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नए संक्रमितों पर खुलासा:जुलाई में अस्पताल में भर्ती होने वाले संक्रमितों में 63% को एक भी टीका नहीं लगा था; 27% पहले डोज और 10% ही दोनों डोज वाले थे

भोपाल2 महीने पहले
  • NHM ने जुलाई में मिले संक्रमितों का ब्योरा जुटाकर किया एनालिसिस

मध्य प्रदेश में अब सरकार दूसरा डोज लगाने का अभियान शुरू कर रही है। जानिए वैक्सीन के दोनों डोज लगाना क्यों जरूरी हैं? नेशनल हेल्थ मिशन (एनएचएम) ने प्रदेश में होम आइसोलेशन और अस्पताल में भर्ती 712 संक्रमितों के डाटा का एनालिसिस किया है। इसमें 27 जून से 27 जुलाई 2021 के बीच अस्पताल में भर्ती 145 और होम आइसोलेशन के 567 लोग शामिल हैं। इसमें सामने आया, दोनों डोज लगवाने वाले सिर्फ 10% लोगों को ही अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत पड़ी।

प्रदेश के 29 जिलों से अस्पताल में भर्ती हुए 145 संक्रमितों का डेटा एनालिसिस के लिए लिया गया। इसमें 63% यानी 91 मरीज ऐसे थे, जिन्होंने कोई वैक्सीन नहीं लगवाई थी। वहीं, 39 लोगों ने यानी 27% मरीजों को पहला डोज लगा था। इसमें 33 ने कोवीशील्ड और 6 ने कोवैक्सिन लगवाई थी। वहीं, 10% यानी 15 मरीजों को दूसरा डोज लगा था। इसमें 12 ने कोवीशील्ड और 3 ने कोवैक्सिन लगवाई थी। इसके लिए इंदौर के 44, भोपाल के 14, जबलपुर के 15, नीमच के 10, सागर के 10 समेत अन्य जिलों के मरीजों का डाटा शामिल किया।

45 जिलों के होम आइसोलेशन का डाटा लिया

इसके अलावा, 45 जिलों के होम आइसोलेशन के 567 संक्रमितों के डाटा एनालिसिस किया गया। इसमें 54% यानी 305 लोग ऐसे थे, जिन्होंने कोई वैक्सीन नहीं लगवाई थी। वहीं, 34% यानी 194 लोगों ने पहला डोज लगवाया। इनमें 170 ने कोवीशील्ड और 24 ने कोवैक्सिन लगवाई थी। इसके अलावा, 12% यानी 68 लोगों ने दूसरा डोज लगवाया था। इसमें 47 ने कोवीशील्ड और 21 ने कोवैक्सिन लगवाई थी। इसमें इंदौर से 152, भोपाल से 84, जबलपुर से 57, ग्वालियर से 29, बैतूल से 32 और राजगढ़ से 30 समेत अन्य जिलों के संक्रमितों के डाटा को शामिल किया गया।

अभी तक 52 लाख को ही दूसरा डोज

प्रदेश में अभी 3 करोड़ 27 लाख 27 हजार 725 लोगों को वैक्सीन लगी है। इसमें 2 करोड़, 74 लाख 73 हजार 606 लोगों को पहला डोज और 52 लाख 54 हजार 119 लोगों काे दूसरा डोज लगा है। प्रदेश में अभी 35 लाख से ज्यादा लोगों काे दूसरा डोज लगाना पेंडिंग है।

वैक्सीन का रहा पॉजिटिव असर

कोविड वैक्सीन से निश्चित रूप से सकारात्मक प्रभाव देखने को मिला है। जिन लोगों ने पहला या दूसरा डोज पूरा कर लिया था। उनमें बीमारी की गंभीरता व मृत्यु की संभावना कम देखी गई है। वैक्सीनेशन के बाद भी संक्रमण के मामले में दूसरी बीमारी से पीड़ित भी मरीज होते हैं। इससे साफ है, वैक्सीन फायदा कर रही है।

- डॉक्टर लोकेन्द्र दवे, अधीक्षक, हमीदिया अस्पताल

अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों में अधिकतर संख्या वैक्सीन न लगवाने वाले लोगों की है, जबकि जिन लोगों को वैक्सीन लग चुकी है उनमें संक्रमण की गंभीरता व मृत्यु की संभावना कम देखी गई है। हालांकि जिन लोगों ने वैक्सीन ले ली है उनमें कोरोना के संक्रमण का प्रभाव कम है या फिर न के बराबर है।
- छवि भारद्वाज, डायरेक्टर NHM

वैक्सीनेशन के बाद संक्रमण को ब्रेकथ्रू कोविड-19 इंफेक्शन कहते हैं

  • वैक्सीन के बाद शरीर को एक तरह का कवच मिलता है। वैक्सीन के बाद भी कई लोगों को इंफेक्शन हो रहा है, जिसे विशेषज्ञ ब्रेकथ्रू इंफेक्शन कह रहे हैं। विशेषज्ञ कह रहे हैं कि वैक्सीन लगवाने के बाद भी इंफेक्शन से 100% इम्युनिटी नहीं मिलती है। इसका मतलब है, वैक्सीनेट हो चुके लोगों को भी इंफेक्शन होने का खतरा बना हुआ है।
  • कोरोना वायरस जितने समय तक कम्युनिटी में सर्कुलेट होता रहेगा, उतना ही इंफेक्शन या रीइंफेक्शन का खतरा बना रहेगा। अच्छी बात यह है कि इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) समेत दुनियाभर में हुई स्टडी बताती है कि इंफेक्शन के गंभीर लक्षणों से बचाने में वैक्सीन मददगार है।

ब्रेकथ्रू कोविड-19 इन्फेक्शन हो क्यों रहा है?

  • वायरसः महामारी के वायरस में लगातार म्यूटेशन हो रहा है। वह अपनी संरचना बदलकर पहले से ज्यादा इन्फेक्शियस नए वैरिएंट बना रहा है। ओरिजिनल वायरस से अल्फा वैरिएंट करीब 70% ज्यादा इन्फेक्शियस है, जबकि डेल्टा तो अल्फा से भी 50% ज्यादा इन्फेक्शियस है। यह वैरिएंट्स ही नए केसेस का कारण है। ICMR की स्टडी में 86% ब्रेकथ्रू केसेस का कारण डेल्टा वैरिएंट निकला है।
  • वैक्सीनः डेटा बताता है कि वैरिएंट्स से बचने के लिए दो डोज जरूरी हैं। पर अभी अधिकांश लोगों को दोनों डोज नहीं लगे हैं। इसी तरह वैक्सीन की इफेक्टिवनेस भी एक फेक्टर है। कोवीशील्ड की इफेक्टिवनेस 60% से 90% है तो वहीं, कोवैक्सिन 78% इफेक्टिव है।
  • एंटीबॉडी रिस्पॉन्सः सबसे प्रभावी वैक्सीन भी इम्यूनिटी की गारंटी नहीं देती। कुछ लोगों में वैक्सीन के दोनों डोज के बाद भी एंटीबॉडी का स्तर ऐसा नहीं होता कि इंफेक्शन से बचा जा सके। उन लोगों को डर अधिक है, जो कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का इलाज करने के लिए इम्यूनोसप्रेसिव दवाएं ले रहे हैं।
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