विश्व की इकलौती ऐसी गणेश प्रतिमा...:मंदसौर में आगे-पीछे से होते हैं दर्शन; चोला चढ़ाने के लिए 4 साल की वेटिंग

दीपक शर्मा (मंदसौर)7 महीने पहले

31 अगस्त से गणेशोत्सव शुरू हो रहा है। इससे पहले आज हम आपको द्विमुखी गणेश मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं। एक ही पाषाण (पत्थर) पर बनी 8 फीट ऊंची द्विमुखी प्रतिमा संभवतः पूरे विश्व में और कहीं नहीं है। श्री द्विमुखी चिंताहरण गणपति के नाम से ये मंदिर मंदसौर में है।

प्रतिमा 'गणेश स्थानक' है। यानी गणेश जी खड़ी अवस्था में हैं। प्रतिमा का आगे का स्वरूप पंचसुंडी (पांच सूंड) तो पीछे की तरफ गणेश भगवान सेठ की मुद्रा में हैं। पीछे के मुख में एक सूंड और सिर पर पगड़ी धारण है। ये गणेश जी को श्रेष्ठीधर सेठ के रूप में अभिव्यक्त करता है।

और एक खास बात.. आगे के मुख पर पांच सूंड है, ये विघ्नहर्ता गणेशजी कहलाते हैं। पांच सूंड की दिशा बाईं ओर है, जबकि पीछे के मुख की सूंड दाहिनी दिशा में है।

इतिहास भी जानिए, कहां से मिली प्रतिमा...
प्रतिमा 9वीं सदी की बताई जाती है। भगवान गणेश की जितनी आलौकिक यह दो रूपी प्रतिमा है, उतनी ही अनोखी इसकी कहानी भी है...

मंदिर के पुजारी सत्यनारायण जोशी ने बताया, मंदसौर में मूलचंद बसाब सर्राफ हुआ करते थे। उन्हें सपने में गणेश जी ने दर्शन दिए और शहर के नाहर सैयद तालाब से बाहर निकालने के लिए कहा। वे खुद तालाब पर गए और सपने में बताई गई जगह से कीचड़ हटाया, वहां प्रतिमा मिली।

यह बात 22 जून 1929 की है। तब शहर में धान मंडी लगा करती थी। मूलचंद जी मंडी आए और यहां जमा व्यापारियों को अपने सपने और प्रतिमा के बारे में बताया। इसके बाद सभी तालाब पर गए और गणेश जी के दर्शन किए। तय हुआ कि शहर के नर्सिंगपुरा में प्रतिमा को स्थापित करेंगे।

सभी बैलगाड़ी से प्रतिमा लेकर निकले। अभी जहां मंदिर है, उस जमाने में यहां दो नीम के पेड़ थे। बैलगाड़ी यहां तक आई, लेकिन इसके बाद आगे नहीं बड़ी। लाख जतन के बाद भी बैलगाड़ी को बैल खींच नहीं पाए। सभी ने निर्णय किया कि गणेश जी यहां ही बैठना चाहते हैं। इसके बाद प्रतिमा को यहां ही स्थापित कर दिया गया। तब इस जगह का नाम इलायची चौक हुआ करता था। प्रतिमा के स्थापित हो जाने के बाद नाम गणपति चौक हो गया।

चोला चढ़ाने के लिए करना होगा 4 साल इंतजार
द्विमुखी गणेश जी को चोला चढ़ाने के लिए 4 साल का इंतजार करना पड़ता है। मंदिर ट्रस्ट के सदस्य गोपाल मंडोवरा ने बताया कि गणेश जी को हर बुधवार को चोला चढ़ाया जाता है। चिंताहरण गणेश जी को चोला चढ़ाने के लिए भक्तों को पूरे तीन से चार साल तक इंतजार करना पड़ता है।

यह भी जान लीजिए

गणेश पुराण के अनुसार भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर भगवान गणेश का जन्म हुआ था। इस साल भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी की शुरुआत 30 अगस्त को दोपहर के 3 बजकर 34 मिनट पर होगी। यह 31 अगस्त को दोपहर 3 बजकर 23 मिनट पर खत्म हो जाएगी। पद्म पुराण के अनुसार भगवान गणेश का जन्म स्वाति नक्षत्र में मध्याह्न काल में हुआ था। इस कारण से इसी समय पर गणेश स्थापना और पूजा करना ज्यादा शुभ और लाभकारी माना जाता है।

सालभर होते रहते हैं आयोजन

गणपति चौक में विराजित द्विमुखी भगवान गणेश मंदिर में सालभर आयोजन होते हैं। दस दिनी गणेशोत्सव के दौरान विशेष आयोजन होते हैं। सवा क्विंटल के लड्डू का भोग लगाया जाता है। जिनकी मनोकामना पूरी होती है, वे विशेष अनुष्ठान करवाते हैं।
गणपति चौक में विराजित द्विमुखी भगवान गणेश मंदिर में सालभर आयोजन होते हैं। दस दिनी गणेशोत्सव के दौरान विशेष आयोजन होते हैं। सवा क्विंटल के लड्डू का भोग लगाया जाता है। जिनकी मनोकामना पूरी होती है, वे विशेष अनुष्ठान करवाते हैं।

अब मध्यप्रदेश के 4 मशहूर गणेश मंदिरों के बारे में जान लीजिए...

ग्वालियर के गणेश मंदिर में तानसेन का हकलाना दूर हुआ था

संगीत सम्राट तानसेन ने ग्वालियर के बेहट में स्थित शिवालय व गणेश मंदिर में बैठकर ही श्रीगणेश स्तोत्र की रचना की थी।
संगीत सम्राट तानसेन ने ग्वालियर के बेहट में स्थित शिवालय व गणेश मंदिर में बैठकर ही श्रीगणेश स्तोत्र की रचना की थी।

‘उठि प्रभात सुमिरियै, जै श्री गणेश देवा, माता जा की पार्वती पिता महादेवा।’ गणेश चतुर्थी पर सदियों से गाई जाने वाली ये वंदना संगीत सम्राट तानसेन की देन है। मान्यता है कि संगीत सम्राट तानसेन ने बेहट में स्थित शिवालय व गणेश मंदिर में बैठकर ही श्रीगणेश स्तोत्र की रचना की थी। बेहट के ऐतिहासिक झिलमिलेश्वर शिव मंदिर में तानसेन को आवाज मिली। वे गणेश मंदिर परिसर में ही संगीत का रियाज करते थे। बचपन में हकलाने वाले तानसेन को उनके पिता बेहट के शिवालय के बगल में बने गणेश मंदिर में दर्शन के लिए लाए थे। ग्रामीणों की मान्यता है कि यहीं गणेश जी के आशीर्वाद से तानसेन की हकलाहट दूर हुई थी और उन्हें मधुर आवाज का आशीर्वाद मिला था।

उज्जैन का चिंतामण गणेश मंदिर, बिना मुहूर्त के कराई जाती है शादी

उज्जैन के चिंतामण गणेश मंदिर में इच्छामण और सिद्धि विनायक की प्रतिमा भी है। लोग निर्विघ्न विवाह के लिए चिंतामण गणेश को मनाकर घर ले जाते हैं।
उज्जैन के चिंतामण गणेश मंदिर में इच्छामण और सिद्धि विनायक की प्रतिमा भी है। लोग निर्विघ्न विवाह के लिए चिंतामण गणेश को मनाकर घर ले जाते हैं।

उज्जैन के चिंतामण गणेश मंदिर का निर्माण राजा विक्रमादित्य के शासनकाल में हुआ था। यहां पाती के लगन लिखाने और विवाह कराने की अनूठी परंपरा है। मान्यता है कि जिनकी लगन नहीं निकल रही हो, उनका विवाह बिना मुहूर्त के यहां कराया जाता है। जिनके विवाह में बाधा आती है, वे यहां मन्नत मांगते हैं। साथ ही विवाह तय हो जाने पर परिसर में फेरे लेते हैं। विवाह के आयोजन के पहले श्रद्धालु निर्विघ्न विवाह के लिए चिंतामण गणेश को मना कर घर ले जाते हैं।

विवाह हो जाने पर वर-वधु को आशीर्वाद दिलाने लाते हैं तथा चिंतामणजी की पूजा-आराधना कर कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। मंदिर के गर्भगृह में तीन प्रतिमाएं हैं- चिंतामण, इच्छामण और सिद्धि विनायक। माना जाता है कि वनवास के दौरान भगवान श्रीराम, जानकी और लक्ष्मण यहां आए थे। उन्होंने यहां तीन प्रतिमाओं की स्थापना की थी। यहां विवाह करने के लिए हर साल 300 से ज्यादा जोड़े पहुंचते हैं।

सीहोर में श्रीयंत्र के कोणों पर स्थित है चिंतामण गणेश मंदिर

सीहोर का चिंतामण गणेश मंदिर श्रीयंत्र के कोणों पर स्थित है। ऐसी मान्यता है कि इस प्रतिमा की स्थापना राजा विक्रमादित्य के शासनकाल में हुई थी।
सीहोर का चिंतामण गणेश मंदिर श्रीयंत्र के कोणों पर स्थित है। ऐसी मान्यता है कि इस प्रतिमा की स्थापना राजा विक्रमादित्य के शासनकाल में हुई थी।

सीहोर में चिंतामण सिद्ध गणेश मंदिर में प्रतिमा आधी जमीन में धंसी है। मंदिर में स्थापित प्रतिमा को लेकर दो मान्यताएं हैं। पहली यह है कि प्रतिमा की स्थापना राजा विक्रमादित्य के शासनकाल में हुई थी। कहा जाता है विक्रमादित्य अपने देखे गए स्वप्न के आधार पर पार्वती नदी से प्राप्त कमल पुष्प को रथ पर लेकर जा रहे थे। रास्ते में रथ का पहिया जमीन में धंस गया और उस कमल से गणेश की यह प्रतिमा प्रकट होने लगी। विक्रमादित्य उसे निकालने का प्रयास कर रहे थे, पर वह जमीन में धंसने लगी। इसके बाद उन्होंने प्रतिमा यही स्थापित कर दिया।

दूसरी मान्यता के अनुसार अपने साम्राज्य का विस्तार करने निकले पेशवा बाजीराव सीहोर पहुंचे तो यहां पार्वती उफान पर थी। लोगों ने बताया कि यहां गणेशजी स्वयं विराजमान हैं। उनकी आराधना करें तो उफान उतर जाएगा। उन्होंने प्रार्थना की तो ऐसा ही हुआ। उनके निर्देशानुसार यहां मंदिर का विस्तार कराया गया। मंदिर श्रीयंत्र के कोणों पर स्थित है। तब इस कस्बे का नाम सिद्धपुर था।

इंदौर में बावड़ी से निकली खजराना गणेश प्रतिमा

इंदौर के खजराना मंदिर हर साल हजारों श्रद्धालु जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि यह गणेश प्रतिमा पास ही एक बावड़ी में मिली थी। मंदिर का जीर्णोद्धार 1735 में शुरू हुआ। तत्कालीन होलकर घराने की इच्छा थी कि प्रतिमा को राजबाड़ा लेकर आएं और यहां मंदिर बनाकर स्थापित करें। इसके लिए कोशिशें शुरू हुईं, लेकिन गणेश प्रतिमा टस से मस नहीं हुई। अंतत: इसे भगवान की इच्छा मानकर वहीं मंदिर बनाने का निर्णय हुआ। आज भी बावड़ी उसी स्वरूप में परिसर में मौजूद है। मंदिर के पुजारी पं. अशोक भट्‌ट बताते हैं कि यह प्रतिमा परमारकालीन है। इस मंदिर में हर महीने करीब 40 लाख रुपए चढ़ावा आता है। यहां के अन्न क्षेत्र में हर दिन 1800 लोग नि:शुल्क भोजन करते हैं।

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