धर्म,श्रीमद् भागवत:प्रभु के स्मरण से पापों का हो जाता है नाश शास्त्री

मुरैना16 दिन पहले
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श्रीमद् भागवत कथा सभी वेदों का सार है। इसमें स्पष्ट लिखा हुआ है कि कलयुग में भवसागर को पार करने का एकमात्र जरिया सिर्फ प्रभुनाम का स्मरण है। जैसे धुंधकारी जैसा महापापी भी प्रभु नाम सुनकर कालांतर में विष्णु लोक में पहुंचा, उसी प्रकार कलयुग में भी हर व्यक्ति को प्रभु नाम का स्मरण करते रहना चाहिए।

यह बात पंडित अवध बिहारी शास्त्री ने ग्राम अजनौधा में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के दूसरे दिन कही। उक्त भावगत कथा ठाकुर रामभरोसे राजपूत (पूर्व सरपंच) द्वारा कराई जा रही है। श्री शास्त्री ने स्कन्दपुराण के अनुसार व्यास जी के जन्म की कथा विसतार से बताते हुए कहा कि द्वापर युग में पाराशर जी ने 12 वर्ष तक गंगाजी के जल के अंदर तपस्या की।

इसके बाद वे जल से बाहर निकले और ये गंगाजी के किनारे खड़े हो गए। इन्हें गंगाजी पार करनी थी। वहां एक नाव के पास कन्या खड़ी थी। इन्हौने उससे कहा कि तुम कौन हो, किसकी कन्या हो, तो उस कन्या ने कहा कि मैं केवट की कन्या हूं। धीवर के घर दासी का काम करती हूं।

उन्होंने मुझे नौका रक्षण का काम दिया है। तब ऋषि ने कहा कि तुम तो राज-कन्या हो। तब कन्या ने पूछा कि मैं कैसे राज कन्या हूं। आप मुझे बताए। तब पराशर ने कहा कि तुम चंद्रवंशी राजा वसु की पुत्री हो। वसु राजा के 700 रानियां व दस पुत्र थे। राजा की सबसे बड़ी रानी सत्यभामा तुम्हारी माता है।

एक बार राजा वसु मलेच्छो से युद्ध करने के लिए अपनी सभी सेना के समुद्र के पार गए हुए थे। वहां राजा ने उनको परास्त कर दिया और कुछ समय तक वहीं रहने लगे। इधर रानी सत्यभामा ऋतुमति हुई और राजा की प्रतीक्षा करने लगी। अपना संदेश राजा के यहां भेजने के लिए सेवक को कहा।

तब सेवक ने कहा यहां नाव नहीं है। मैं संदेश ले जाने में असमर्थ हूं। तब एक दासी ने कहा महारानी आप अपना संदेश कबूतर के द्वारा भेज दो। रानी ने ऐसा ही किया। कबूतर ने पत्र राजा के आगे डाल दिया। राजा ने संदेश पढ़के अपना तेज एक कागज में पुड़िया बनाकर कबूतर को दे दिया।

यह कहा कि यह पुड़िया रानी को दे देना। कबूतर वहां से आ रहा था। समुद्र के ऊपर उड़ रहा था। एक बाज पक्षी ने उस पुड़िया में मांस समझ कर उस पर झपट्टा मारा,पुड़िया समुद्र के जल में गिर गई।उसमें जो तेज था,उसको एक मछली ने निगल लिया था।

(यह मछली एक अद्रिका नाम की अप्सरा थी। ब्रम्हा जी के श्राप से मछली की योनि में आयी थी) उससे तुम्हारा जन्म हुआ था। उस धीमर ने उस मछली से जन्म होने के कारण तुम मत्स्यकन्या कहलाती हो। वैसे सत्यवती तुम्हारा नाम है। इसके बाद ऋषि व सत्यवती के गर्भ से यग्योपवीत पहने हुए, हाथ में माला लिए हुये स्याल वर्ण का एक बालक पैदा हुआ।

उसका नामकरण ब्रह्मा जी ने कृष्ण द्वैपायन रखा। इनका एक नाम वेद व्यास भी हुआ। जन्म होते ही यह अपनी मां को प्रणाम करके तपस्या करने जाने लगे। तब मां ने कहा कि बेटा तुम्हारे बिना मैं कैसे रहूंगी। तब व्यास जी ने कहा कि हे माँ जब तू मुझे याद करेगी, तभी तेरा बेटा तेरे पास खड़ा मिलेगा।

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