तरह स्वस्थ हैं।
भौतिक के दादा भैयालाल साध लिवर का हिस्सा डोनेट करने के बाद पूरी तरह स्वस्थ हैं।

डेढ़ लाख बच्चों में एक को होती है बीमारी
इंदौर के प्री-मेच्योर शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ.जफर खान ने बताया कि इस बीमारी का नाम टायरोंसिनेमिया है। यह बीमारी डेढ़ लाख नवजातों में से एक को होती है। भौतिक को बीमारी जन्मजात थी। इसमें टायरोसिन नामक प्रोटीन लीवर में जाकर टूट नहीं रहा था, जिससे उसके लिवर में टॉक्सिन लेवल बढ़ रहा था। इसलिए भौतिक का लिवर खराब होने लगा था।

उन्होंने बताया कि यह बीमारी हमें समझ नहीं आती अगर हम अल्फा-फेटो-प्रोटीन टेस्ट नहीं करवाते। आखिर में इसकी रिपोर्ट से हमें शक हुआ। उसके बाद मुंबई से जेनेटिक टेस्टिंग कराने पर हमारा शक यकीन में बदल गया। लिवर ट्रांसप्लांट होने के बाद भौतिक जैसे-जैसे बड़ा होगा लिवर का छोटा टुकड़ा उस शरीर के साथ बढ़ता जाएगा। दादा जी के लिवर और शरीर पर भी कोई समस्या नहीं होगी।

जानिए लिवर ट्रांसप्लांट क्या है?
लिवर शरीर का एकमात्र ऐसा अंग है, जो फिर से बन सकता है। लिवर ट्रांसप्लांट में खराब हो चुके लिवर को सर्जरी द्वारा निकाल दिया जाता है। इसके बाद उसके स्थान पर पूर्ण स्वस्थ लिवर या स्वस्थ लिवर का आधा भाग मरीज को ट्रांसप्लांट कर दिया जाता है। इससे मरीज पूरी तरह से ठीक हो जाता है।

कब पड़ती है लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत
लिवर शरीर का बेहद महत्वपूर्ण अंग है, जो शरीर के हानिकारक पदार्थों के डी-टॉक्सीफिकेशन के लिए जिम्मेदार होता है। लिवर ट्रांसप्लांट की आवश्यकता उन मरीजों को होती है, जिनका लिवर खराब हो चुका हो या बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो। ज्यादातर लिवर मृत दाताओं से प्राप्त किए जाते हैं। लेकिन एक स्वस्थ व्यक्ति भी आधा लिवर दान कर सकता है। हेपेटाइटिस और सोरायसिस के कारण खराब हो चुके लिवर के रोगियों को भी लिवर प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ती है। इससे किसी को नया जीवन मिल सकता है।

कौन दे सकता है लिवर?
आमतौर पर रोगी को दो तरह से लिवर दिया जा सकता है। पहला परिवार के किसी सदस्य द्वारा लिविंग डोनर ट्रांसप्लांट से। दूसरा किसी ऐसे व्यक्ति से जिसका मस्तिष्क मृत (ब्रेन डेड) हो चुका हो, ऑर्थोटॉपिक ट्रांसप्लांट या स्पलिट डोनेशन द्वारा। इस प्रक्रिया में मृत व्यक्ति के लिवर को दो भागों में बांटकर बड़ा हिस्सा किसी वयस्क व्यक्ति को और छोटा हिस्सा किसी बच्चे को देकर दो जीवन बचाए जा सकते हैं। लिवर निकालने के 6 घंटे के भीतर लिवर ट्रांसप्लांट होना आवश्यक होता है।