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10 साल से बेटी लापता, मां-बाप बोले-पता नहीं कहां-कैसी होगी?:MP के उन मां-बाप का दर्द, जो गुम लाड़लियों के लिए भटक रहे

भोपाल/सागर3 महीने पहलेलेखक: संतोष सिंह

मानव तस्करी को लेकर दैनिक भास्कर ऐप की पड़ताल की सीरीज की यह तीसरी कहानी है। इसमें उन मां-बाप का दर्द जानिए, जो अपनी गुम हुई लाड़लियों का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन उनके लौटने की उम्मीदें उनकी फोटो की तरह धुंधली हो गई हैं।

मानव तस्करी के चलते चर्चा में आए MP के सागर जिले के वीरपुरा गांव में 8 साल की मासूम बिकने से बच गई। इसी गांव के कई मां-बाप 10 साल से अपनी बेटी के लौटने की आस लगाए बैठे हैं। गुना के गजेंद्र सिंह चंदेल की कहानी सुनकर तो आंखें ही भर आएंगी। पिछले 5 साल से अपनी इकलौती बेटी की तलाश में दर-दर भटक रहे गजेन्द्र की 6 बीघा खेती की जमीन तक बिक गई। गजेंद्र ने 5 साल से घर में चूल्हा भी नहीं जलाया है।

सागर की बेटी मामा के घर जाने निकली, फिर नहीं लौटी
सबसे पहले बात कर लेते हैं सागर जिले के बृजमोहन मिश्रा की... इनकी 3 बेटियों में सबसे छोटी कमोदनी मिश्रा तब 15 साल की थी। उससे बड़ी दो बेटियों की अब शादी हो चुकी है। दो बेटों में सनद कुमार बड़ा और परम छोटा है। पत्नी उर्मिला संग उस घड़ी को याद करते हुए बृजमोहन कहते हैं कि बात 8 दिसंबर 2012 की है। मेरी बेटी रात 8.30 बजे के लगभग गांव में रहने वाले मामा रवि प्रसाद पाराशर के घर जाने का बोलकर निकली, तो आज तक नहीं लौटी। वह वहां पहुंची ही नहीं थी।

कमोदनी की यह दस साल पुरानी तस्वीर धुंधली हो गई, लेकिन वो आज तक नहीं मिली।
कमोदनी की यह दस साल पुरानी तस्वीर धुंधली हो गई, लेकिन वो आज तक नहीं मिली।

गांव से 10 किमी दूर जैसीनगर थाने में शिकायत की, लेकिन पुलिस ने पावती लेकर रख ली। बृजमोहन कहते हैं कि बेटी को गायब करने वाली दो महिलाओं की नामजद शिकायत की थी, लेकिन पुलिस ने FIR दर्ज नहीं की। इन दो महिलाओं में से एक पर फिर 8 वर्षीय बालिका के अपहरण कराने का आरोप भी है।

उसी संदेही महिला की नाबालिग भतीजी इस बालिका को लेकर सागर के करीला क्षेत्र पहुंची थी। जहां से मासूम को मानव तस्करी में लिप्त बसंती कोलकाता निवासी अंतुर राय के साथ भेजने वाली थी। इस बार पुलिस की तत्परता ने मासूम को बचा लिया और इस रैकेट का भंडाफोड़ कर दिया।

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यादों के नाम पर धुंधली सी तस्वीर, पता नहीं अब कैसी दिखती होगी
परिवार के पास कमोदनी की धुंधली सी तस्वीर है। चेहरा तक स्पष्ट नहीं है। पिता बृजमोहन ने बताया कि पुलिस कहती है कि बेटी को पहचान लोगे, बताओ 10 साल बाद कैसी दिखती होगी, हम कैसे बता पाएंगे। मां उर्मिला कहती हैं कि बेटी के एक पैर में जलने का निशान है, यदि प्लास्टिक सर्जरी नहीं हुई होगी तो वह निशान नहीं मिटा होगा। वही निशान मेरी बेटी की पहचान है। आज भी इस परिवार को भरोसा है कि संदेही महिला से पुलिस एक बार सख्ती से पूछताछ कर ले तो बिटिया मिल जाएगी। उनका दावा है कि उस महिला ने मेरी बेटी को किसी को बेच दिया है। मानव तस्करी का मामला सामने आने के बाद जयश्रीनगर पुलिस नए सिरे से इस मामले की जांच में जुटी है।

वीरपुरा गांव जहां बेटियां खौफजदा हैं, कहीं कोई उन्हें अगवा न कर ले।
वीरपुरा गांव जहां बेटियां खौफजदा हैं, कहीं कोई उन्हें अगवा न कर ले।

अगवा होने का खौफ, वीरपुरा की बेटियों ने स्कूल जाना छोड़ा
10 साल पहले कमोदनी और अब 14 व 8 वर्षीय बच्चियों के गायब होने के बाद से वीरपुरा गांव में दहशत का आलम ये है कि गांव की बेटियों ने स्कूल जाना ही बंद कर दिया है। गांव में ही स्कूल है, लेकिन किसी अभिभावकों की हिम्मत नहीं हो रही है कि अपनी बेटियों को पढ़ने भेजें। खासकर आंगनबाड़ी केंद्र में कार्यरत उस संदेही महिला के ड्यूटी पर आने के बाद तो एक भी बच्ची स्कूल नहीं जाती हैं। स्कूल के प्रधानाध्यापक प्रकाश सिंह गौड़ कहते हैं कि स्कूल में 73 बच्चे पढ़ रहे हैं। 30 जुलाई की घटना के बाद से बच्चों में डर है। अभिभावक भी बोलते हैं कि जवाबदारी लें, पर हम तो स्कूल की जिम्मेदारी ले सकते हैं। रास्ते में से कोई गायब हो जाए तो हम क्या करेंगे?

इकलौती बेटी को खोजने के लिए हाईकोर्ट में लगाई बंदी याचिका
बृजमोहन मिश्रा और उर्मिला की तरह ही गुना के सिरसी निवासी गजेंद्र सिंह चंदेल का भी दर्द है। इकलौती बेटी का जिक्र करते ही उनकी आंखें भर आती हैं। कहते हैं कि मेरी पत्नी रतनबाई का 2012 में निधन हो गया था। उस समय बिटिया 12 साल की थी। मां-बाप बनकर उसे पाला। नौवीं के बाद बेटी ने पढ़ाई छोड़ दी थी। मेरे परिवार में हम बाप-बेटी ही हैं।

बच्ची के जन्म में बहुत मुश्किलें आईं। उसके पहले 6 बच्चे गर्भ में ही मर गए थे। पत्नी को मिर्गी आती थी। जब ये बच्ची गर्भ में आई, तो मैंने पत्नी को काम नहीं करने दिया। दिन-रात उसका ख्याल रखता था। 7वें महीने में प्री-मैच्योर डिलीवरी हो गई। डॉक्टर ने उसका विशेष ध्यान रखने के लिए कहा। बेटी के लिए 54 हजार का तो बकरी का दूध ला-लाकर पिलाया।

1 अगस्त 2017 की तारीख थी। बिटिया कंट्रोल की दुकान से घासलेट (केरोसिन) लेने गई थी। सुबह के 11 बजे का वक्त रहा होगा, इसके बाद लौट कर नहीं आई। रिपोर्ट करने आरौन थाने गया तो तत्कालीन TI अभय प्रताप सिंह परमार ने 14 दिन तक FIR नहीं दर्ज की। ऐसा लगता है कि बेटी के गायब होने के पीछे उनका भी हाथ था।

गजेंद्र के लिए अब हाईकोर्ट ही सहारा है। उनकी इकलौती बेटी 2017 से लापता है।
गजेंद्र के लिए अब हाईकोर्ट ही सहारा है। उनकी इकलौती बेटी 2017 से लापता है।

थाने से लेकर SP, IG तक गुहार लगाई। जब कुछ नहीं हुआ तो हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका लगाई। अब हाईकोर्ट के निर्देश के बाद पुलिस फिर से सक्रिय हुई है। खुद ग्वालियर IG श्रीनिवास वर्मा इस केस की मॉनिटरिंग कर रहे हैं। बंदी प्रत्यक्षीकरण का मतलब है 24 घंटे संबंधित को कोर्ट में पेश करना। 17 अगस्त को वे पीड़ित के गांव भी जांच करने पहुंचे थे। रुआंसे से होकर पिता गजेंद्र ने कहा, साहब! बेटी ही तो मेरा सब कुछ थी। जब से बेटी गई है, तब से चूल्हे पर कढ़ाई नहीं चढ़ाई। बेटी को पालने और ढूंढने में 6 बीघा जमीन बेच दी। मेरी बेटी नहीं मिली ताे आत्मदाह कर लूंगा।

पुलिसवालों को विशेष ट्रेनिंग दिलानी पड़ी
हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में थाना प्रभारी से लेकर, ASP टीएस बघेल, SP निमिष अग्रवाल, IG श्रीनिवास वर्मा तक को पेश होना पड़ा। हलफनामा देकर रोड मैप बताना पड़ा। कोर्ट के आदेश पर ग्वालियर-चंबल अंचल के 8 जिलों के करीब 300 से ज्यादा सब इंस्पेक्टर को इन्वेस्टिगेशन स्किल्स की ग्वालियर के IIITM संस्थान में दो दिवसीय बिहेवियर एंड एटीट्यूशनल चेंज इन पुलिसिंग इन्वेस्टिगेशन स्किल्स की ट्रेनिंग दिलाई गई।

MP से गायब होने वाली बच्चियों के साथ क्या होता है
NCRB 2021 की रिपोर्ट के मुताबिक MP में हर साल 6 हजार से अधिक गुमशुदगी दर्ज हो रही हैं। इसमें 1400 से अधिक केस नाबालिग बच्चियों के शामिल हैं, पर पुलिस इसमें से 40 प्रतिशत बच्चियों को ही ढूंढ पाती है। इसमें से भी अधिकतर की जिंदगी बर्बाद हो चुकी होती है। कारण है कि नाबालिग उम्र में ही कई मां बन चुकी होती है। कुछ को देह व्यापार के दलदल में धकेल दिया गया होता है।

MP में मानव तस्करी पर काम करने वाले आवाज जनकल्याण समिति के प्रशांत दुबे के मुताबिक प्रदेश में लिंगानुपात में कमजोर वाले जिलों में सबसे अधिक लड़कियों की खरीद-फरोख्त होती है। एक किस्सा सुनाते हैं कि पिछले महीने छतरपुर में ओडिशा की 14 वर्षीय किशोरी को एक 43 वर्षीय व्यक्ति के यहां से मुक्त कराया गया था। मां-बाप ने ही उसे गरीबी के कारण बेच दिया था। लड़कियों के गायब होने के पीछे भी यही थ्योरी काम कर रही है। खासकर सागर और छतरपुर में सबसे शादी वाली लड़कियों की डिमांड है।

कटनी और गुना मानव तस्करी का ट्रांजिट पॉइंट
प्रदेश में ओडिशा, बंगाल और झारखंड से लड़कियां खरीद कर लाई जाती हैं। वहीं, प्रदेश के अंदर अधिक सेक्स रेशियो वाले जिलों में शामिल अलीराजपुर, बालाघाट, डिंडौरी, मंडला, बैतूल, छिंदवाड़ा की लड़कियों को खरीदा-बेचा जाता है। इसमें से अधिकतर मामले में कोई करीबी ही इन्हें बहला-फुसलाकर बेच देता है। इन जिलों में मिसिंग डाटा भी सबसे अधिक मिलेगा। लड़कियों की डिमांड वाले जिलों की सूची में सागर-छतरपुर सबसे ऊपर हैं। इसके बाद ग्वालियर, भिंड, दतिया, मुरैना, शिवपुरी और विदिशा जिले शामिल हैं। इस कारण गुना और कटनी ट्रांजिट पाइंट बन गया है। यहीं से लड़कियां गुजरती हैं।

दो साल में पांच बार बेचा
सागर पुलिस ने 10 अगस्त 2021 को बंडा में एक 20 वर्षीय युवती को मुक्त कराया था। वह ओडिशा की रहने वाली है। नारी संरक्षण गृह में उसके बयान हुए तो बताया कि दो साल पहले दलपत का रहने वाला माधव ठाकुर ओडिशा से पांच लड़कियों को सागर लेकर आया था। इन लड़कियों में वह भी शामिल थी। इसके बाद सभी को शादी के नाम पर अलग-अलग लोगों को बेचा गया। खुद उसकी पहली शादी महरौनी में हुई थी। वहां से वह भाग आई तो ससुराल वालों ने बंडा थाने में गुमशुदगी दर्ज करा दी। 20 की उम्र में उसे 5 बार बेचा जा चुका था।

कोविड सर्वे के बहाने किशोरी का पता लगाया
मंडला की 16 वर्षीय किशोरी को कोविड के समय सागर में शाहगढ़ तहसील के यादव परिवार में बेच दिया गया था। मंडला में उसके अपहरण का प्रकरण भी दर्ज था। आवाज जनकल्याण समिति के लोगों ने कोविड सर्वे के बहाने तीन महीने बाद उस किशोरी तक पहुंची। इसके बाद मंडला SP को खबर दी। तब जाकर किशोरी इस चंगुल से मुक्त हो पाई।

मंडला की नाबालिग को इसी झोपड़ी से बरामद किया गया था।
मंडला की नाबालिग को इसी झोपड़ी से बरामद किया गया था।

मानव तस्कर, पुलिस से 20 गुना आगे की सोच रखते हैं

प्रशांत के मुताबिक MP में मानव तस्करी संगठित रूप से संचालित है। पुलिस की सोच से 20 गुना आगे की सोच तस्कर रखते हैं। कई मामलों में, तो पुलिस ये मानने को भी तैयार नहीं होती कि ये मानव तस्करी का केस है। वे सामान्य अपहरण का केस दर्ज कर लेते हैं। वहीं ऐसे तस्करों के चंगुल से मुक्त कराई गई बच्चियों के राहत-पुनर्वास के स्तर पर भी काम करने जरूरत है। मां-बाप से लेकर निकट के रिश्तेदार और करीबी ही बच्चियों को टूल के रूप में इस्तेमाल करते हैं।

मानव तस्करी का ये भी ट्रेंड चल रहा

10 दिन पहले अनूपपुर से गायब एक किशोरी मंडला के बिछिया ब्लॉक में मिली। उसकी मौसी ने पांच अलग-अलग तरीके से बेचा था। उसकी मां का निधन हो चुका है। उसे अलग-अलग घरों में लेबर के तौर पर रखा गया था। रेस्क्यू के बाद उसे शेल्टर होम में रखवाया गया है।

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चार साल पहले सागर में रिश्तेदार के घर से भागी मैहर की 15 साल की नाबालिग को बिन ब्याही मां बनना पड़ा। कहने को उसकी तीन शादियां हुईं, पर तीन-चार रातों के लिए ही वह ससुराल में रही। हर बार उसे खरीदा-बेचा गया। 8 साल की एक मासूम को भी इसी दलदल में धकेलने की कोशिश हुई। हाल ही में सागर पुलिस ने इस पूरे मामले का खुलासा किया। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें...

सागर की बसंती की शादी 14 साल की उम्र में उससे दोगुनी उम्र के युवक से कर दी गई। बसंती पति को छोड़कर भाग आई। फिर उसने दूसरी शादी कर ली। जब दूसरे पति से भी पटरी नहीं बैठी तो उसे छोड़कर लड़कियों की खरीद-फरोख्त और फर्जी शादियां कराने वाला गिरोह बना लिया। वह शराब तस्करी से लेकर मानव तस्करी तक करने लगी। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें...