मदर्स डे पर मां के संघर्ष की कहानी:कैंसर पीड़ित पति के इलाज के लिए बेचा मकान,चाकू दराती बेचकर बच्चों को खिला रही भोजन

सनावद21 दिन पहले

सनावद. मैं अपने पति व दो बच्चों के साथ जीवन यापन कर रही थी। 5 साल पहले 2017 में मेरे पति को मुंह का कैंसर हो गया। काम धंधा छुटने के कारण परिवार की स्थिति खराब होने लगी। इलाज में अधिक रुपए लगने लगे। जब पति के इलाज के लिए खर्च अधिक लगने लगा तो आखिरकार हमारा घर हमें 70 हजार रुपए में बेचना पड़ा। पूरे रुपए पति के इलाज में लग गए। बीमारी के कारण पति का 2018 में निधन हो गया। अब मेरे दो छोटे बच्चे मेरे सहारे ही रह गए। पति को देखकर दराती, चाकू व अन्य सामग्री बनाना सीख लिया था। जिसे बनाकर बेचती थी। इसके बाद बच्चों को खाना मिल पाता था। जब सामान नहीं बिकता था तो खेतों में मजदूरी का काम कर परिवार का पालन पोषण किया।

यह बात सताजना निवासी सूरज बाई कालू गडरिया ने कही। उसने बताया पति के जाने के बाद परिवार पर आर्थिक पहाड़ सा टूट गया था। खाने के लाल पड़ गए थे। सुबह से उठकर पहले मजदूरी करती थी। उससे जो रुपए आते थे। उससे दिन का खाना बनता था। कई दिनों तक हमने सिर्फ चावल बनाकर ही खाए। लोगों की मदद से पंचायत में बीपीएल कार्ड बना। जिसमें मेरा व एक ही बच्चे का नाम लिखा हुआ है। जिसके अनुसार ही अनाज मिलता है। इसके अलावा कोई शासकीय योजना का लाभ नहीं मिला रहा।

कई महीने पेड़ के नीचे जीवन काटा। पति के इलाज के लिए मकान बेच दिया था। जिसके कारण घर नहीं था। इससे कई माह तक खुले आसमान में दोनों बच्चों को लेकर रही। कुछ माह बाद भाई ने अपनी एक कुटिया रहने के लिए दे दी। जिसमें गृहस्थी का सामान भी था। सरकार से कई बार मकान के लिए गुहार लगाई लेकिन कोई सहायता नहीं मिली। सूरज बाई ने बताया मेरा जीवन तो गरीबी में कट गया लेकिन मैं अपने बच्चों को इस गरीबी वाले जीवन से निकालना चाहती हूं। इसके लिए मेहनत मजदूरी कर बच्चों को पढ़ा लिखाकर उनका भविष्य बनाना चाहती हूं ताकि वह एक सभ्य समाज का हिस्सा बन सके।

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