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  • In 1979, Kushabhau Thackeray Of The Janata Party Defeated SN Thakur Of The Congress; Indira Gandhi Roamed From Village To Village, Yet Could Not Win Thakur.. Next Year Thackeray Was Defeated

41 साल बाद खंडवा में उपचुनाव:1979 में जनता पार्टी के कुशाभाऊ ने कांग्रेस के ठाकुर को हराया था; इंदिरा गांधी गांव-गांव घूमी थीं

भोपाल2 महीने पहले

खंडवा लोकसभा सीट पर कांग्रेस और बीजेपी, दोनों पार्टियों की प्रतिष्ठा दांव पर है। कांग्रेस ने राजनारायण सिंह पुरनी (70) पर भरोसा जताया है, तो बीजेपी ने ज्ञानेश्वर पाटिल को उम्मीदवार बना कर OBC कार्ड खेला है। इस सीट पर 41 साल बाद हो रहे उपचुनाव में 30 अक्टूबर को वोटिंग होगी। इससे पहले इस सीट पर 1979 में तत्कालीन सांसद परमानंद गोविंदवाला के निधन के बाद उपचुनाव हुए थे। तब जनता पार्टी के कुशाभाऊ ठाकरे ने कांग्रेस के ठाकुर शिवकुमार सिंह को हराया था। उस उपचुनाव में इंदिरा गांधी गांव-गांव घूमी थीं, लेकिन वे शिवकुमार को नहीं जितवा सकीं, लेकिन ठीक एक साल बाद 1980 में हुए आम चुनाव में ठाकरे को हार का सामना करना पड़ा था।

अब 6 बार सांसद रहे BJP के नंदकुमार सिंह के निधन के बाद उपचुनाव हो रहा है। इस चुनाव में दोनों ही दलों के राष्ट्रीय नेता चुनाव प्रचार में नहीं आ रहे। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ इस सीट पर प्रदेश के सबसे बड़े स्टार प्रचारक हैं।

खंडवा लोकसभा सीट से सबसे ज्यादा चुनाव जीतने का रिकाॅर्ड नंदकुमार सिंह के नाम पर है। BJP अब इस सीट को खोना नहीं चाहती। यही वजह है कि यहां मंत्रियों से लेकर पार्टी के नेता पूरी ताकत झोंक रहे हैं। बता दें कि खंडवा लोकसभा क्षेत्र में आठ विधानसभा सीटें आती हैं। इसमें खंडवा, बुरहानपुर, नेपानगर, पंधाना, मांधाता, बड़वाह, भीकनगांव और बागली शामिल हैं।

भाजपा का 25 साल बाद OBC चेहरा
BJP ने खंडवा लोकसभा सीट पर 25 साल बाद OBC चेहरा दिया है। इसकी एक वजह यह भी है कि इस संसदीय क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या 19.68 लाख है। इसमें से OBC 5 लाख 16 हजार हैं, जबकि समान्य वर्ग के मतदाता 4 लाख से कम हैं। जातीय समीकरण के गणित से देखें, तो SC-ST वर्ग के वोटर सबसे ज्यादा 7 लाख 68 हजार हैं। इस क्षेत्र में आठ में से सिर्फ 3 विधानसभा क्षेत्रों में आदिवासी वोटर निर्णायक भूमिका में हैं।

खंडवा संसदीय सीट पर अब तक हुए चुनाव और विजयी प्रत्याशियों के इतिहास पर गौर करें तो पूर्व में हुए एक उपचुनाव समेत 17 आम चुनाव में 9 बार कांग्रेस और आठ बार भाजपा, सहयोगी भारतीय लोकदल और जनता पार्टी के प्रत्याशी विजयी हुए हैं। इनमें दिलचस्प बात यह है कि खंडवा लोकसभा का प्रतिनिधित्व करने का 10 बार मौका बुरहानपुर के प्रत्याशी को मिला है। दो बार लोकसभा से बाहर के प्रत्याशी भी विजयी हुए हैं।

22 साल बाद चुनाव लड़ रहे राज नारायण
मांधाता से 3 बार के MLA रहे राजनारायण सिंह की उम्र 70 साल की है। वह करीब 22 साल बाद चुनाव लड़ने जा रहे हैं। कांग्रेस में अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह की सरकार में विधायक रहे राजनारायण सिंह की पहली बार संसदीय राजनीति में एंट्री हुई है, हालांकि 2019 के मांधाता उपचुनाव में कांग्रेस ने उनके बेटे उत्तमपाल सिंह को ही टिकट दिया था, लेकिन भाजपा के नारायण पटेल के सामने 22 हजार वोटों से हार मिली। कांग्रेस से सिर्फ अरुण यादव ने 2009 में चुनाव जीता था। उनसे पहले 1991 के लोकसभा चुनाव में महेंद्र सिंह कांग्रेस से जीते थे। यानी 1996 के बाद 2009 के लोकसभा चुनाव को छोड़ दिया जाए, तो बीजेपी से नंदकुमार सिंह ही जीतते आ रहे हैं।

ज्ञानेश्वर पाटिल का पहला लोकसभा चुनाव
BJP ने पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष ज्ञानेश्वर पाटिल को मैदान में उतारा है। पाटिल के राजनैतिक सफर पर नजर डालें, तो 1987 से वो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ गए थे। इसके बाद 1995 से 1998 तक भाजयुमो जिला महामंत्री रहे। 1998 से 2001 तक भाजयुमो प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य भी रहे। 2012 से 2014 तक प्रदेश भाजपा किसान मोर्चा प्रदेश उपाध्यक्ष रहे। पाटिल 1998 से 2019 तक लोकसभा चुनाव का प्रबंधन भी संभाला।

चौहान-यादव के बीच तीन बार मुकाबला
नंद कुमार सिंह चौहान और अरुण यादव के बीच 3 बार मुकाबला हुआ। इनमें दो बार अरुण यादव को हार का सामना करना पड़ा है। दिवंगत सांसद चौहान 6 बार खंडवा लोकसभा का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।

बीजेपी के लिए अग्नि परीक्षा होगी आदिवासी वोट की वापसी
आदिवासी वोट की अहमियत का अहसास 2018 के विधानसभा चुनाव में कर चुकी बीजेपी के लिए उपचुनाव में भी चुनौती है। खंडवा लोकसभा सीट सहित 3 विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनाव में आदिवासी वर्ग की निर्णायक भूमिका तय है। खंडवा और जोबट सीट पर इस वर्ग को साधना भाजपा के लिए अग्नि परीक्षा साबित होगी।

यह भी जानें

  • खंडवा लोकसभा से पहले आम चुनाव में वर्ष 1952 में कांग्रेस के बाबूलाल तिवारी जीते थे। वर्ष 1957 में दूसरे आम चुनाव में भी कांग्रेस के बाबूलाल तिवारी को सफलता मिली थी।
  • वर्ष 1962 में तीसरे आम चुनाव में कांग्रेस के महेशदत्त मिश्र जीते। वर्ष 1967 में चौथे चुनाव में कांग्रेस के गंगाचरण दीक्षित विजयी हुए थे। 1971 में भी कांग्रेस के गंगाचरण दीक्षित जीते।
  • पहली बार गैर कांग्रेसी सांसद वर्ष 1977 के छठे चुनाव में चुना गया था। इसमें राष्ट्रीय लोकदल के परमानंद गोविंदजीवाला जीते थे। दिल्ली में सड़क दुर्घटना में परमानंद गोविंदजीवाला के निधन के बाद वर्ष 1979 में हुए उपचुनाव में यह सीट जनता पार्टी की झोली में चली गई। जनता पार्टी से कुशाभाऊ ठाकरे विजयी हुए थे।
  • वर्ष 1980 में सातवें आम चुनाव में यह सीट फिर से कांग्रेस के पास आ गई। ठाकुर शिवकुमारसिंह ने ठाकरे को हराकर यह सीट पर कब्जा कर लिया था। वर्ष 1984 के आठवें आम चुनाव में भी यह सीट कांग्रेस के पास रही और कालीचरण सकरगाए विजयी रहे थे।
  • वर्ष 1989 में नौवें आम चुनाव में यह सीट भाजपा के कब्जे में चली गई और अमृतलाल तारवाला सांसद बने। वर्ष 1991 में दसवें चुनाव में संसदीय क्षेत्र पर फिर कांग्रेस का कब्जा हो गया और ठाकुर महेंद्रकुमार सिंह सांसद बने।
  • वर्ष 1996, 1998, 1999 व 2004 में हुए चुनाव में यह सीट पर बीजेपी का कब्जा रहा और चारों बार नंदकुमारसिंह चौहान विजयी हुए थे। वर्ष 2009 में 15वें आम चुनाव में यह सीट कांग्रेस के खाते में आ गई। वर्ष 2014 और 2019 में हुए 16-17वें आम चुनाव में नंद कुमार चौहान के जीतने से यह सीट फिर से भाजपा के पाले में गई।