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उपचुनाव में पॉवर गेम:सत्ता नहीं इमेज का सवाल; खंडवा सहित 3 सीट जीतकर शिवराज की लोकप्रियता बरकरार, इलेक्शन मैनेजमेंट में कमजोर साबित हुए कमलनाथ

मध्य प्रदेशएक वर्ष पहलेलेखक: राजेश शर्मा
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बार-बार सवाल उठाने वालों को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने चुनावी नतीजों से जवाब दे दिया। दूसरी तरफ कमलनाथ चुनाव मैनेजमेंट में फेल हो गए। इससे पार्टी में उनके खिलाफ स्वर उठ सकते हैं, इस आशंका ने जन्म लिया है। पूरे चुनाव में कमलनाथ ने दमोह मॉडल पर दांव खेला, लेकिन शिवराज ने जनता के बीच जाकर सीधे संवाद करने पर ही भरोसा किया।

दलित के घर खाना खाया तो आदिवासी के घर विश्राम किया

शिवराज ने जातीय समीकरण को ध्यान में रखकर प्रचार किया। उन्होंने दलित के घर खाना खाया, तो आदिवासी के घर रात्रि विश्राम किया। इतना ही नहीं, मतदान के बाद छतरपुर में एक कुम्हार के घर दिए बनाकर संदेश दिया कि केवल बीजेपी ही सर्वहारा को साथ लेकर चलने वाली पार्टी है।

आदिवासी वोट बैंक वापस आने से केंद्र का भरोसा बढ़ेगा

शिवराज के लिए यह चुनाव इस लिहाज से भी फायदेमंद रहा, क्योंकि वे आदिवासी वोट बैंक को बीजेपी की तरफ मोड़ने में काफी हद तक सफल हुए। इससे केंद्रीय नेतृत्व का भरोसा उनके प्रति बढ़ेगा। बता दें कि 15 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनजातीय दिवस पर भोपाल में होने वाले आयोजन में शिरकत करेंगे।

खंडवा की जीत शिवराज के लिए सबसे अहम

खंडवा लोकसभा सीट जीत शिवराज के लिए अहम है। यहां से 25 साल बाद ओबीसी कार्ड खेलकर ज्ञानेश्वर पाटिल पर दांव लगाया था। इस सीट पर पाटिल की लीड भले ही कम हो गई, लेकिन बुरहानपुर में पिछले चुनाव की तुलना में नंद कुमार सिंह चौहान से (14 हजार वोट) ज्यादा वोट लेकर यह साबित करने में सफलता मिली कि बीजेपी का वोट बैंक बढ़ा है। नंदकुमार को यहां से कभी भी 10 हजार से ज्यादा लीड नहीं मिली।

निगम-मंडल में नियुक्ति में शिवराज का प्रभाव दिखेगा

निगम-मंडलों में राजनीतिक नियुक्तियों के लिए उपचुनाव होने का इंतजार किया जा रहा था। अब जिस तरह से बीजेपी के पक्ष में परिणाम आए हैं, उससे साफ है कि इन नियुक्तियों में शिवराज का प्रभाव ज्यादा दिखेगा। पहले मंत्रिमंडल विस्तार हो या संगठन में नियुक्तियां, शिवराज के समर्थकों को ज्यादा तवज्जो नहीं मिली थी।

सिंधिया फैक्टर भी आया काम

जिस तरह से उपचुनाव के रुझान और परिणाम दिख रहे हैं, उससे यह साफ हो गया है कि कहीं न कहीं बीजेपी के साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया का जुड़ना फायदेमंद रहा। पहले के उपचुनाव में भी देखा गया कि सिंधिया फैक्टर काफी प्रभावशाली रहा था। इस बार के चुनाव में भी जो सिंधिया के समर्थक थे, उन्होंने बीजेपी को वोट दिया और इसका फायदा हुआ। जोबट में सुलोचना रावत को कांग्रेस से बीजेपी में लाने में सिंधिया की अहम भूमिका बताई जा रही है। यही वजह है कि उनके कट्‌टर समर्थक मंत्री गोविंद सिंह राजपूत को यहां का चुनाव प्रभारी बनाया गया था। हालांकि, शिवराज ने यहां भी ताकत लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

कमलनाथ का मैनेजमेंट फेल…
सुलोचना रावत को जब कांग्रेस का टिकट नहीं मिला तो उन्होंने बीजेपी का दामन थाम लिया। बीजेपी ने उन पर भरोसा किया और उन्हें टिकट दिया. बीजेपी के भरोसे पर सुलोचना रावत खरी उतरीं और उन्होंने कांग्रेस के महेश पटेल को हरा दिया। कमलनाथ को चुनावी मैनेजमेंट का गुरु कहा जाता है, लेकिन उनका यह मैनेजमेंट उपचुनाव में फेल हो गया। कांग्रेस दावा कर रही थी कि भले उनके खेमे से सुलोचना रावत बीजेपी में शामिल हो गई हों, लेकिन जीत उनकी ही होगी।

कांग्रेस के लिए एक चेतावनी

मध्य प्रदेश उपचुनाव के परिणाम कांग्रेस के लिए एक चेतावनी की तरह हैं। कांग्रेस जिस तरह से मांग रही थी कि कोरोना और महंगाई के कारण जनता बीजेपी से नाराज है और वह उसे वोट नहीं देगी। अब जिस तरह से उपचुनाव के परिणाम आए हैं, वह कांग्रेस के लिए एक झटका के साथ-साथ सबक भी है। साथ ही साथ कांग्रेस के लिए अपने नेताओं को एकजुट रखने का भी सबक है, क्योंकि कहीं न कहीं बीजेपी की जीत में सिंधिया फैक्टर भी कारण बना है।

..लेकिन विंध्य में ताकतवर होगे अजय सिंह

पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह के प्रभाव वाले विंध्य अंचल में 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को अत्यधिक निराशा हाथ लगी थी। इस लिहाज से रैगांव में कांग्रेस की जीत के कई मायने हैं। इससे अजय सिंह इलाके में फिर ताकतवार हो जाएंगे। रैगांव सीट जीतने की जिम्मेदारी अजय सिंह के ही पास थी। यह बीजेपी की मजबूत पकड़ की सीट मानी जाती रही है और कांग्रेस यहां पर बसपा के कारण अक्सर चुनाव हारती रही है। उप चुनाव में बसपा उम्मीदवार के न होने से भाजपा-कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला रहा और कांग्रेस ने जीत दर्ज कर ली।

सभाओं में शिवराज का रिकार्ड

शिवराज ने चार सीटों पर सबसे अधिक रिकार्ड 39 सभाएं की। इसका परिणाम है कि पृथ्वीपुर सीट बीजेपी छीनने में कामयाब हो गई। उन्होंने यहां सबसे अधिक 8 सभाएं की। इतना ही नहीं, शिवराज ने पांच स्थानों पर रात्रि विश्राम किया। इसमें जोबट, रैगांव खंडवा,बुरहानपुर और पृथ्वीपुर शामिल हैं, जबकि कमलनाथ ने 14 सभाएं की।

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