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MP में प्राइवेट स्कूल मनमानी फीस नहीं ले सकते:उच्च न्यायालय ने सरकार से जानकारी मांगी; पूछा फीस रेग्युलेटरी एक्ट को लागू करने के लिए क्या किया

भोपाल8 महीने पहले
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मध्यप्रदेश में प्राइवेट स्कूलों की फीस को लेकर हाई कोर्ट ने सरकार से जानकारी मांगी है। - प्रतीकात्मक फोटो - Dainik Bhaskar
मध्यप्रदेश में प्राइवेट स्कूलों की फीस को लेकर हाई कोर्ट ने सरकार से जानकारी मांगी है। - प्रतीकात्मक फोटो

मध्यप्रदेश में प्राइवेट स्कूलों की फीस को लेकर हाईकोर्ट ने सरकार से जानकारी मांगी है। हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ में सुनवाई हुई। उच्चतम न्यायालय द्वारा निजी स्कूल एसोसिएशन द्वारा लगाई गई याचिका को निरस्त कर दी। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के नवंबर 2020 के आदेश को ही सही माना है और उसके उचित पालन के लिए सभी निजी स्कूलों द्वारा ली जा रही फीस को सार्वजनिक करने का आदेश दिया है।

जागृत पालक संघ मध्यप्रदेश के अध्यक्ष वकील चंचल गुप्ता ने बताया कि जागृत पालक संघ, एसोसिएशन ऑफ अनएडेड प्राइवेट स्कूल और सोसाइटी ऑफ एजुकेशन एंड वेलफेयर एसोसिएशन समिति सागर की याचिकाओं पर मुख्य न्यायाधीश मोहम्मद रफीक साहब और न्यायाधीश विजय कुमार शुक्ला की डबल बेंच के समक्ष याचिकाकर्ताओं ने रखा अपना पक्ष।

स्कूल ने पूरी फीस लेने की छूट मांगी
अध्यक्ष वकील चंचल गुप्ता ने बताया कि स्कूल एसोसिएशन की ओर से उनके अधिवक्ताओं ने मांग रखी कि अब शासन के आदेशानुसार स्कूल खोले जा चुके हैं। उन्हें पहले की तरह पूरी फीस वसूलने और फीस बढ़ाने की छूट मिलनी चाहिए। वे बढ़ी हुई फीस पर सुप्रीम कोर्ट के राजस्थान केस में दिए गए आदेश के अनुसार अधिकतम 15% की छूट अभिभावकों को देने को सहमत हैं। जागृत पालक संघ के एडवोकेट अभिनव मल्होत्रा ने अभिभावकों का पक्ष रखते हुए बताया कि वर्तमान में पेंडेमिक पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। स्कूलों का संचालन पूरी तरह शुरू नहीं हुआ है।

उसके बावजूद कई स्कूलों ने मनमाने तरीके से फीस बढ़ा दी है। साथ ही फीस के कारण बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाई, रिजल्ट और टीसी से वंचित कर रखा है, जो कि न्यायालय द्वारा पारित आदेशों का उल्लंघन है। मध्यप्रदेश में फीस रेग्युलेटरी एक्ट 2018 में लागू हो चुका है। उसके प्रावधानों के पालन में निजी स्कूलों को एक्ट लागू होने के 90 दिनों के अंदर अपनी पिछले वित्तीय वर्षों के ऑडिटेड बेलेंस शीट भी जिला समिति के समक्ष प्रस्तुत करना थी।

उन्होंने और न ही उसके बाद के वर्षों में इसका पालन किया है। एक्ट के अनुसार ली जाने वाली पूरी फीस का मदवार ब्यौरा भी शासन को दिया जाना था। स्कूल द्वारा ली जाने वाली फीस का प्रस्ताव जिला समिति से पारित करवाना था। इन प्रावधानों का पालन अभी तक नहीं हुआ है। जब तक स्कूलों द्वारा फीस रेग्युलेटरी एक्ट के प्रावधानों का पालन नहीं किया जाता है, तब तक निजी स्कूलों को फीस वृद्धि का अधिकार नहीं दिया जा सकता है। वर्तमान में पेंडेमिक की स्थितियों को देखते हुए गत वर्ष के अनुसार ही केवल शिक्षण शुल्क लिए जाने संबंधित व्यवस्था ही जारी रहना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के राजस्थान के केस में दिए गए निर्णय का सवाल पर एडवोकेट मल्होत्रा के तर्कों से सहमत होकर हाईकोर्ट ने शासन को निर्देश दिया है कि फीस रेग्युलेटरी एक्ट को लागू करने के संदर्भ में इंदौर जिले में जो भी कार्यवाही की गई है, उसकी जानकारी 1 हफ्ते में कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करें। याचिका की अगली सुनवाई होने तक न्यायालय द्वारा पूर्व में दिया गया निर्णय ही मान्य होगा, जिसके अनुसार निजी स्कूल केवल शिक्षण शुल्क ही ले सकेंगे। फीस में किसी तरह की वृद्धि नहीं कर सकेंगे और न ही फीस के अभाव में बच्चों को पढ़ाई, परीक्षा या किसी अन्य सुविधा से वंचित करेंगे।

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