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हनुमान चालीसा पर अमित शाह की फटकार:ग्वालियर-चंबल के मंत्री को बुजुर्गों की सेवा के लिए 40 करोड़ का लोन चाहिए; भोपाल में आधी रात को नारे लगे-आया MP का 'शेर'

भोपालएक वर्ष पहलेलेखक: राजेश शर्मा
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बर्थ डे पर ‘नंबर’ बढ़ाने की होड़ भाजपा नेताओं का एक दांव बुरी तरह उलटा पड़ गया। तारीफ मिलना तो छोड़िए, उलटे गृह मंत्री अमित शाह के गुस्से का सामना करना पड़ा। बात दरअसल यूं शुरू हुई थी कि मध्यप्रदेश भाजपा ने मोदी के जन्मदिन पर कुछ नया करने का सोचा था। आइडिया आया कि क्यों न मंदिरों में हनुमान चालीसा का पाठ कर लिया जाए..। आइडिया सबको रास आया और लगा कि यह जबर्दस्त TRP देगा और पार्टी के पॉलिटिकल एजेंडे को भी प्लस ही करेगा।

भाजपा के प्रदेश के मुखिया वीडी शर्मा जबलपुर में और चिकित्सा मंत्री विश्वास सारंग भोपाल में इस कार्यक्रम शामिल होने पहुंचे। सबकुछ तय हिसाब से शुरू हो गया। बड़े नेताओं ने मंदिरों में पहुंचकर पाठ किया। सब कुछ निपट गया। अगले ही दिन यह कोशिश नेताओं को उलटी पड़ गई। सुना है कि अगले दिन जबलपुर आए हुए गृह मंत्री अमित शाह को किसी ने यह खबर दे दी कि राजधानी के मंदिर में तो हनुमान चालीसा के पाठ के वक्त मोदी की तस्वीर भी रखी गई थी। फिर क्या था.. शाह का गुस्सा आसमान पर था और निशाने पर थे मध्यप्रदेश भाजपा के बड़े नेता। दिल्ली ने सीधा सवाल-जवाब किया तो उन्होंने संगठन पर ही इसका ठीकरा फोड़ दिया। नेता आपस में बात करते रहे कि नंबर बढ़ाने के लिए अति उत्साह भारी पड़ गया।

मंत्रीजी 40 करोड़ के लोन से बुजुर्गों की सेवा करना चाहते हैं
शिवराज सरकार के एक मंत्रीजी बुजुर्गों की सेवा करना चाहते हैं। इसमें गलत भी क्या है? नेता होते ही जनता की सेवा के लिए। कई मंत्रियों और अफसरों ने इसलिए तो ट्रस्ट बनाए हैं, जिसे उनकी पत्नी और परिवार वाले संभाल रहे हैं। इसमें काले-पीले की खूब चर्चा होती है। मगर यहां शिवराज सरकार के इस मंत्रीजी की सेवा भाव से बैंक अफसरों की सांस अटकी गई। मंत्रीजी बुजुर्गों की सेवा बैंक को 40 करोड़ की पड़ रही है। लोन की वजह सिर्फ यह बताई गई है कि ग्वालियर क्षेत्र के मंत्रीजी बुजुर्गों की सेवा करना चाहते हैं।

वे अपने गृह जिले में ओल्ड एज होम (वृद्धाश्रम) खोलना चाहते हैं। इस ट्रस्ट में मंत्रीजी का परिवार के लोग सदस्य हैं। बैंक को दाल में काला इसलिए नजर आ रहा है, क्योंकि वृद्धाश्रम से कोई कमाई तो होगी नहीं। फिर लोन चुकाने के लिए पैसा कहां से आएगा? क्या ब्लैक-व्हाइट का कोई 'खेल' है? अब बैंक अफसरों आपत्तियां लगाकर फिलहाल मंत्रीजी की सेवा वाले भाव पर रोक लगा दी है। अब देखना है कि मंत्रीजी के दिल में इतना सेवा भाव है, जो अपने पैसे से बुजुर्गों की सेवा करेंगे।

आधी रात को MP में कौन बन गया 'शेर'
मध्यप्रदेश की राजनीति में शेर कौन है? कांग्रेस और भाजपा में ही अलग-अलग जवाब आएगा। फिलहाल एक और ‘शेर’ की एंट्री भोपाल में हुई और इसके चर्चे भी खूब हो रहे हैं। सुनने में आया है कि 22 सितंबर की रात 12 बजे केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के भोपाल स्टेशन पहुंचने पर उनका जोरदार स्वागत हुआ। स्वागत करने आए उनके समर्थक इतने जोश में थे कि वे जैसे ही ट्रेन से वे नीचे उतरे, प्लेटफार्म पर एक नारा लगना शुरू हो गया- MP के शेर का भोपाल में स्वागत...। ये नारे जोश में लगाए गए या फिर तोमर के ताकतवर बताने के लिए कोई संदेश दिया गया। सवाल यह है कि संदेश किसके लिए?

सुबह होते-होते सरकार के खुफिया तंत्र ने जरूर यह संदेश सत्ता और संगठन के प्रमुखों तक जरूर पहुंचा दिया। इसके बाद से तोमर के उन समर्थकों की शिनाख्त की जा रही है, जो स्वागत करने स्टेशन पहुंचे थे। खैर यह नया नहीं है, इसके पहले भी सिंधिया के भाजपा में शामिल होने के बाद ग्वालियर में जगह-जगह पोस्टर लगे थे और उसमें नरेंद्र सिंह तोमर को बॉस बताया गया था।

सिंधिया के रथ पर 'दुश्मन' सवार
केंद्रीय मंत्री बनने के बाद अपने गढ़ में पहुंचे ज्योतिरादित्य सिंधिया का ग्रैंड वैलकम किया गया। मगर सब कुछ सही ही हो, ये कैसे हो सकता है? जिस चमकते और दमकते रथ पर सिंधिया सवार हुए थे, उसे तैयार करने वाले का तनिक भी ख्याल नहीं रखा गया। चलिए, पहले बताते हैं रथ के पीछे की कहानी। सिंधिया के कट्‌टर समर्थक तुलसी सिलावट ने इंदौर से यह रथ ग्वालियर भेजा था। भले ही भाजपा में पार्टी स्तर पर निर्णय लिए जाने की परंपरा है, लेकिन 'महाराज' का शाही अंदाज कायम रहे, इसके लिए सिलावट के कहने पर कैलाश विजयवर्गीय के खास पूर्व विधायक जीतू जिराती ने इस रथ को तैयार करवाया था।

यह कहानी हो गई रथ की..। अब सवार दुश्मन कौन? इस रथ पर सिंधिया के साथ इंदौर के भाजपा नेता मधु वर्मा भी नजर आए। अब वर्मा और जिराती की राजनीतिक दुश्मनी से कौन वाकिफ नहीं होगा। वजह है- पिछले विधानसभा चुनाव में राऊ से जिराती का टिकट काटकर वर्मा को टिकट दिया गया था। इंदौर में यह भी चर्चा यह है कि क्या वर्मा ने पाला बदल लिया है?

अब फाइल गायब, मलाई गलने लगी...
फाइल दबती है, बाहर आती है, चलती है... और कभी-कभी गायब भी हो जाती है। यही फंडा रहा है ब्यूरोक्रेसी का। ऐसा आम जनता के साथ खूब होता है। अब इस चक्कर में एक सीनियर अफसर फंस गए हैं। बेचारे मलाईदार पोस्टिंग की राह देखते-देखते एक साल से ज्यादा का समय बीत गया था। इस साहब को कमलनाथ सरकार ने एक बार माइनिंग डिपार्टमेंट की मलाईदार पोस्ट से हटाकर लूप लाइन में रखा था। शिवराज सिंह की चौथी पारी शुरू होते ही इस अफसर की ख्वाहिशें हिलोरें मारने लगीं।

दौड़-धूप कर अफसर ने अपनी पोस्टिंग सीएम सचिवालय से निर्देश दिलवाकर अहम पद पर नियुक्ति कराने का आदेश पास करा लिया, लेकिन साहब की किस्मत ही खराब है। विभाग के प्रमुख सचिव नहीं चाहते थे। कोरोना चल रहा था, इसलिए सरकार की मंजूरी नहीं ली जा सकती थी। इसी साल जनवरी-फरवरी में फिर अफसर ने अपनी पोस्टिंग पर सीएम सचिवालय की मुहर लगवाने के भरसक प्रयास किए, लेकिन प्रमुख सचिव ने फाइल आगे नहीं बढ़ाई। इस बीच प्रमुख सचिव ही इस विभाग से चले गए। अफसर को लगा कि अब काम बन जाएगा, लेकिन अब ये फाइल ही गायब हो गई।

और आखिरी बात...

रिटायर्ड IPS की किताब से खुलेंगे कई अनसुने राज
कहते हैं- जो बात दिल में है वो जुबान पर आ ही जाती है। और जो बयां नहीं कर सकते उसे लिख कर बताते हैं। हाल ही में रिटायर हुए DGP रैंक के एक अफसर किताब आने वाली है। वे अपने समय की कई कुख्यात अपराधों पर एक किताब (क्राइम फिक्शन) लिख रहे हैं। कहते हैं कि यह किताब रोचक तो रहेगी ही, पुलिसिंग में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाएगी। किताब में अपराधियों के नाम बदलकर प्रस्तुत किया जाएगा। यहां तक तो ठीक था, लेकिन वे अपनी इस किताब में ऐसी घटनाओं का भी जिक्र करेंगे जो राजनेताओं की भूमिका का भी खुलासा करेगी।

अब सवाल यह है कि क्या नेताओं के भी नाम बदले जाएंगे। अगर बदला जाएगा तो क्या पहचान के कुछ इशारे किए जाएंगे, खैर यह तो किताब आने के बाद पता चलेगा। उन्होंने MP में हुई ऐसी करीब एक दर्जन घटनाएं चिन्हित कर ली हैं। ये वही अफसर हैं जो मध्यप्रदेश पुलिस के मुखिया बनना चाहते हैं, लेकिन नहीं बन पाए। जब वे रिटायर हो गए तो तब उन्हें लगा कि उन्हें कहीं न कहीं कोई पद से ‘सरकार’ नवाजेंगे, लेकिन ऐसा भी हो न सका..।

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