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लोक आस्था का महा उत्सव गणगौर:जवारे बोने के साथ शुरू होगा निमाड़ में गणगौर उत्सव; नौ दिन तक गूंजेंगे रनुबाई और धनियर राजा के लोकगीत

भोपाल5 दिन पहले
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जवारों को ही देवी स्वरूप मानकर दर्शन-पूजन किया जाता है।  - Dainik Bhaskar
जवारों को ही देवी स्वरूप मानकर दर्शन-पूजन किया जाता है। 

डॉ सुमन चौरे

‘गणगौर’ पर्व मध्यप्रदेश का लोक महोत्सव है। यह देवी का लोक आराधना पर्व है। निमाड़ी बोली में गौर का अर्थ सखी या सहेली होता है और गण अर्थात् लोक। यही आश्य है इस पर्व का। यह लोक की सखी रना देवी है। निमाड़ी में देवी या मां को बाई कहते हैं, इसलिए रना देवी को रनुबाई कहते हैं। रनुबाई के पति देव धनियर राजा हैं। इन्हें लोकगीतों में रनुबाई और धनियर राजा, गौरबाई-ईश्वर राजा, लछ्मीबाई-विष्णु राजा, सईतबाई-बिरमा राजा, रोहेणबाई-चंद्रमा राजा कहा जाता है। गणगौर पर्व देवी का लोकानुष्ठानिक पर्व है, जो चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की दसमीं से चैत्र शुक्ल पक्ष की तृतीया तक नौ दिन बड़ी आस्था से मनाया जाता है। इस पर्व में देवी का रूप लोक जैसा सरल, सहज और सरस होता है। शास्त्रोक्त पद्धति से मंत्रोच्चार कर जिस प्रकार देवी या शक्ति का आव्हान किया जाता है, ऐसी ही पूजा के विभिन्न चरणों के लिए विविध लोक गीत गाकर यह पर्व मनाया जाता है। गणगौर पर्व प्रारंभ होता है जवारे बोने के साथ। लोकगीत गाकर कुरकई (बांस की छोटी टोकरी) में मिट्टी में गेहूं बोते हुए महिलाओं द्वारा ही देवी का आव्हान किया जाता है। देवी की आराधना का संपूर्ण विधान लोकाचार के दर्शन कराता है। कुरकई में प्रकट जवारे ही देवी का प्रत्यक्ष दर्शन कहलाते हैं।

गीत-
सरसS बधावों आयो म्हारा मनS भायोS
लह् लह्S जवाराS मंS रनुबाई आयाS
रनुबाई आया उनका धणियर राजा आयाS
भावार्थ: जवारों को देवी रूप में सींचा और पूजा जाता है। आज मेरे घर रनुबाई और धनियर राजा पधारे हैं, सभी ओर आनन्द छाया हुआ है।

गीत-
ढुळS मुळS ढुळS मुळS नद्दी वयS हो
मोत्या वईS वईS जायS
व्हाS भोळा धणियर नाहुणS करS होS
रनुबाई हुया पणिहारS

भावार्थ: धीमी गति से नदी बह रही है। पानी में बुलबुले ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे मोती बह रहे हों। वहां धनियर राजा स्नान कर रहे हैं। रनुबाई पानी भरने आती है तो धनियर राजा पूछते हैं कि हम किसके घर के मेहमान बनकर हैं। रनुबाई कहती है दूर गांव में मेरा किसान भाई है। उनके आम-आमली के बगीचे हैं, कुआं-बावड़ी है, वहीं चलेंगे।

गीतों में यही भाव है कि निमाड़ रनुबाई का पीयर है। किसान को खेत में अनाज पैदा करने के लिए पशुधन की पहली आवश्यकता होती है, तब कृषक महिलाएं देवी से जो कुछ मांगती हैं लोकगीतों में इस विषय का उल्लेख मिलता है।

गीत-
पूजणS वाळई काई माँगS
दूधS पूतS अव्हातS माँग
टोंगळ्या उड़न्तो गोबर माँगS
पौच्या उड़न्तो गोरसS माँग

भावार्थ: देवी की आराधना करने वाली बहन अपना अचल सौभाग्य मांगती है, गोदी में संतान की कामना करती है, और यह भी मांगती है कि घर में इतना पशुधन हो कि घुटने-घुटने गोबर रहे, पशु माकुल हो कि पूरे समय हाथ दूध-घी में सने रहें।

रनुबाई के गीतों में देवी के यशोगान के साथ ही उनके श्रृंगार का वर्णन भी किया किया जाता है। श्रृंगार गीतों मे टीकी, मेहंदी, चुंदड़ी के गीत बड़े ही रसमय सौंदर्य प्रधान हैं। रनुबाई के सौंदर्य की उपमा प्रकृति स्थित उपमान से की गई है।

गीत-
थारो काई काई रूपऽ बखाणूऽ
थारी अँगळई मूँगऽ की सेंगळई रनुबाई
सोरठऽ देशऽ सीऽ आई होऽ
थारा डोळा लिम्बू की फाँकऽ रनुबाई
थारो भालऽ सूरिजमलऽ तेजऽ रनुबाई

भावार्थ: हे रनुबाई! तेरे किस-किस रूप का वर्णन करूं? तेरे हाथ की उंगलियां हरे मूंग की फली जैसे लम्बी और पोरदार नाजु़क हैं। हे देवी, तू सौराष्ट्र से आई है। तेरी आंखें नींबू की फांक जैसी रसीली हैं। हे मां! तेरे भाल पर सूर्य का तेज है। मैं तेरे किस-किस रूप का वर्णन करूं।

गणगौर पर्व पर गाए जाने वाले गीतों में नारी की समस्त मनोभावों की चेतना प्रकट होती है। समाज परिवार में नारी के संबंधों और व्यवहार के दर्शन भी होते हैं। एक गीत में रनुबाई शुक्र के तारे, सूर्य, चन्द्र, बिजली जैसी विश्व की दुर्लभ चीजों से श्रृंगार की लालसा पति से व्यक्त करती है।

गीत -
शुक्र को तारो रेS ईशवर ऊँगी रह्योS
ते कीS ती मखS टीकीS घढ़ाओ

भावार्थ: रनुबाई घनियर राजा से आकाश में उगने वाले शुक्र के तारे की टीकी गढ़वाने की अभिलाषा व्यक्त करती है।

ख्यात साहित्यकार डॉ वासुदेवशरण अग्रवाल ने कहा है कि, यह निमाड़ी गीत विश्व साहित्य का विराट से श्रृंगार की कल्पना का पहला गीत है। रनुबाई को संतान देने वाली देवी माना जाता है। संतान की प्रार्थना के लोकगीत गणगौर गीतों का वैशिष्ट्य है। निमाड़ी लोक साहित्य के मर्मज्ञ पंडित रामनारायणजी उपाध्याय ने कहा है कि रनुबाई गणगौर गीतों की अधिष्ठात्री देवी हैं। इन गीतों में संतानहीन माता की पीड़ा के गीत इतने करुण हैं कि करुणा भी द्रवित हो पड़ती है। दुनिया के सम्पूर्ण सुख-ऐश्वर्य हो किन्तु संतान नहीं हो तो यह समृध्दि तुच्छ-सी जान पड़ती है।

धनियर राजा और रणुबाई के रथ में जवारों को सजाया जाता है।
धनियर राजा और रणुबाई के रथ में जवारों को सजाया जाता है।

गीत-
अनS धनS भण्डारS भरयाS पूर्ण हो माताS
नई कोई भोगणS हारS
हो रनादेवी एक बाळुड़ो दीजेS
एकS बाळा का कारणS हो म्हारो जलमS अकारथS जाय
भावार्थ: घर में अन्न-धन के भण्डार भरे हैं पर कोई उसको भोगने वाला नहीं है। हे देवी एक संतान दे। संतान के बिना मेरा जीवन व्यर्थ है।
बांझ शब्द समाज का दिया एक लांछित शब्द है। इस दर्द से छुटकारा चाहती है वंध्या, एक गीत का अंश है-
हो माताS बाँझS बाई बाँझS बाई सबयी कयS हो
नही कयS बाळा की मायS
एकS बाळुड़ो दS हो रना देवी मेटी दS बाँझS को नावS
एक बाळुड़ो थारो कळु मंS राखS नावS
भावार्थ: हे माता, सभी मुझे बांझ कहते हैं, मुझे कोई बालक की मां नहीं कहता है। हे देवी इस पीड़ा से मुक्ति दे। एक संतान दे ताकि मेरा बांझ नाम मिटे और कलियुग में तेरे नाम की ख्याति हो।
गणगौर माता के साथ निमाड़ नौ दिन वैसा ही आनन्द मनाता है, जैसी ससुराल से आई बेटी के साथ खुशियां मनाई जाती है। आठवें दिन जब कुरकई के जवारे लहलहाने लगते हैं, इन जवारा स्वरूप माता को धनियर राजा और रनुबाई के मानवाकृति रथ में बैठाकर गीत-नृत्य करके आनन्द उत्सव मनाया जाता है। इस अवसर पर झालरिया गीत गाये जाते हैं।
गीत-
धणियरS जी घोड़िला हिणS हिण्याS
रणुबाई करS सोळई सिंणगारS हो झालरियोS दS
भावार्थ: रनुबाई और धनियर राजा का श्रृंगार खेती-बाड़ी के फूल-फलों से किया जाता है। दूर्वा, अकाव के फूल, जुवार की धानी, मूंगफली और कैरियों के आभूषण बनाकर पहनाए जाते हैं।
जैसे गले मिलकर बेटी की विदाई करते हैं, वैसे ही भावपूर्ण होकर जवारों को भी विदाई दी जाती है। लोकगीत गाते हुए जवारों को जल में विसर्जित किया जाता है। अगले वर्ष फिर पीयर आने के लिए रनुबाई को सभी लोग विदा करते हैं।

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