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कानूनी पेंच में फंस सकते हैं चुनाव:सवाल- जनपद से लेकर सरपंच तक का चुनाव पुराने आरक्षण से, जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए नए सिरे से आरक्षण क्यों?

मध्य प्रदेश7 महीने पहले

मध्यप्रदेश में त्रि-स्तरीय पंचायत चुनाव की तारीखों का ऐलान होते ही कांग्रेस और बीजेपी ने एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाना शुरू कर दिया है। इस चुनाव की प्रक्रियाओं में विसंगतियों को लेकर जबलपुर, इंदौर और ग्वालियर पीठ में याचिकाएं दायर की गई हैं। सबसे बड़ा सवाल है कि जनपद अध्यक्ष से लेकर सरपंच तक का चुनाव पुराने (2014-15) आरक्षण के आधार पर कराए जा रहे हैं, जबकि जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए नए सिरे से आरक्षण प्रक्रिया 14 दिसंबर को की जाएगी।

प्रदेश में पंचायत चुनाव जनवरी और फरवरी में तीन चरणों में होगा। इसके ऐलान पर कांग्रेस ने हैरानी जाहिर की है। पार्टी के वरिष्ठ नेता विवेक तन्खा ने कहा कि इस मामले को लेकर कोर्ट जाएंगे। दरअसल, चुनाव की तरीखों का ऐलान होने से कुछ घंटे पहले ही हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में पंचायत चुनाव में परिसीमन और आरक्षण को लेकर दायर की गई तीन याचिकाओं पर मुख्य न्यायाधीश रवि मलिमथ व दीपक अग्रवाल की युगलपीठ में सुनवाई हुई थी।

याचिकाकर्ताओं की ओर से प्रदेश के वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा पेश हुए। उन्होंने कहा कि पंचायत राज अधिनियम में संविधान चुनाव को लेकर स्पष्ट उल्लेख है कि हर चुनाव के पहले डिटरमिनेशन और रोटेशन की प्रक्रिया अपनाई जाए, लेकिन सरकार ने हाल ही में राज्यपाल के हवाले से संशोधित अध्यादेश निकाला है। तन्खा ने कोर्ट से कहा कि सरकार चुनावों का ऐलान करने वाली है। लिहाजा, मामले की सुनवाई जल्द होना चाहिए। कोर्ट ने सरकार से 2 सप्ताह में जवाब मांगा है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि चुनाव का ऐलान होता है, तो अदालत का दरवाजा खुला है।

कमलनाथ ने कहा- सरकार चुनाव कराना नहीं चाहती
पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने आरोप लगाया है कि सरकार ही चुनाव नहीं कराना चाहती है। कमलनाथ ने सोशल मीडिया पर लिखा- हम तो पिछले काफी समय से यह मांग कर रहे हैं कि प्रदेश में जल्द नगरीय निकाय व पंचायत के चुनाव हों, लेकिन लगता है कि सरकार इन चुनाव से डरी हुई है। वह चुनाव करवाना नहीं चाहती है, वह चुनाव से भाग रही है।

कमलनाथ ने लिखा कि जब परिसीमन और आरक्षण को लेकर कोर्ट में विभिन्न याचिकाएं लगाई हैं, तो ऐसे में अचानक जल्दबाजी में पंचायत चुनाव की घोषणा समझ से परे है। ऐसा लगता है कि सरकार खुद चुनाव नहीं चाहती। वो चाहती है कि भविष्य में चुनाव पर रोक लग जाए, ताकि कह सकें कि हम तो चुनाव कराना चाहते थे। पता नहीं क्यों वर्ष 2014 के आरक्षण के आधार पर वर्ष 2021-22 में चुनाव करवाए जा रहे हैं? रोटेशन पद्धति से आरक्षण प्रक्रिया के नियम का पालन क्यों नहीं किया जा रहा? लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन क्यों किया जा रहा है?

चुनाव के लिए तैयार बीजेपी
बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा ने कहा कि कांग्रेस ने जो परिसीमन किया था, उसमें व्यापक विसंगतियां थीं। जहां तक आरक्षण की बात है, तो एक नियत समय अवधि के दौरान तक अगर इंप्लीमेंट नहीं होता, तो वह स्वतः खत्म हो जाता है। शायद कांग्रेस को ज्ञान नहीं है। उन्होंने इसके तकनीकी पक्ष में जानने जरूरत ही नहीं समझी। उन्हें तो केवल आरोप लगाना होता है।

उन्होंने कहा कि चुनाव की घोषणा के पहले दिन से ही कांग्रेस को हार का भय सताने लगा है, इसलिए वे इसे असंवैधानिक प्रचारित कर रहे हैं। चुनाव की तारीखों का ऐलान राज्य निर्वाचन आयोग ने किया है, ना कि सरकार या बीजेपी ने। आयोग ने सारे तथ्यों को देखकर घोषणा की है। जो स्वागत योग्य कदम है।

हाईकोर्ट जाएगी कांग्रेस
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा ने पंचायत चुनाव की तारीखों के ऐलान पर आपत्ति जाहिर की है। इसे संवैधानिक प्रक्रिया के खिलाफ बताया है। विवेक तन्खा ने सोशल मीडिया पर लिखा- मध्यप्रदेश में पंचायती राज के चुनाव की घोषणा विचित्र कानूनी परिस्थिति में। कॉन्स्टिट्यूशन प्रक्रिया और प्रावधान की पूर्ण अनदेखी कर प्रदेश सरकार द्वारा पारित अध्यादेश जनता के साथ धोखा। जनता का विश्वास कोर्ट के साथ। कानून द्वारा स्थापित राज का संदेश देना हम सब का दायित्व।

कमलनाथ सरकार का फैसला पलटा था
बता दें कि शिवराज सरकार ने कमलनाथ सरकार का एक और फैसला पलट दिया है। पंचायत चुनाव की तैयारियों के बीच सरकार ने ऐसी पंचायतों के परिसीमन को निरस्त कर दिया है, जहां बीते एक साल से चुनाव नहीं हुए हैं। सभी जिला, जनपद या ग्राम पंचायतों में पुरानी व्यवस्था ही लागू रहेगी। जो पद, जिस वर्ग के लिए आरक्षित है, वही रहेगा। इसके लिए सरकार ने मध्यप्रदेश पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज (संशोधन) अध्यादेश-2021 लागू कर दिया है। इसकी अधिसूचना 21 नवंबर को जारी की जा चुकी है, जिसके आधार पर ही चुनाव का ऐलान हुआ है।

पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अधिकारियों ने बताया कि पंचायतों को परिसीमन चुनाव से पूर्व कराए जाने का प्रावधान है। ऐसी पंचायतें, जहां परिसीमन तो हो गया, लेकिन उसके प्रकाशन से एक साल के भीतर चुनाव नहीं कराए गए हैं, तो उक्त परिसीमन को निरस्त माना जाएगा। इससे ठीक वैसी ही व्यवस्था लागू हो जाएगी, जो परिसीमन के पहले थी। आरक्षण भी वैसा ही रहेगा, जैसा पूर्व में था। यह व्यवस्था उन पंचायतों में लागू नहीं होगी, जिसके क्षेत्र किसी नगरीय क्षेत्र में सम्मिलित किए गए हैं।

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