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MP में 'सांसों' के लिए जद्दोजहद:प्रदेश में 86 ऑक्सीजन टैंकर और जरुरत 96 की, अब थाईलैंड से मंगवाए 8 क्रायोजेनिक टैंकर

मध्य प्रदेश2 महीने पहले
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ऑक्सीजन के परिवहन के लिए सरकार ने अब थाईलैंड से 8 क्रायोजेनिक टैंकर मंगवाए हैं। आइनॉक्स एयर प्रॉडक्ट के जरिए यह ऑर्डर दिया गया है। स्वास्थ्य विभाग का दावा है कि इन टैंकरों के माध्यम से देश की करीब 45 से ज्यादा प्लांट से ऑक्सीजन का प्रदेश में परिवहन हो सकेगा।

दरअसल,राज्यों में ऑक्सीजन की मारामारी के बीच केंद्र सरकार से मिले आवंटन के बाद भी मप्र अपने कोटे की करीब 50 से 60 टन ऑक्सीजन सप्लायर कंपनियों से नहीं ला पा रहा। अभी भी टैंकरों की कमी बनी हुई है। मप्र के पास इस समय 86 ऑक्सीजन टैंकर हैं, जबकि 10 टैंकरों की और जरुरत बनी हुई है। ऐसे में सरकार ने 8 क्रायोजेनिक टैंकर का ऑर्डर दिया है, ताकि मध्य प्रदेश अपने कोटे की ऑक्सीजन का परिवहन कर सके। इसके अलावा, केंद्र सरकार 20-20 टन के दो क्रायोजेनिक टैंकर सिंगापुर से मंगवा कर मध्य प्रदेश को दे रही है।

फिलहाल, ऑक्सीजन के लिए बने टास्क फोर्स ने टैंकरों का रोटेशन ऐसा बनाया है, जिससे रिलायंस के जामनगर, लिंडे के भिलाई और राउरकेला, बोकारो, सेल भिलाई, मोदी नगर और हजारी प्लांट में लगातार मध्यप्रदेश के टैंकर ऑक्सीजन भरने के लिए खड़े रहें। कुछ बीच रास्ते में हों और कुछ प्रदेश में ऑक्सीजन खाली करके तुरंत रवाना हो जाएं।

क्रायोजेनिक टैंकर की खासियत

क्रायोजेनिक टैंकर विशेष तकनीक से बनाए जाते हैं, जो कि टैंकर के अंदर की गैस बाहरी तापमान के कारण प्रभावित नहीं होने देते। इनमें लिक्विड ऑक्सीजन, लिक्विड हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, हीलियम आदि का परिवहन किया जा सकता है। ऑक्सीजन को टैंकर में बहुत कम तापमान (माइनस डिग्री) पर रखा जाता है। इसमें दो परतें होती हैं। अंदर वाली परत में लिक्विड ऑक्सीजन होती है। दोनों परतों के बीच निर्वात जैसी स्थिति रखी जाती है, ताकि बाहर के वातावरण की गर्मी गैस तक न पहुंच सके।

कैसे लिक्विड ऑक्सीजन को गैस में बदला जाता है?
लिक्विड ऑक्सीजन को गैस रूप में बदलने के लिए वाष्पीकरण की तकनीक अपनाई जाती है। इसके लिए ऑक्सीजन प्लांट में उपकरण होते हैं। जैसे ही तापमान बढ़ता है, लिक्विड ऑक्सीजन गैस के रूप में बदलने लगती है। इसे सिलेंडर में भरने के लिए प्रेशर तकनीक अपनाई जाती है। छोटे सिलेंडर में कम दबाव और बड़े सिलेंडर में अधिक दबाव से गैस भरी जाती है।

दूसरे राज्यों से आ रही 500 टन ऑक्सीजन
मध्यप्रदेश में अभी 490 से 500 टन ऑक्सीजन दूसरे राज्यों से ला पा रहा है। बाकी जरुरत के ऑक्सीजन के लिए प्रदेश ने स्थानीय स्तर पर ही 92 टन ऑक्सीजन जुटाना शुरू कर दिया है। इसमें 60-70 टन ऑक्सीजन उद्योगों से और बाकी नए ऑक्सीजन प्लांट व कंसंट्रेटर से ली जा रही है। केंद्र ने हाल ही में नाइट्रोजन और दूसरे रसायन ले जाने वाले टैंकरों को मॉडिफाई करके ऑक्सीजन लाने युक्त बनाने की स्वीकृति दी है।

भोपाल को हर दिन चाहिए करीब 130 टन ऑक्सीजन
भोपाल में एक तरफ कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्‍या में कागजों में कमी आ रही है। बावजूद शहर में ऑक्‍सीजन की डिमांड बढ़ती जा रही है। विगत एक सप्‍ताह में ऑक्‍सीजन की मांग 20 मीट्रिक टन ज्‍यादा बढ़ गई है। भोपाल में 110 मीट्रिक टन ऑक्‍सीजन प्रतिदिन खर्च होती है, लेकिन अब इसकी मांग 130 मीट्रिक टन तक पहुंच गई है। इसके अलावा जबलपुर, ग्वालियर और उज्जैन में भी 150 टन ऑक्सीजन की आवश्यकता है।

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