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भास्कर एक्सप्लेनर MP:तीसरी लहर में बच्चों को कैसे बचा सकते हैं, इलाज में क्या होगी चुनौती, सरकार पहले कहां ध्यान दे.. पढ़िए 3 बड़े मेडिकल कॉलेजों के एक्सपर्ट की राय

आनंद पंवार/राजीव कुमार तिवारी/रामेंद्र परिहार/मध्यप्रदेशएक वर्ष पहले
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मध्यप्रदेश में मई लास्ट तक 18 साल से कम आयु वाले 50 हजार से ज्यादा बच्चे संक्रमित हुए हैं। स्कूल नहीं खुले हैं और एक्सपर्ट भी तीसरी लहर की आशंका को देखते हुए यही चाहते हैं कि अभी स्कूल खोलने का विचार टाल दें। उनका कहना है कि सरकार बच्चों की कोविड जांच करने वाले स्टाफ को सबसे पहले ट्रेंड करें वर्ना और गड़बड़ी हो जाएगी। आम परिवारों तक यह अनिवार्य रूप से जानकारी पहुंचाए कि बच्चे में लक्षण कैसे पहचानें ताकि तुरंत इलाज कराने का फैसला करें। हम देख चुके हैं कि कई जगह लक्षण पहचानने में देरी से हालात बिगड़े हैं। दैनिक भास्कर ने भोपाल, इंदौर और ग्वालियर मेडिकल कॉलेज के टॉप विशेषज्ञों से इसे समझा।
बच्चों में पहली और दूसरी लहर में संक्रमण कम दिखा। तीसरी लहर में खतरा क्याें

  • अभी 100 में से 8 बच्चे संक्रमित हो रहे हैं। पिछले साल वायरस का स्ट्रेन बच्चों के लिए माइल्ड था, इसलिए उन पर ज्यादा असर नहीं हुआ। दूसरी लहर में वे संक्रमण का शिकार हुए। हालांकि पहली लहर में बुजुर्ग सबसे ज्यादा संक्रमण की चपेट में आए। इसके बाद उनका टीकाकरण हुआ, मगर इस बार 30 से 45 साल के बीच की आबादी अधिक संक्रमित हुई। अब उनका टीकाकरण भी शुरू हो चुका है। एकमात्र बच्चे बचे हैं, जिन्हें टीका नहीं लगा है। ऐसा माना जा रहा है कि संभावित तीसरी लहर में बच्चों के संक्रमित होने की ज्यादा आशंका है। ऐसा होना जरूरी भी नहीं है, लेकिन सतर्कता रखें।

तीसरी लहर की आशंका को देखते हुए बच्चों के लिए सरकार को सुझाव

  • सरकार को अभी स्कूल खोलने के लिए इंतजार ही करना चाहिए। सरकार को अपने स्तर पर अस्पतालों में इलाज की तैयारी शुरू करना चाहिए। अभी बच्चों के वैक्सीनेशन का एम्स दिल्ली, पटना और नागपुर के एक अस्पताल में ट्रायल की अनुमति दी गई है। सरकार को ज्यादा से ज्यादा जगहों पर ट्रायल की अनुमति देनी चाहिए, ताकि बच्चों के लिए जल्द से जल्द वैक्सीन उपलब्ध हो सके।

बच्चों को बचाने के लिए घर में ही पेरेंट्स के लिए रखी जाने वाली जरूरी सावधानियां

  • बच्चों को कॉलोनी/सोसायटी में ग्रुप में खेलने से बचना चाहिए। घर में कोशिश करें कि बड़े भी मास्क लगाकर रहें। बच्चों को सीख देनी चाहिए कि कैसे खांसना, कैसे छींकना है ताकि जब तक स्कूल खुले तो उनकी आदत में आज जाए। बच्चों की इम्यूनिटी को भी मजबूत बनाना जरूरी है। बच्चों के भोजन, नाश्ते में पौष्टिक तत्वों को खास ख्याल रखा जाना चाहिए। बच्चों को रोज च्यवनप्राश खिलाएं। दूध हल्दी पिलाएं, तुलसी और अदरक का काढ़ा दें।

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बच्चों की दवा और इलाज सभी नहीं कर सकते। मानव संसाधन की कमी से बचने का क्या विकल्प है

  • सरकार को शिशु रोग विभाग के स्टाफ के अलावा दूसरे विभाग की नर्सेस को शिशु रोग विभाग में रोटेशन पर ड्यूटी लगानी चाहिए। उनकी ट्रेनिंग भी आयोजित करनी चाहिए, क्योंकि बच्चों को दवा देने का तरीका एवं मात्रा दोनाें बिल्कुल अलग होती है। यह उनको ट्रेनिंग के माध्यम से सिखाया जा सके। अभी सरकार नर्सेस के ट्रेनिंग के प्रोग्राम आयोजित कर रही है। इसके अलावा सरकार ने एक बच्चे के कोविड उपचार के लिए एक बुकलेट भी जारी की है। इसमें उनके प्रोटोकॉल से लेकर संदिग्ध को कहां रखना है। सब कुछ बताया गया है।

बच्चों के सैंपल लेने के लिए क्या सावधानियां बरतना चाहिए

  • कोविड के सैंपल के लिए स्टाफ को ट्रेंड होना जरूरी है। खासतौर से छोटे बच्चों के सैंपल लेने के लिए टेक्नीशियन को ट्रेनिंग दी जाना चाहिए।

बच्चों में कोविड के लक्षण कैसे पहचाने

  • हल्के लक्षण वाले : 90 फीसदी बच्चों में कोविड का संक्रमण माइल्ड होता है। सामान्य सर्दी, खांसी, बुखार व दस्त कोविड के सामान्य लक्षण हैं। कोविड होने पर बच्चों को वायरल फीवर की सामान्य दवा ही जाती है। यदि बच्चों में ये लक्षण तीन से पांच दिन रहे तो डॉक्टर की सलाह लेना चाहिए।
  • गंभीर लक्षण वाले : अब तक 5 से 10% बच्चों में कोविड के गंभीर लक्षण पाए गए हैं। ऐसे बच्चों को अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत होती है। इसमें बुखार का समय बढ़ जाता है। खांसी सांस की दिक्कत में बदल रही है। बच्चा सुस्त हो जाता है। फुंसी भी होने लगती है।

कोविड को लेकर बच्चों में किन बदलाव में ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है?

  • 90% बच्चे घर पर ही ठीक हो जाते हैं। इसमें सबसे ज्यादा खतरा बच्चों में मल्टीसिस्टम इंफ्लेमेटरी (MISC) सिंड्रोम का रहता है। यह कुछ ही बच्चों में आता है। इसमें लाल चकते, सांस लेने में दिक्कत, ब्लड प्रेशर कम होने जैसे स्थिति बनती है। ऐसे में बच्चों को तुरंत नर्सरी सेंटर पर ले जाना जरूरी होता है। इसके अलावा बच्चा खाना न खाए, सांस तेज चले, सुस्त देखे, बेहोशी की हालत में तो भी गंभीर स्थिति होती है।

पेरेंट्स ऐसे ध्यान रखें तो एक हद तक बच्चे का संक्रमण से दूर रख सकते हैं

  • 3 से 5 दिन तक सर्दी, खांसी और बुखार रहे तो बिना देरी किए तत्काल डाॅक्टर से संपर्क करें।
  • 18 प्लस का घर का हर सदस्य टीका जरूर लगवाएं।
  • बच्चों को रुटीन टीके के साथ फ्लू का वैक्सीन भी जरूर लगवाएं।
  • मास्क पहनने, सोशल डिस्टेंसिंग के साथ ही हाथ सैनिटाइज करने या धोने की ट्रेनिंग दें।
  • बच्चों को घर पर ही रखें। बच्चे भी कोशिश करें कि जरूरत से ज्यादा बाहर नहीं निकलें।
  • बच्चे को पौष्टिक आहार देने के साथ ही मानसिक रूप से मजबूत बनें।

बच्चों के लिहाज से उतना ट्रेंड स्टाफ ही नहीं, क्या चुनौतियां आ सकती हैं

  • मुंह व नाक से स्वॉब लेकर सैंपल जांच के लिए भेजा जाता है। यह बड़ों को भी असहज करता है। बच्चों की सैंपलिंग कैसे होगी।
  • माता-पिता कैसे समय पर बच्चों में लक्षणों को समय पर कैसे पहचानें, यह भी चुनौती है।
  • बच्चों की सैंपलिंग के लिए प्रदेश में प्रशिक्षित स्टाफ नहीं।
  • बच्चों के लिए वेंटिलेटर का संचालन, इनक्यूबेशन सहित अन्य प्रक्रियाएं अलग होती हैं। बच्चों के ही विशेषज्ञ ही कर सकते हैं।
  • बच्चों के लिए वे दवाइयां नहीं दी जा सकतीं, जो बड़ों को दी जा रही हैं। हालांकि सामान्य फ्लू की दवाइयों से ही वे ठीक हो जाएंगे। बशर्ते उसकी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

प्रदेश में अब तक 50 हजार से ज्यादा बच्चे संक्रमित

विभाग की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में मई लास्ट तक 53 हजार 86 बच्चे कोराेना की चपेट में आए हैं। हालांकि मौत का आंकड़ा राहतभरा है। 18 प्लस में सिर्फ 5 लोगों को छोड़कर बाकी सब ठीक हो गए। संक्रमितों में एक साल वालों की बात करें तो यह संख्या 987 है।

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