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भोपाल की पहली लेडी बाउंसर:भोपाल में सरवाइव करने के लिए हॉकी खिलाड़ी बन गई बाउंसर; अब लोग इन्हें कहते हैं 'लेडी डॉन'

भोपाल2 महीने पहलेलेखक: राजेश गाबा
हॉकी में आगे बढ़ने के लिए शोभा भोपाल आ गई। यहां रहकर खेल को भी आगे बढ़ा रही हैं।
  • डीबी सिटी मॉल के कैफे में बाउंसर की नौकरी करती हैं शोभा मेहरा
  • नशे में धुत लोगों को क्लब से कर देती हैं बाहर, सिखाती हैं सबक

सुरक्षा के क्षेत्र में महिलाओं के बढ़ते आत्मविश्वास का नया पहलू है- लेडी बाउंसर। हर जगह बड़े-बड़े मॉल्स, पब्स, क्लब्स और हॉस्पिटल बन रहे हैं। इसे देखते हुए लेडी बाउंसरों की जरूरत भी बढ़ रही है। ऐसी ही एक महिला बाउंसर हैं- शोभा मेहरा। उम्र 25 साल। डीबी सिटी मॉल के पिचर्स क्लब में काली वर्दी में तैनात शोभा डांस फ्लोर के नजदीक मजबूत बाजुओं को मोड़कर बड़ी-बड़ी आंखों से जब घूरती हैं, तो किसी की मजाल नहीं कि वह बेअदबी करे।

शोभा ने रूढ़िवादी परंपराएं तोड़कर नई दुनिया बनाई है। साथ ही, महिला ग्राहकों पर भी नजर रखती हैं। शोभा हॉकी खिलाड़ी भी हैं। भोपाल में खेल के साथ जीवनयापन करने के लिए ही उन्होंने इस प्रोफेशन को चुना। अपने अनुभव को शोभा ने भास्कर के साथ साझा किए।

'मूलत: इटारसी की हूं। पिता शिव कुमार मेहरा ऑर्डिनेंस फैक्टरी में हैं। मां गुड़ियाबाई मेहरा हाउस वाइफ हैं। हॉकी प्लेयर भी हूं। खेल में आगे बढ़ने के लिए भोपाल आ गई। यहां साईं एकेडमी के लिए ट्रायल भी दिया। कई बार खाने के पैसे भी नहीं होते थे। सरवाइव करने के लिए जॉब भी तलाश रही थी। चूंकि पर्सनालिटी अच्छी थी, इसलिए कजिन सिस्टर ने क्लब में फीमेल बाउंसर की जॉब के बारे में बताया। मैं ढिशूम ग्रुप के जॉनी बघेल से मिली। जो भोपाल के बाउंसर ग्रुप के लीडर हैं। उन्होंने कहा कि डरोगी नहीं, तो कर लोगी। कुछ दिन करके देखो, अच्छा लगे, तो कंटीन्यू करना। एक साल पहले काम शुरू किया। शुरू में अजीब लगता था। साथी मेल बाउंसर ने सपोर्ट और गाइड किया।’ मेरे क्लब के ऑनर ने भी मुझे प्रोत्साहित किया। इस तरह मैं बाउंसर बन गई।

रिश्तेदारों ने कमेंट्स किए

शोभा बताती हैं, ‘शुरुआत में रिश्तेदार और जान-पहचान वालों ने कमेंट्स किए, लेकिन मेरी फैमिली ने सपोर्ट किया। मैंने खुद को प्रूव करने के लिए मेहनत की। आज क्लब में सब मेरी इज्जत करते हैं। लोग लेडी डॉन बोलते हैं।’ शोभा ने कहा, ‘बाउंसर क्या करता है, पहले आइडिया नहीं था, लेकिन अब डांस फ्लोर या क्लब में आने वाली गर्ल्स को कोई परेशान करता है, तो पहले वॉर्निंग देती हूं, नहीं मानते तो उन्हें बाहर कर देती हूं। हालांकि कुछ लोग हावी होने की कोशिश करते हैं, लेकिन पर्सनालिटी और एक्सप्रेशन देखकर वह हिम्मत नहीं कर पाते।’

खुशी होती है, जब गेस्ट साथ में सेल्फी लेते हैं

वे कहती हैं, ‘बाउंसर का प्रोफेशन काफी चैलेंजिंग है। मुझे अच्छा लगता है जब लोग मेरी पर्सनालिटी देखकर अट्रैक्ट होते हैं और पार्टी में आने वाले लड़के-लड़कियां सेल्फी लेते हैं। सब कहते हैं कि यह लड़की कितनी स्ट्रॉन्ग है, किसी से नहीं डरती। फैमिली भी मुझ पर प्राउड फील करती है। खेल को भी आगे बढ़ा रही हूं। फिटनेस के लिए वर्कआउट करती हूं।’

कब बदलेगी लोगों की सोच

‘मेरा मानना है, आज भी लोगों की मानसिकता में बदलाव नहीं आया है। वर्किंग गर्ल को समाज में सम्मान की नजर से नहीं देखते, खासकर क्लब में डीजेइंग, बार टेंडरिंग और बाउंसर का जॉब करने वाली महिलाओं को। क्या पता, कब बदलेगा मेरा देश और यहां की सोच। सैलरी के मामले में भी भेदभाव देखने को मिलता है। मेल बाउंसर को ज्यादा सैलरी मिलती है, जबकि काम दोनों का बराबर है।’

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