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'ऑपरेशन-लोटस' के MP मॉडल ने छीनी उद्धव की कुर्सी:स्क्रिप्ट वही, सिर्फ बाड़ेबंदी की स्ट्रेटजी बदली; ठाकरे ने की कमलनाथ जैसी गलतियां...

मध्यप्रदेश3 महीने पहलेलेखक: राजेश शर्मा

मध्यप्रदेश में कांग्रेस सरकार के तख्तापलट का सियासी चैप्टर महाराष्ट्र में भी दोहराया गया। साल 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ 22 विधायकों ने कांग्रेस से बगावत की थी। ठीक ऐसी ही बगावत शिवसेना के विधायकों ने की। MP के विधायकों को भोपाल से बेंगलुरु शिफ्ट किया गया था। लेकिन महाराष्ट्र में विधायकों की बाड़ेबंदी की स्ट्रेटेजी में थोड़ा सा बदलाव किया गया। एकनाथ शिंदे ने विधायकों को लेकर सूरत में कैंप किया, बाद में विधायक गुवाहाटी (असम) शिफ्ट कर दिए गए। एमपी के मामले में सिंधिया गुट के विधायकों से मिलने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह बेंगलुरु पहुंचने में कामयाब हो गए थे। यही वजह है कि शिंदे गुट को एक राज्य से दूसरे राज्य में शिफ्ट किया गया।

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इस तरह मेल खा रहे घटनाक्रम

सियासी खेल में BJP ने जिस तरह MP की कमलनाथ सरकार में अंदरूनी कलह का फायदा उठाया, ठीक इसी तरह उद्धव ठाकरे भी शिकार हुए। जिस तरह मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया गुट के विद्रोह की वजह पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का कमलनाथ के साथ नजदीकियां होना बताया गया। ठीक वैसा ही उद्धव सरकार पर सांसद संजय राउत का हावी होना एकनाथ शिंदे गुट की बगावत की वजह बनी। महाराष्ट्र के सियासी गलियारे में यह प्रचारित है कि उद्धव ठाकरे अपनी ही पार्टी के विधायकों से मिलते नहीं थे। MP में भी कमलनाथ सरकार गिराने से पहले सिधिंया समर्थक विधायकों ने आरोप लगाए थे कि कमलनाथ सरकार में उनकी सुनवाई नहीं होती है।

साफ है कि दोनों राज्यों के सियासी खेल में BJP पर्दे के पीछे तब तक रही, जब तक उसे पुख्ता तौर पर यकीन नहीं हो गया कि अब सत्ता का कारपेट उसके लिए बिछ गया है। पॉलिटिकल ड्रामे की स्क्रिप्ट इस तरह तैयार की गई कि दोनों ही राज्यों में मुख्यमंत्रियों को फ्लोर टेस्ट (विधानसभा में बहुमत साबित करने की प्रोसेस) से पहले इस्तीफा देने पर मजबूर होना पड़ा। मध्यप्रदेश में हो चुकी और महाराष्ट्र में हुई सियासी उथल-पुथल में बहुत कुछ समान है, पढ़िए ये रिपोर्ट।

एक मंडली पर निर्भरता
बागियों ने पार्टी के उन लोगों की एक मंडली पर ठाकरे की निर्भरता पर भी उंगली उठाई, जिन्हें निर्णय लेने का काम सौंपा गया था। शिंदे जैसे शिवसेना के जन नेताओं की तुलना में उस मंडली को ज्यादा शक्तियां दी गईं। ऐसा ही MP में कमलनाथ की 15 महीने की सरकार के दौरान देखने को मिला। सिंधिया का ग्वालियर-चंबल में प्रभाव था। बावजूद इसके सरकार के फैसलों में वह अपने आप को उपेक्षित महसूस करते थे।

कमलनाथ की तरह हल्के में लेते रहे उद्धव
जिस तरह कमलनाथ ने सिंधिया को हल्के में लिया, ठीक उसी तरह शिंदे और शिवसेना के 20 विधायकों के एक समूह के साथ शुरू हुआ विद्रोह बढ़ता गया। सिंधिया के एक समर्थक मंत्री के मुताबिक कमलनाथ सरकार में उनके कोई काम नहीं होते थे। दिग्विजय सिंह और उनके समर्थकों को तवज्जो मिलती थी। यही वजह है कि सिंधिया को अपनी ही पार्टी के खिलाफ सड़क पर आना पड़ा था। मध्यप्रदेश में कांग्रेस की तरह महाराष्ट्र में शिवसेना भी BJP को साजिश रचने का दोषी ठहरा रही है।

बगावत ऐसी कि सरकार बचे ही नहीं
मध्यप्रदेश की ही तरह पूरी प्लानिंग के साथ उद्धव सरकार को गिराने का खाका तैयार किया गया। जब कमलनाथ सरकार बनी, तब कांग्रेस की खुद की 114 सीट थी। 7 और विधायकों का समर्थन था। टोटल संख्या 121 थी। बहुमत का आंकड़ा 116 है। BJP की 109 सीट थी। कांग्रेस के 22 विधायक बागी हो गए और इसी के साथ सरकार का गिरना तय हो गया था। यही हाल महाराष्ट्र की उद्धव सरकार का हुआ। शिवसेना के कद्दावर नेता एकनाथ शिंदे ने पूरी प्लानिंग के साथ बगावत की। 25 बागी विधायकों से शुरू हुआ सिलसिला 39 विधायकों तक पहुंच गया।

उद्धव की वही कोशिश, जो कमलनाथ ने की थी
उद्धव ठाकरे ने अपनी सरकार बचाने के लिए विधानसभा उपाध्यक्ष के जरिए बागी विधायकों को नोटिस जारी कराए। दो साल पहले ठीक ऐसा ही कमलनाथ ने किया था। उनकी कोशिश थी कि किसी तरह से बागी विधायकों के इस्तीफे को संवैधानिक मंजूरी मिल जाए, ताकि फ्लोर टेस्ट में सरकार बहुमत साबित कर दे, लेकिन उन्हें सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली। ऐसा ही उद्धव सरकार के साथ हुआ और बीजेपी की सरकार बनने का रास्ता साफ हो गया।

ऐसे हालात होने पर कमलनाथ को देना पड़ा था इस्तीफा
मध्यप्रदेश में 22 विधायकों के इस्तीफे के बाद राज्यपाल ने कमलनाथ सरकार को फ्लोर टेस्ट कराने का आदेश दिया था। कमलनाथ सरकार का तर्क था कि विधायकों की अयोग्यता का मामला स्पीकर के पास लंबित है, ऐसे में राज्यपाल फ्लोर टेस्ट के लिए नहीं कह सकते, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फ्लोर टेस्ट पर रोक लगाने से मना कर दिया था। ठीक इसी तरह का घटनाक्रम महाराष्ट्र के सियासी ड्रामे में देखने को मिला। कमलनाथ की तरह उद्धव ठाकरे को भी फ्लोर टेस्ट से पहले मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।

सुप्रीम कोर्ट पहले भी कह चुका- फ्लोर टेस्ट नहीं रोका जा सकता
13 अप्रैल 2020 को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने शिवराज सिंह बनाम स्पीकर के मामले में कहा था कि विधायकों पर अयोग्यता की कार्यवाही लंबित होने के कारण फ्लोर टेस्ट को नहीं रोका जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि फ्लोर टेस्ट को रोकने की जरूरत नहीं है, क्योंकि स्पीकर ने विधायकों के इस्तीफे और संविधान की 10वीं अनुसूची के अनुसार दलबदल के केस पर फैसला नहीं किया है।

शिंदे को मिला CM पद, सिंधिया को भेजा था केंद्र में
मध्यप्रदेश के मामले में बगावत करने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्यसभा भेजकर केंद्र में मंत्री बना दिया गया, जबकि उनके समर्थक ज्यादातर विधायकों को मंत्री बनाया गया। वहीं महाराष्ट्र के मामले में बगावत करने वाले एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाया गया है।

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