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MP में 73% बच्चों में आयरन की कमी:6-8 महीने के 91% बच्चों को नहीं मिलती बैलेंस्ड डाइट, नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे में खुलासा

भोपाल4 महीने पहलेलेखक: ऋचा श्रीवास्तव

मध्यप्रदेश में 6 महीने से 5 साल तक की उम्र के 73% बच्चों में आयरन की कमी है। इस कारण वे एनीमिक है। कारण है कि प्रदेश के 91 % बच्चों को बैलेंस्ड डाइट नहीं मिल पाती। ये चौंकाने वाला खुलासा हाल में आई नेशनल हेल्थ फैमिली सर्वे-5 में हुआ है। इसकी रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में पोषण की कमी से 36% बच्चे स्टंटेड हैं। यानी, ऐज के हिसाब से इनकी हाइट और वेट कम है, जबकि 33% बच्चे अंडर वेट हैं। 19% बच्चे वेस्टेड यानी ऐज के हिसाब से दुबले हैं। 5 साल से कम उम्र के 7% बच्चे गंभीर कुपोषित हैं।

बच्चों की ब्रेस्ट फीडिंग प्रैक्टिस पर NFHS-5 सर्वे में 5 साल से कम उम्र के 13,765 बच्चे शामिल थे। ये रिपोर्ट है नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 की है।

प्रदेश के 36% बच्चों में पोषण की कमी

मध्यप्रदेश में पोषण की कमी से 36% बच्चे स्टंटेड हैं। यानी, ऐज के हिसाब से इन बच्चों की हाइट और वेट कम है, जबकि 33% बच्चे अंडर वेट हैं। 19% बच्चे वेस्टेड यानी ऐज के हिसाब से बेहद दुबले हैं। 5 साल से कम उम्र के 7% बच्चे गंभीर कुपोषण का शिकार हैं। चौंकाने वाली बात ये है कि मध्यप्रदेश में 6 महीने से लेकर 5 साल तक की उम्र के 73% बच्चों में आयरन की कमी है। NFHS-4 में ये आंकड़ा 69% था।

पाया गया कि बच्चों में सबसे ज्यादा आयरन की कमी की समस्या छतरपुर जिले में है। यहां 87.2% बच्चे एनीमिक हैं। इसके बाद खंडवा में 86.6%, हरदा में 85.6%, सागर में 83.3% एनीमिक हैं। सबसे कम एनीमिया 37.8% जबलपुर में, 49.2% अनूपपुर में, और विदिशा 52.2% है।

रिपोर्ट के अनुसार बच्चे में आयरन की कमी का सीधा संबंध मां के एनीमिक होने से है। जिन जिलों में महिलाएं एनीमिक नहीं हैं, वहां बच्चों में आयरन की मात्रा सामान्य है। जबलपुर में 48.9% महिलाओं को एनीमिया है। अनूपपुर में 52.6% महिलाओं को एनीमिया और विदिशा में सबसे कम सिर्फ 38.5% महिलाओं को एनीमिया है, इसलिए इन जिलों में बच्चे ज्यादा स्वस्थ हैं। छतरपुर में 63.5%, खंडवा में 64.8%, हरदा में 62.6% महिलाओं को एनीमिया है। NFHS सर्वे डोर टू डोर सैंपल कलेक्ट करके किया जाता है।

9% बच्चों को ही मिलती है बैलेंस्ड डाइट

जन्म के 6 महीने तक मां का दूध बच्चे के लिए कम्पलीट फूड होता है। इसके बाद मां के दूध या फार्मूला मिल्क के साथ बच्चे की डाइट में किसी भी फॉर्म में जरूरी अनाज, विटामिन A युक्त फूड, फल और सब्जियां, अंडे, नट्स और दाल शामिल करना चहिए। ये बच्चे के लिए कम्पलीट बैलेंस्ड डाइट है। ये नहीं मिलने पर बच्चे डेफिशियेंसी डिजीज यानी पोषण के अभाव से बीमार हो जाते हैं। प्रदेश में 6-8 महीने की उम्र के बीच सिर्फ 38% बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें दूध के साथ जरूरी पोषण मिल पाता है।

WHO के अनुसार, 6-23 महीने के बच्चे को दिन में कम से कम 3 बार सॉलिड फूड देना चाहिए, लेकिन सिर्फ 38% बच्चों को 3 बार सॉलिड फूड मिलता है। 5 जरूरी बेबी फूड अनाज, विटामिन A युक्त फूड, फल और सब्जियां, नट्स और दाल सिर्फ 19% बच्चों को मिलता है, जबकि सिर्फ 9% बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें तय मानकों पर सही भोजन मिलता है। मध्यप्रदेश में 91% बच्चे प्रॉपर बैलेंस्ड मील नहीं मिलती।

रिपोर्ट के मुताबिक जन्म के एक घंटे के अंदर बच्चे को मां का दूध मिल जाना चहिए। इसमें सबसे बेहतर शिवपुरी है। यहां 64% बच्चों को जन्म के 1 घंटे के अंदर मां का दूध मिल जाता है। इसके बाद सिवनी में ये आंकड़ा 59.3%, आगर-मालवा में 59.1%, मुरैना में 57.2%, खंडवा में 57.9% है। सबसे बुरी हालत सतना की है। यहां 17.7%, अनूपपुर में 21.5% और छतरपुर में सिर्फ 22.5 बच्चों को जन्म के एक घंटे के अंदर मां का दूध मिलता है।

रिपोर्ट के मुताबिक जिन जिलों में प्रेग्नेंसी के दौरान मां को पहले तीन महीनों में अच्छी देखभाल और रेगुलर डॉक्टर विजिट मिली, (एंटीनेटल केयर) उन जिलों में ब्रेस्टफीडिंग की दर बेहतर है। सिवनी में 83.7%, मुरैना में 82.5%, शिवपुरी में 75.9%, आगर-मालवा में 70.1% और खंडवा में 65.5% महिलाओं को अच्छी एंटीनेटल केयर मिली। वहीं, सतना में 51.5 %, अनूपपुर में 60.2%, और छतरपुर में 36.5% महिलाओं को एंटीनेटल केयर मिली। बच्चों की ब्रेस्ट फीडिंग प्रैक्टिस पर NFHS-5 सर्वे में 5 साल से कम उम्र के 13,765 बच्चे शामिल थे।

1000 में से 41 बच्चे जी नहीं पाते

NFHS-5 के मुताबिक, 5 साल की उम्र से कम 1000 बच्चों में 41 बच्चे सही पोषण के अभाव से मौत का शिकार हो जाते हैं। ये आंकड़ा NFHS-4 में 1000 में से 51, NFHS-3 में 1000 में 70 और NFHS-2 में 1000 में से 88 बच्चों की मौत का था। WHO के अनुसार, जन्म के पहले 3 दिन तक बच्चे को मां के दूध के अलावा और कुछ भी नहीं देना चाहिए। 12% बच्चों को मां के दूध से सिवा कोई और लिक्विड भी दिया जाता है, जिससे बच्चे को इन्फेक्शन का खतरा बढ़ जाता है।

अब एक्सपर्ट से जानते हैं कि ब्रेस्ट फीडिंग क्यों है जरूरी...

ब्रेस्टफेड बच्चे करते हैं टेस्ट में बेहतर स्कोर

वरिष्ठ शिशुरोग विशेषज्ञ और पूर्व संचालक राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन डॉ. पंकज शुक्ला ने बताया कि मां का दूध बच्चे के लिए अमृत होता है। WHO यानी वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार मां का दूध नवजात बच्चे के लिए उपयुक्त भोजन है। मां के पहले गाढ़े दूध को कोलट्रम कहा जाता है। इसमें जीवन रक्षक एंटीबॉडीज होती हैं, जो बच्चे को गंभीर बीमारियों से बचाने का काम करती हैं। WHO ने बच्चे के पैदा होने के एक घंटे के अंदर आवश्यक रूप से स्तनपान करने की सलाह दी है। जन्म से शुरुआती 6 महीने तक बच्चे को सिर्फ मां का दूध पिलाना चाहिए। हालांकि, दुनिया भर में हर 5 में से 3 नवजात बच्चों को पैदा होने के 1 घंटे के अंदर जरूरी मदर मिल्क नहीं मिल पाता।

ब्रेस्टफीडिंग से कम होता है कैंसर का खतरा

डॉ. पंकज शुक्ला कहते हैं कि ब्रेस्ट फीडिंग सिर्फ बच्चे के लिए ही नहीं, मां के लिए भी फायदेमंद है। ब्रेस्टफीडिंग न कराने वाली मांओं की तुलना में ब्रेस्टफीडिंग कराने वाली मांओं को ब्रेस्ट और ओवेरियन कैंसर का खतरा 2 से 3 गुना तक कम हो जाता है।

NFHS-5 (2019-21) के सर्वे के लिए मध्यप्रदेश के 47,493 परिवारों के सदस्यों के घर जाकर सैंपल कलेक्ट किया गया। इनमें 10,478 अर्बन और 37,015 ग्रामीण क्षेत्रों के परिवारों से इंटरव्यू और सैम्पल कलेक्ट किया गया। इन परिवारों की 48,410 महिलाएं और 7,025 पुरुष शामिल थे।