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हौसला हो तो जीत तय:किसी की कोरोना के साथ किडनी खराब हुईं तो किसी को डॉक्टर्स ने लंग्स ट्रांसप्लांट के लिए कहा; पॉजिटिव सोच से जीत ली जिंदगी की जंग

सेंट्रल डेस्क भोपाल6 महीने पहले
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राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त की कविता- नर हो, न निराश करो मन को... एक ऐसी ताकत है, जिसका मर्म अगर इंसान समझ जाए तो बड़ी से बड़ी लड़ाई जीत सकता है। कोरोना से लड़ाई में भी यह पंक्तियां दवा का काम कर रही है। इसी दवा के बूते कई लोगों ने कोरोनावायरस को हरा दिया। यहां पढ़िए मौत को मात देकर लौटे सात कोरोना योद्धाओं की कहानियां...

भोपाल: 45 दिन के संघर्ष के बाद कोरोना को हराया: दोनों किडनी खराब, लंग्स में 500 एमएल पानी था

भोपाल की स्मृति सकरगाये बताती हैं- मुझे पूरा यकीन था कि मैं कोरोना को जरूर हरा दूंगी। मेरे साथ मेरे दोनों बच्चों का प्रेम और पति का विश्वास था। पहले मेरे पति सुबोध कोरोना पॉजिटिव हुए। मैंने उन्हें तत्काल नोबेल हॉस्पिटल में एडमिट कराया। कोविड गाइडलाइन के अनुसार मैंने भी अपना कोरोना टेस्ट करवाया। मेरी उम्र 42 साल है। 7 जनवरी की शाम को मेरी रिपोर्ट पॉजिटिव आई। पहले तो मैं थोड़ा सहमी। सच मानिए, डर गई। अनजानी आशंकाओं से सहम गई। फिर मैंने अपने बच्चों का चेहरा देखा और हिम्मत जुटाई।

धीरे-धीरे मुझे सांस लेने में तकलीफ शुरू हुई और मैं तुरंत सकलेचा अस्पताल में जाकर एडमिट हुई। मेरी हालत बिगड़ने लगी। दो साल पहले जब मुझे सांस लेने में तकलीफ हुई थी तो चेकअप करवाया था। तब डॉक्टरों से पता चला था कि मेरी दोनों किडनियां फेल हो चुकी हैं। तब से मेरा डायलिसिस चल रहा है। ऐसे में मेरे सामने बड़ा चैलेंज था कि मैं कैसे रिकवर हो पाऊंगी। डॉक्टर्स ने मुझे हिम्मत दी। मुझे वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा। 10 दिन तक वेंटिलेटर पर रहने के बाद जब होश आया तो पता चला कि मेरे लंग्स में 500 एमएल पानी भर गया था।

डॉक्टर्स की टीम ने पूरे विश्वास के साथ इलाज किया। इसके बाद मुझे आईसीयू में एडमिट किया गया। आईसीयू में मैं बिल्कुल अकेली थी, क्योंकि पति नोबेल अस्पताल में एडमिट थे। मेरा मनोबल कम न हो और इसके लिए पति ने खुद को नोबेल अस्पताल से सकलेचा अस्पताल में शिफ्ट करवा लिया। बच्चों की कही हर बात कान में पूरे समय गूंजती कि मां आपको हमें अकेला छोड़कर नहीं जाना है। आपको हमारे लिए जीना ही होगा। बस, उनकी कही यह बात मेरे लिए जीवन अमृत साबित हुई। जब भी अस्पताल में आसपास के मरीजों को तड़पता हुआ देखती तो खुद को निगेटिविटी से दूर रखने के लिए प्रवचन सुनती या फिर भजन सुनने लगती।

इस बहाने खुद को जीवट बनाती। इच्छाशक्ति को मजबूत करती। परिवार की खट्टी मीठी यादों को अपनी स्मृतियों में लाती। हर पल यही सोचती कि बच्चों की दुआओं और उनके विश्वास ने मुझे एक बार फिर नया जीवन दिया है। मुझे जीना है। लगभग 45 दिन की जद्दोजहद के बाद मैं अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर पहुंची। अब मेरे परिचय के जो भी लोग हैं, उनसे बातचीत कर उन्हें मोटिवेट कर रही हूं। ताकि वे कोरोना से डरें नहीं। भय और तनाव न पालें। चुनौती चाहे जितनी बड़ी हो लेकिन, हौसला है तो जीत तय है।

इंदौर: 38 दिन तक आईसीयू में रहा, डॉक्टरों ने लंग्स ट्रांसप्लांट तक का बोल दिया था, हार नहीं मानी

कोरोना को हराने की पूरी कहानी बता रहे हैं 55 वर्षीय पंकज गुप्ता। पंकज कहते हैं- मैंने 38 दिन आईसीयू में रहते हुए कोरोना से जंग लड़ी है। डॉक्टर्स भी सोचते थे कि इतने संक्रमण के बाद मरीज को बचाना मुश्किल है। 6 मार्च को मेरी कोविड जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी। जिस दिन रिपोर्ट आई, उस दिन सीने में दर्द हो रहा था। भाई पीयूष व परिवार वाले रात 11 बजे मुझे बॉम्बे हॉस्पिटल लेकर आए। सीटी स्कैन करवाया तो 70 प्रतिशत से ज्यादा संक्रमण था। ऑक्सीजन लेवल कम था। अगले दिन डॉक्टरों ने बताया कि 90 प्रतिशत से ज्यादा संक्रमण हो गया। डॉक्टरों ने तो स्पष्ट कह दिया था कि बचने की संभावना कम है। डॉ. दीपक बंसल की निगरानी में इलाज चलता रहा। वे भी हौसला बढ़ाते रहे। आईसीयू में एक-एक सांस के लिए संघर्ष था। तीन टॉसिलिजुमैब इंजेक्शन लग गए थे। 15 रेमडेसिविर इंजेक्शन लगे। समय मुश्किल था। सभी संभव प्रयास किए। परिवार ने होम्योपैथी दवा भी आजमाई। जब रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी, तब नहीं लगा था कि ऐसी स्थिति होगी। डाॅक्टर ने लंग्स ट्रांसप्लांट के लिए कह दिया था। जानता था कि उसका भी सक्सेस रेट ज्यादा नहीं है। रिस्क ज्यादा थी। मुझे डायबिटीज थी, इसलिए रिकवरी में समय ज्यादा लगा। एक महीने से ज्यादा आईसीयू में रहा, लेकिन हार नहीं मानी। इच्छाशक्ति के बूते बीमारी से लड़ा। अब मैं घर पर हूं। ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती है लेकिन अनुशासन व एक्सरसाइज के जरिए बेहतर रिकवरी की ओर बढ़ रहा हूं। लोगों से यही कहना चाहूंगा कि कोरोना संक्रमण होने पर घबराने की बजाए सतर्कता से काम लें। समय पर जांच कराकर और डॉक्टर से परामर्श लेकर हम इस बीमारी से आसानी से जीत सकते हैं।

जयपुर: ठान लिया था कुछ भी हो कोरोना से हार नहीं मानूंगा, ठीक होकर रात में घर पहुंचा और सबको चौंका दिया

पंकज शर्मा, उम्र 40 वर्ष, निवासी महेश नगर, पेशा- फाइनेंशियल एडवाइजर। पंकज कहते हैं- मेरे और परिवार के लिए इससे डरावना पल कुछ नहीं हो सकता। 5 नवंबर की बात है, दिवाली पर घर की साफ-सफाई से फ्री हुए ही थे, कि अचानक थकान होने के साथ बुखार आ गया। मैनें सोचा मौसम बदला है, तो वायरल होगा। करीब चार-पांच दिन तक नॉर्मल दवाइयां लेता रहा, इस दौरान पिताजी ने भी हल्की जुकाम-बुखार की शिकायत की तो हम दोनों ने कोविड टेस्ट और सीटी स्कैन करवाया, जिसका डर था वही हुआ, दोनों की रिपोर्ट पॉजिटिव आई और मेरा सीटी स्कोर 6 आया तो एहतियातन घर में आइसोलेट हो गया। दो दिन बाद हालात ज्यादा खराब होने लगी और ऑक्सीजन लेवल 91 फीसदी पर आ गया, सांस लेने में दिक्कत होने लगी।

ऑक्सीजन सिलेंडर घर मंगवाया, लेकिन इससे भी राहत नहीं मिल रही थी। तब परिचित डॉक्टर से सलाह कर मानसरोवर स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती हो गया। वहां दुबारा सीटी स्कैन करवाया तो स्कोर 20 आया, फेफड़ों में 80 फीसदी संक्रमण फैल चुका था।

ऑक्सीजन लेवल 70 पर आ गया, बीपी बढ़ गया तो डॉक्टरों ने आईसीयू में एडमिट कर तुरंत इलाज शुरू किया। मेरी हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी, यह देखकर परिवार भी घबरा गया। मेरी आंखों के सामने भी परिवार का चेहरा बार-बार सामने आ रहा था। इस दौरान डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ मुझे लगातार मोटिवेट करते रहे, मैनें खुद पर निगेटिविटी हावी नहीं होने दी।

पत्नी, बच्चों और मां-बाप से फोन पर बात करता तो सब मुझे हिम्मत देते, बोलते चिंता मत करो, कुछ नहीं होगा। मैं भी घबराया नहीं, बल्कि यह ठान लिया था कि कोरोना से जिदंगी नहीं हारूंगा। 5 दिन आईसीयू में रहा, रिपोर्ट निगेटिव आई और स्थिति में सुधार हुआ। डॉक्टर्स ने आइसोलेशन वार्ड में शिफ्ट कर दिया। आखिरकार 16 दिन अस्पताल में भर्ती रहने के बाद कोरोना को हराकर मैं घर लौट ही आया। इस दौरान 3 से 4 लाख रुपए खर्च जरूर हुए, लेकिन समझदारी रही कि हेल्थ इंश्योरेंस करवा रखा था। हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होने के बाद चुपचाप रात को घर पहुंचकर सरप्राइज दिया तो सबकी आंखों में आंसू आ गए। अस्पताल के 16 दिन हमारे लिए सबसे डरावने थे। कोरोना से बचने के लिए मेरा यहीं संदेश है कि लापरवाही ना बरतें, संक्रमित हो भी जाए तो आत्मविश्वास ना खोएं। इस बीमारी से लड़ने के लिए सबसे जरूरी है खुद पर निगेटिविटी हावी नहीं होने दे।

पटना: 83 साल के वकील को हुआ कोरोना, जैसे जटिल केस जीते, वैसे ही वायरस को भी हराया

केदारनाथ सिन्हा बताते हैं- मैं साकेत इंक्लेव, खाजपुरा में रहता हूं। मैं पटना सिविल कोर्ट में वकील हूं। लंबी प्रैक्टिस की है। कई मुकदमे जीते। तीन साल पहले एक्सीडेंट हो गया था। इसमें हेयरलाइन फ्रैक्चर हुआ और बाएं पैर की नस दब गई। बाएं पैर में अब भी तकलीफ है। बावजूद मैं कभी मन से नहीं हारा। दो साल से मैं छोटे बेटे के यहां पत्नी के साथ रह रहा था। वहीं इलाज करा रहा था। 17 मार्च को मैं और पत्नी प्रतिभा सिन्हा दोनों फ्लाइट से मुंबई से पटना आए। 19 मार्च को दोनों ने कोरोना वैक्सीन की पहली डोज ली। वहां भीड़-भाड़ थी। वैक्सीन लेने के बाद मुझे बुखार, सर्दी और सांस लेने में तकलीफ होने लगी।

टेस्ट कराने पर पॉजिटिव आया, पर मेरे चेहरे पर जरा-सा भी शिकन नहीं थी। सोचा- कई जटिल मुकदमे जीत चुका हूं, फिर कोरोना तो एक वायरस है, इसे क्यों नहीं जीत पाएंगे। इसी सोच के साथ एम्स में 22 मार्च को एडमिट हो गया। उस वक्त कोरोना की रफ्तार इतनी नहीं थी। मेरा ऑक्सीजन लेवल 85 तक पहुंच गया था। उम्र ज्यादा होने की वजह से डॉक्टर्स ने कुछ नहीं कहा, पर मुझे उनके हावभाव से लगा कि मामला कुछ गंभीर है। लंग्स में इंफेक्शन था। एक्स-रे व सीटी स्कैन हुआ।

इन सबके बावजूद मैं बिंदास रहा। मैं एम्स में लोगों को मोटिवेट करता था कि कोरोना कुछ नहीं है। मैं एम्स में एडमिट हुआ और इधर, मेरी पत्नी पॉजिटिव हो गई। लेकिन, उन्हें अस्पताल जाने की जरूरत नहीं पड़ी। कई साल के बाद मैं और पत्नी अलग-अलग रहे। मैं एम्स में था तो पत्नी घर पर। मार्चेंट नेवी में इंजीनियर बेटे संजीव सिन्हा को फोन कर पत्नी, पोता, पोती समेत परिवार के अन्य सदस्यों का हाल पूछता था।

9 अप्रैल को मेरी रिपार्ट निगेटिव आई और 10 अप्रैल को डिस्चार्ज हो गया। घर आने के बाद मैं पूरी तरह से फिट हूं। कोराना से जो संक्रमित हैं, उन्हें फोन से बताता हूं कि कोरोना मरीज पॉजिटिव रहें। निगेटिव बातों को मन में न आने दें। खान-पान पर ध्यान रखें। लिक्विड ज्यादा लें। इच्छाशक्ति मजबूत रखें। मैंने 83 साल की उम्र में कोरोना को हरा दिया। आप भी जरूर जंग जीत लेंगे।

बिलासपुर: शुगर, ब्लड प्रेशर के साथ हुआ कोरोना, फेफड़े 60 प्रतिशत तक संक्रमित हो चुके थे

नाम दयाबाई मलधानी, मेरी उम्र 75 वर्ष है, रोली नगर, अज्ञेय नगर के पास निवास है। मेरी कोरोना से लड़ाई की कहानी कुछ ऐसी है- कुछ समय से अच्छा नहीं लग रहा था। न खाने-पीने की इच्छा होती थी न किसी से बात करने की। पर यह नहीं सोचा था कि कोरोना हो गया है।

घर वाले कोरोना की जांच कराने ले गए तो मैं पॉजिटिव आ गई। फेफड़े 60 फीसदी खराब हो चुके थे, ऑक्सीजन लेवल 85 या इससे कम रहता था। पहले एक अस्पताल गए तो पता चला कि वहां जगह ही नहीं है। इसलिए दूसरी जगह आकर भर्ती हुई। पर मेरी हालत तो बहुत खराब थी एक बार तो यह भी लगा कि अब जीवन के दिन पूरे हो गए हैं। पर मन में यह जिद ठान ली थी कि कैसे भी हो कोरोना को हराकर एक बार अपने घर जरूर पहुंचना है।

कमजोरी इतनी आ गई थी कि एक कदम चलना भी मुश्किल था। अकसर बेहोश हो जाती थी। बिना ऑक्सीजन लेवल के तो सांस ही नहीं ले पा रही थी। होश आता तो बार-बार मन में घर का ख्याल आता। शाम को घर वालों से वीडियो कॉलिंग पर बात हो जाती तो घबराहट पूरी तरह से कम हो जाती थी। मुझे दूसरी बीमारियां होने के कारण कोरोना से ज्यादा परेशानी हुई, लेकिन मैं घबराई नहीं। कोरोना को हराकर घर जाने का जो सपना था उसे पूरा करने की ही जिद मन में थी जो पूरी भी हुई।

लोगों से यही कहना चाहती हूं कि अगर किसी को कोरोना हो जाए तो इससे घबराना नहीं है। कोरोना को हराने के लिए मन में जिद लानी होगी और घबराहट को कोसों दूर रखना होगा, यही एक मंत्र है जो हमें विजयी बनाएगा।

पानीपत: मैं अस्पताल में भर्ती थी, पर बच्चों से कहा- दिवाली मनाओ, इससे अलग शक्ति मिली

संगीता रेवड़ी कहती हैं, “अस्पताल में भर्ती मरीज के लिए बाहर इंतजार कर रहे परिजनों की सोच बहुत मायने रखती है। मैं तो बहुत घबरा गई थी, लेकिन परिवार वालों ने कभी दूर होने ही नहीं दिया। इससे मुझमें हिम्मत आई। मैं दिल्ली के अस्पताल में भर्ती थी, फिर भी बच्चों से कहा- घर में दिवाली मनाओ। इससे अलग शक्ति मिली और मैं 10 दिन में ठीक होकर घर लौट आई। नवंबर की बात है, तब तो यह बात भी सामने नहीं आई थी कि आरटीपीसीआर की रिपोर्ट निगेटिव आने पर भी मरीज पॉजिटिव मिल रहे हैं।

बुखार आया तो डॉ. जगजीत आहूजा के पास गए। कोरोना की जांच कराई, रिपोर्ट निगेटिव आई तो डॉक्टर के अनुसार दवा लेती रही। 12 दिन बीत गए, लेकिन बुखार नहीं उतरा। सब कुछ जांच करा ली। डेंगू, निमोनिया, लेकिन कुछ नहीं आया। बुखार उतर नहीं रहा था तो सभी चिंतित हो गए। फिर से मैं डॉक्टर के पास गई। इस बार डॉ. आहूजा ने कहा कि सीटी स्कैन कराओ। स्कैन कराया तो पता चला कि कोरोना से फेफड़ों में 45% तक इंफेक्शन हो चुका था। फिर दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया।

12 दिन तक जो शरीर ठीक से काम कर रहा था, कोरोना का पता चलते ही कहां से इतनी वीकनेस आ गई, समझ नहीं आ रहा था। शरीर में असहनीय दर्द। घबराहट ने चारों ओर से मुझे घेर लिया। डॉक्टर ने मेरे पति रमेश रेवड़ी को बताया। फिर, परिवार वालों ने अजीब तरकीब निकाली। वे लोग रोजाना अस्पताल आने लगे। कमरे में आ नहीं सकते थे, इसलिए बाहर से घर वाले हमें खिड़की में देखते थे। खिड़की के पास मैं घंटों खड़ी रहती। दिन में मैं बाहर खड़े परिवार को देखती। वहीं, रात को वे लोग मुझे कमरे में देखते थे। परिवार से रोजाना वीडियो कॉलिंग और फोन से जुड़ा रहा। सब एक-दूसरे को हौसला देते रहे।

दिवाली के दिन मैं अस्पताल में एडमिट थी और बच्चे घर में मायूस। हमने फोन पर कहा कि घर में दिवाली मनाओ। बच्चों ने दिवाली मनाई। शायद उसी सकारात्मक शक्ति से मैं 10 दिन के अंदर ही ठीक होकर घर आ गई। अगर मेरे घर वाले मुझे उसी हाल में छोड़ देते तो शायद आज में यहां नहीं होती। मैं तो सभी कोरोना पॉजिटिव मरीजों और उनके परिवार वालों से यहीं कहूंगी कि सोच हमेशा पॉजिटिव रखें। इससे मरीज के शरीर को आंतरिक शक्ति मिलती है।

झारखंड: 95% खराब हो गया थे शिक्षा मंत्री के फेफड़े, ट्रांसप्लांट के बाद अब स्वस्थ

झारखंड के शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो 95 फीसदी फेफड़े खराब होने के बाद भी ठीक होकर घर लौटे। भास्कर से उन्होंने कोरोना को हराने की पूरी कहानी बताई... मुझे कोरोना संक्रमण होने के बाद स्वास्थ्य में लगातार गिरावट आ रही थी। सांस लेने में तकलीफ के बाद से परेशानी बढ़नी शुरू हुई। कोविड जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आने से पहले ही ऑक्सीजन लेवल कम होने लगा था। संक्रमण की चपेट में आने के बाद रिम्स में डॉ. प्रदीप भट्टाचार्य की देखरेख में भर्ती हुआ। जब रिम्स में पहुंचे, तब मेरा ऑक्सीजन सेचुरेशन 73 था। वहां से मेडिका जाने के बाद डॉ. विजय मिश्रा ने इलाज किया। स्थिति ज्यादा बिगड़ती जा रही थी, तब मेडिकल बोर्ड बनाकर रिम्स और मेडिका के डॉक्टरों को इलाज में लगाया गया था। वे इलाज के साथ ही हौसला भी बढ़ाते रहते थे, उसी का नतीजा है कि अब मैं पहले से काफी स्वस्थ हूं।

शुरुआत में रिम्स में मुझे, जैसा परिवार वालों ने बताया, गंभीर स्थिति को देखते हुए हाई फ्लो ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखा गया था। नॉन इनवेसिव वेंटिलेटर के बाद इनवेसिव वेंटिलेटर में डाला गया। इसके बावजूद फेफड़े पूरी तरह डैमेज हो गए थे। चेस्ट एक्सरे में पहले 70 फीसदी इंफेक्शन देखने को मिला। फिर 95 फीसदी तक पहुंच गया। 28 सितंबर से 22 दिनों तक रांची के अस्पतालों में 100 फीसदी तक हाई फ्लो ऑक्सीजन सपोर्ट के साथ वेंटिलेटर पर था। हालत भले ही खराब हो रही थी, लेकिन जीने का जज्बा बाकी था।

धीरे-धीरे मैं बेसुध होता गया। 19 अक्टूबर को एयरलिफ्ट कर एकमो सपोर्ट (आर्टिफिशियल लंग्स) पर मुझे एमजीएम चेन्नई ले जाया गया। वहां स्पेशलिस्ट चिकित्सकों की टीम ने 10 नवंबर को फेफड़े ट्रांसप्लांट किया। 16 फरवरी को मैं स्वस्थ होकर वापस रांची लौटा। संक्रमण होने के बाद पांच महीने जीवन का सबसे मुश्किल पल रहा। जिंदगी और मौत की लड़ाई सामने से महसूस की। एक पल के लिए मन में आया कि स्वस्थ होकर लौटूंगा भी या नहीं। चिकित्सकों के प्रयास और लोगों की दुआओं की बदौलत अब फेफड़े ठीक हैं। मेरा मानना है कि इलाज तो चलेगा, पर लोग हिम्मत न हारें।