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मुरैना के 3 गांव:यहां के वीर सपूतों ने विश्वयुद्ध से लेकर चीन और पाकिस्तान से हुए युद्धों में दी शहादत

मुरैना9 दिन पहलेलेखक: सुमित दुबे
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प्रथम विश्वयुद्ध में  शामिल होने वाले  खांड़ौली गांव के  जवानों की स्मृति  में ब्रिटिश सरकार  द्वारा लगाया गया  शिलालेख। - Dainik Bhaskar
प्रथम विश्वयुद्ध में शामिल होने वाले खांड़ौली गांव के जवानों की स्मृति में ब्रिटिश सरकार द्वारा लगाया गया शिलालेख।

चंबल की सरजमीं देशभक्ति व जनसेवा के लिए विख्यात है। पहले और दूसरे विश्वयुद्ध हो या फिर भारत-चीन, भारत-पाक, कारगिल युद्ध, इनमें मुरैना के 3 गांव ऐसे हैं, जहां के वीरों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर चंबल क्षेत्र का नाम पूरे देश में रोशन किया। तरसमा, खाड़ौली और काजीबसई ऐसे गांव हैं जहां के युवाओं ने न सिर्फ देश के लिए शहादत दी बल्कि यहां के लोग पीढ़ी दर पीढ़ी सेना में भर्ती होकर देश सेवा कर रहे हैं। गणतंत्र दिवस के मौके पर पढ़िए दैनिक भास्कर की स्पेशल रिपोर्ट...

खाड़ौली: 12 जवान पहले विश्वयुद्ध में शहीद हुए, आज भी लगे हैं शिलालेख
सिकरवारी क्षेत्र का खाड़ौली गांव पहले विश्वयुद्ध में शहादत का गवाह बना। गांव के 12 जवानों ने विश्वयुद्ध में हिंदुस्तान के नाम पर शहादत दी। मुरैना से 20 किमी दूर स्थित खाड़ौली गांव में देवालय की खुदाई के दौरान एक शिलालेख निकला है, जिसमें अंग्रेजी में लिखा है कि ग्रेटवार यानी पहले विश्वयुद्ध में खाड़ौली गांव के 12 लोग शहीद हुए हैं। शिलालेख पर यह भी लिखा है कि ये लोग ग्वालियर सिंधिया रियासत के सिपाही थे। हालांकि गांव में अब ऐसा कोई बुजुर्ग नहीं बचा है, जो इतनी पुरानी बात के बारे में जानता हो। उस समय की ब्रिटिश हुकूमत ने देश से सैनिकों को लड़ने के लिए यूरोप भेजा था। इसमें सिंधिया स्टेट के भी सैनिक थे, जिनमें खाड़ौली के 12 लोग भी शामिल थे।

तरसमा: 15 सपूतों ने देश पर न्योछावर कर दिए प्राण
पोरसा क्षेत्र में तीन हजार की आबादी वाला तरसमा गांव। इस गांव में हर तीसरे घर में एक फौजी है। देशभक्ति का जज्बा ऐसा है कि अब तक इस गांव के 15 सपूत बॉर्डर पर तैनात रहते हुए अथवा युद्ध के दौरान अपनी शहादत दे चुके हैं। इनमें गांव के सबसे पहले बलिदानी मिन्हिलाल तोमर हैं। इनके अलावा सोवरन सिंह तोमर, महाराज सिंह तोमर, दानसिंह तोमर, रामप्रकाश सिंह तोमर, कृष्ण सिंह तोमर, विनोद सिंह तोमर, सर्वेश सिंह तोमर, रामदत सिंह तोमर, गिर्राज सिंह तोमर, जगराम सिंह तोमर, रामकृष्ण सिंह तोमर, उपेन्द्र सिंह तोमर के अलावा दो अन्य शहीद भी शामिल हैं।

तंवरघार का अंबाह-पोरसा के 5 हजार से अधिक युवा सेना और अर्द्धसैनिक बल में दे रहे सेवाएं
चंबल क्षेत्र के युवाओं में सेना में शामिल होने का जज्बा ऐसा है कि यहां के 5 हजार से अधिक युवा सेना या अर्द्धसैनिक बल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। वहीं अग्निवीर योजना लागू होने के बाद भी रोज 5 हजार से अधिक युवा सेना में भर्ती होने के लिए कड़ाके की सर्दी में भी रोज सेना भर्ती की तैयारी के लिए 10 किमी की दौड़ लगा रहे हैं।

काजीबसई: हर घर में फौजी, 5-5 पीढ़ियाें से कर रहे देशसेवा
4628 की आबादी वाली काजीबसई ऐसी पंचायत है, जहां हर घर में कम से कम एक व्यक्ति आर्मी, बीएसएफ, सीआरपीएफ, पुलिस या आईटीबीपी में पदस्थ है। गांव के पूर्व सरपंच हाजी मोहम्मद रफीक भी बीएसएफ से रिटायर्ड हैं। वे बताते हैं कि हमारे गांव से साल 1914 में प्रथम विश्व युद्ध में आर्मीमैन अब्दुल वहीद शामिल हुए। दूसरे विश्वयुद्ध में गांव के 16 जवान शामिल हुए, जो उस समय ग्वालियर रियासत की आर्मी में शामिल थे और वर्ष 1940 में इंडो-जर्मन युद्ध में सहभागी बने।

1965 में भारत-पाक युद्ध में बीएसएफ से रिटायर्ड सूबेदार मोहम्मद रफीक, एसएएफ के (जिसे बाद में बीएसएफ में शामिल किया गया) मोहम्मद अब्बास, मोहम्मद गफूर शामिल हुए। 1971 के युद्ध में भारत-पाकिस्तान युद्ध में शामिल मोहम्मद रफीक को राष्ट्रपति मैडल मिला, जिनका बेटा मोहम्मद शफीक सीआरपीएफ में सब इंस्पेक्टर है। इसके अलावा हाजी मोहम्मद रफीक, मुजीबुल्ला कुर्रेशी (आर्मीमैन), मोहम्मद शाबिर व कैप्टन मोहम्मद नाजिर ऐसे नाम हैं, जिन्होंने इंडियन आर्मी में शामिल होकर गांव का नाम रोशन किया।

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