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MP में आदिवासी वोट बैंक पर 'मामा' का फोकस:CM शिवराज ने भगोरिया के बहाने बिछाई मिशन-2023 की बिसात, आदिवासियों को लुभाने में नहीं छोड़ रहे कोई कसर

मध्यप्रदेश10 महीने पहलेलेखक: राजेश शर्मा

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का 15 मार्च को झाबुआ के थांदला में भगोरिया उत्सव में शामिल हुए। यहां उन्होंने पत्नी साधना सिंह के साथ पारंपरिक वेश-भूषा पहनकर डांस भी किया। इसके बाद 17 मार्च को बड़वानी में रैली निकाली। राजनीतिक लिहाज से आदिवासियों के बीच 'मामा' की इस तरह मौजूदगी एक नया दांव है। आपको समझाते हैं- क्या है शिवराज की ट्राइबल पॉलिटिक्स।

दरअसल, यह मिशन 2023 के लिए बिसात है, जो मुख्यमंत्री ने बिछाना शुरू कर दी है। बजट में भी आदिवासियों के लिए 26 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। इस बड़े वोट बैंक को साधने के लिए प्रदेश में पेसा एक्ट लागू किया। इंदौर के भंवरकुआं चौराहे का नाम जननायक टंट्या भील रख दिया। बिरसा मुंडा की जयंती यानी 15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस मनाने का ऐलान हुआ। इतना ही नहीं, भोपाल के हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम गौंड रानी कमलापति के नाम पर किया गया।

वजह है कि राज्य में 43 समूहों वाले आदिवासियों की आबादी 2 करोड़ से ज्यादा है, जो 230 में से 84 विधानसभा सीटों पर असर डालती है। मप्र में 2018 के विधानसभा चुनाव में BJP को आदिवासियों ने बड़ा नुकसान पहुंचाया था। अब आदिवासियों को लुभाने में शिवराज सरकार कसर नहीं छोड़ रही। 2022-23 के बजट में भी इसकी झलक देखने को मिली है।

साल 2003 से पहले बीजेपी और संघ ने आदिवासी इलाकों में हिंदुत्व कार्ड फेंका। हिंदू संगम और शिवगंगा जैसे कई बड़े कार्यक्रम कर कांग्रेस के इस पारंपरिक वोट बैंक को पार्टी ने अपने पक्ष में कर लिया, लेकिन 2018 के चुनाव से पहले बीजेपी ने आदिवासियों को बिसरा दिया। इसी बीच, विपक्षी दल आदिवासियों के बीच जाकर सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के खिलाफ हवा बनाते रहे। आदिवासियों को फीड किया गया कि यह पार्टी आरक्षण खत्म कर देगी। नौकरियां नहीं मिलेंगी। वे सरकारी फायदों से दूर हो जाएंगे। इन्हीं के चलते बीजेपी को 2018 के चुनाव में मुंह की खानी पड़ी।

मोदी और शाह दिखा चुके हैं ताकत
आदिवासियों को साधने की जुगत जारी है। हाल में हुआ कांग्रेस का आदिवासी सम्मेलन बीजेपी को ताकत बताने के लिए था। हालांकि, उस दिन कांग्रेस कुछ कमाल नहीं दिखा पाई। सम्मेलन में प्रदेश भर से आदिवासियों को आमंत्रित किया था। इससे पहले, 18 सितंबर को जबलपुर में शहीदी दिवस पर बीजेपी ने आयोजन रखा था, जिसमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह शामिल हुए थे। 2023 के लिए शाह के बाद मोदी के दौरे के जरिए आदिवासियों को लुभाने में कसर नहीं छोड़ी गई।

आदिवासी बाहुल्य सीटों पर समीकरण बदले
2003 के विधानसभा चुनाव में आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित 41 सीटों में से बीजेपी ने 37 सीटें जीती थीं। कांग्रेस केवल 2 सीटों पर सिमट गई थी। वहीं, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने 2 सीटें जीती थीं, जबकि 1998 में कांग्रेस का आदिवासी सीटों पर अच्छा खासा प्रभाव था।

2008 के चुनाव में आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 41 से बढ़कर 47 हो गई। इस चुनाव में बीजेपी ने 29 सीटें जीती थी, जबकि कांग्रेस ने 17 सीटों पर जीत दर्ज की थी। 2013 के इलेक्शन में आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित 47 सीटों में से बीजेपी ने 31 सीटें जीती थी, जबकि कांग्रेस के खाते में 15 सीटें आई थी।

2018 के इलेक्शन में पांसा पलट गया। आदिवासियों के लिए आरक्षित 47 सीटों में से बीजेपी केवल 16 सीटें जीत सकी और कांग्रेस ने दोगुनी यानी 30 सीटें जीत ली। एक निर्दलीय के खाते में गई। आदिवासी वोट की अहमियत का अहसास 2018 के विधानसभा चुनाव में कर चुकी बीजेपी अब इस वर्ग को लुभाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है।

2013 में बीजेपी को 31 व कांग्रेस को 16 सीटें (1 निर्दलीय) को मिली थी। यानी बीजेपी को 2018 के चुनाव में 15 सीटों का नुकसान हआ था। यदि बीजेपी आदिवासी वोटर को साधे रखती, तो शिवराज सरकार 2018 में फिर बन जाती। क्योंकि बीजेपी बहुमत से महज 7 सीट दूर रह गई थी। बता दें कि मध्यप्रदेश में वैसे तो आदिवासियों की आबादी 22% है और ये विधानसभा की 95 सीटों पर निर्णायक भूमिका में रहते हैं।

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