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भास्कर एक्सक्लूसिवकूनो में गुमसुम नामीबिया से आए चीते:जगह बदलने से दिख रही टेंशन; एक महीने रखा जाएगा शिकार से दूर

कूनो से राजेश शर्मा17 दिन पहले

कूनो-पालपुर नेशनल पार्क में नामीबिया से लाए गए 8 चीते 48 घंटे बीत जाने के बाद भी थोड़े तनाव में हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब इन्हें बाड़े में छोड़ा था, उसके एक घंटे तक डरे-सहमे रहे। नामीबिया से टीम के साथ आए प्रीटोरिया यूनिवर्सिटी में वन्यजीव चिकित्सा विशेषज्ञ एड्रियन टॉर्डिफे ने बताया कि चीते तनाव में हैं, लेकिन इच्छाशक्ति से जल्द ही अनुकूल हो जाएंगे। नामीबिया में हमने चीतों को उनके परिचित माहौल से निकालने पर कई दिनों तक काम किया, लेकिन नए माहौल में ढलने में वक्त लगता है।

इंसानों की नजदीकी और पिजरों की वजह से तनाव
विशेषज्ञ कहते हैं कि जंगली चीतों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना काफी चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि चीते इंसानों की नजदीकी और पिंजरों की वजह से तनाव में आ जाते हैं। मप्र के पीसीसीएफ (प्रधान मुख्य वन संरक्षक) जेएस चौहान ने बताया कि इतनी लंबी यात्रा के बाद चीते तनाव में थे। जब उन्हें बाड़े में छोड़ा गया तो उनका व्यवहार सामान्य दिखाई दिया। एक महीने में वे माहौल में ढल जाएंगे। चीतों को एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप में शिफ्ट करना एक बड़ी घटना है।

कूनो नेशनल पार्क में छांव में आराम करता चीता।
कूनो नेशनल पार्क में छांव में आराम करता चीता।

सैटेलाइट कॉलर से ईमेल पर मिलेगी चीतों की जानकारी
हर चीते को ट्रैक किया जाएगा। हर चीते के लिए एक टीम बनाई गई है। सभी को सैटेलाइट कॉलर लगाया गया है। इससे चीतों की गतिविधियों की जानकारी ईमेल पर मिलेगी। बता दें कि नामीबिया से कूनो तक 9 हजार किलोमीटर सफर के दौरान वे करीब 10 घंटे तक पिंजरे में रहे। नामीबिया से भारत लाने के दौरान चीतों को खाली पेट रखा गया था।

हर रोज डेढ़ किलो मीट परोसा जा रहा
1.15 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल वाले कूनो नेशनल पार्क में छोड़े जाने से पहले पांच-छह साल की उम्र वाले इन चीतों को करीब एक महीने तक इस क्वारैंटाइन जोन में ही रखा जाएगा, जिससे वे इस बदली हुई आबोहवा के आदी हो सकें। पीसीसीएफ चौहान के बताया कि रविवार शाम 4:30 बजे प्रोटोकॉल के हिसाब से चीतों को पेट भरने के लिए भैंसे का मीट दिया गया। हर चीते को एक दिन के हिसाब से औसत डेढ़ किलो मांस दिया जा रहा है।

1 घंटे तक डरे-सहमे थे चीते
वन विभाग के एक अफसर के मुताबिक चीते बाड़े में छोड़े जाने के बाद करीब 1 घंटे तक डरे-सहमे थे। हो सकता है ऐसा थकान की वजह से हुआ हो, क्योंकि नामीबिया से कूनो तक 9 हजार किलोमीटर के सफर के दौरान चीते करीब 10 घंटे तक पिंजरे में रहे।

एक महीने तक एक्सपर्ट की निगरानी में रहेंगे
अफ्रीका से आए चीता कंजर्वेशन फंड (सीसीएफ) के एक्सपर्ट कूनो में चीतों की मॉनिटरिंग कर रहे हैं। ये एक्सपर्ट करीब एक महीने तक चीतों को अपने ऑब्जर्वेशन में रखेंगे। इसके बाद ही वे चीतों को औपचारिक तौर पर कूनो प्रबंधन के हवाले करेंगे। अफ्रीका से आए दो वन्य प्राणी चिकित्सक और दो चीतों के जानकार कूनो में हैं। वे तब वापस जाएंगे, जब दूसरी टीम यहां पहुंचेगी। भारतीय पशु चिकित्सक अफ्रीकी एक्सपर्ट के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।

24 घंटे हर चीते पर नजर
चीतों के बाड़ों में सीसीटीवी लगाए गए हैं। जिससे उनकी निगरानी की जा रही है। बाड़े के पास ही एक छोटा कंट्रोल रूम बनाया गया है। जिसमें 24 घंटे वन विभाग के अधिकारियों की शिफ्ट में डयूटी लगाई गई है।

2 सप्ताह से जंगल में कर्मचारी, बाहर आने पर पाबंदी
कूनो में चीतों को बसाने के लिए पिछले डेढ़ महीने से वन विभाग का अमला तैयारियों में लगा रहा। जब यह तय हो गया कि 17 सितंबर को अफ्रीकी चीते कूनो लाए जाएंगे, तब से (6 सितंबर) डयूटी पर तैनात रेंजर-डिप्टी रेंजर सहित करीब 30 अधिकारी-कर्मचारी जंगल में ही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आगमन से चार दिन पहले से उन्हें जंगल से बाहर जाने पर पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया था।

मादा चीतों के लिए अलग बाड़ा
एक्सपर्ट्स के मुताबिक मादा के मुकाबले नर चीते, अपना दोस्ती वाला गैंग बना लेते हैं। एक झुंड में चार-पांच चीते होते हैं। ज्यादातर तो भाई ही होते हैं। यानी एक ही मां-बाप की औलाद, मगर कई बार झुंड में बाहर के सदस्य भी आ जाते हैं।

मादा चीते की जिंदगी बड़ी चुनौती भरी रहती है। उसे औसतन नौ बच्चों को अकेले ही पालना पड़ता है। इसका मतलब ये हुआ कि उसे हर दूसरे दिन शिकार करना ही होगा। वरना वो बच्चों का पेट कैसे भर पाएगी? शिकार के दौरान उसे अपने बच्चों की निगरानी भी करनी पड़ती है, ताकि उन्हें खतरनाक जानवरों से बचाया जा सके। छोटे बच्चों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना भी मादा चीता के लिए चुनौती होती है।

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नामीबिया से कम नहीं कूनो का जंगल

प्रोजेक्ट चीता के प्रमुख एसपी यादव ने बताया, कूनो नेशनल पार्क में बड़े-बड़े घास के मैदान हैं। छोटी-छोटी पहाड़िया भी हैं। ये इलाका चीतों के लिए बहुत सूटेबल है। यहां जानवरों की सेफ्टी के पूरे इंतजाम हैं। यहां पेट्रोलिंग, अच्छी प्रजाति की घास उगाने के लिए कई साल से काम किया जा रहा है। यहां स्पॉटेड डियर और ऐसे दूसरे जानवर व पक्षी (जो जमीन पर रहते हैं) भी हैं, जिनका चीता शिकार कर सकते हैं, यानी चीतों के लिए यहां भोजन की कोई दिक्कत नहीं है।

चीता प्रमुख के मुताबिक, कुल मिलाकर कूनो का कम्पेरिजन हम नामीबिया या साउथ अफ्रीका के जंगलों से करते हैं, तो हम उनसे कहीं भी कम नहीं हैं। कूनो का ड्रोन VIDEO देखने के लिए यहां क्लिक करें...

नामीबिया से आए चीतों के 'शिकार' पर सवाल

देश में लुप्त हुए चीतों को दोबारा मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में बसाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। इन 8 चीतों का शिकार बनने के लिए मध्यप्रदेश के राजगढ़ वन मंडल से 181 चीतल कूनो भेजे गए। इस फैसले से वन्यजीव रक्षा के लिए पहचान रखने वाला बिश्नोई समाज आहत है। समाज ने PM को लेटर लिखकर पूछा है- क्या यह कोई स्थापित तथ्य है कि चीता प्रकृति के लिए जरूरी है और चीतल नहीं। यहां क्लिक करें...

देश की सरजमीं पर 8 चीते, PM मोदी ने कूनो में छोड़े

भारत का 70 साल का इंतजार शनिवार को खत्म हो गया। नामीबिया से आए 8 चीतों ने देश की सरजमीं पर पहला कदम रखा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कूनो नेशनल पार्क में बॉक्स खोलकर 2 चीतों को क्वारंटीन बाड़े में छोड़ा। उन्होंने चीतों के फोटो भी क्लिक किए। चीतों को छोड़े जाने के बाद एक घंटे तक वे डरे सहमे नजर आए। यहां क्लिक करें।

प्रधानमंत्री मोदी को जन्मदिन का तोहफा

70 साल बाद देश फिर चीतों से आबाद हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार सुबह अपने जन्मदिन पर श्योपुर जिले के कूनो नेशनल पार्क में अफ्रीका के नामीबिया से लाए गए 8 में से 2 चीतों को विशेष बाड़े में छोड़ा। इनमें 5 मादा और 3 नर हैं। नर चीतों की उम्र साढ़े 5 साल है। मादा चीतों में दो 5-5 साल तो बाकी 2 साल, ढाई साल और 4 साल की हैं। यहां क्लिक करें।

अफ्रीका के जंगल जैसी घास, कूनो को बनाती है खास

कूनो पालपुर नेशनल पार्क में चीतों के आने के बाद यहां टूरिज्म की बढ़ती संभावनाओं पर भी चर्चा होने लगी है। इसकी वजह भी है- श्योपुर जिले में विंध्याचल पर्वत श्रृंखला की खूबसूरती के बीच कूनो में वे तमाम खासियत मौजूद हैं जो टूरिस्ट को यहां ले आती हैं। वन्यजीवन से भरपूर कूनो में घास के मैदान हैं, यह ठीक वैसे ही है, जैसे अफ्रीका के जंगलों में होते हैं। यहां क्लिक करें।

बिल्ली के जैसे गुर्राता और मिमियाता है चीता

देश में 70 साल बाद चीतों की वापसी हुई है। शनिवार को नामीबिया से 8 चीते भारत पहुंचे हैं। शेर को दहाड़ते और टाइगर को गरजते हुए आपने कई बार सुना होगा, पर चीतों की आवाज कैसी होती है, ये कम ही लोगों को ही पता होगा। नामीबिया से कूनो पहुंचे एक चीते की आवाज को इस वीडियो में सुनिए- यहां क्लिक करें।

50 साल पहले लिखी गई चीते लाने की स्क्रिप्ट

चीता प्रोजेक्ट के पीछे मप्र कैडर के 1961 बैच के आईएएस अफसर एमके रंजीत सिंह की 50 साल की मेहनत है। उन्होंने 1972 में भारत को फिर से चीतों का घर बनाने का आइडिया सबसे पहले दिया और इस प्रोजेक्ट का ड्राफ्ट तैयार किया था। तब ईरानी चीतों को लाने का एग्रीमेंट इस शर्त के साथ हुआ था कि भारत उन्हें लायन देगा। यहां क्लिक करें।