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नादानी:कम बारिश से खोड़ाना तालाब आधा भरा, खेती के लिए वह भी बहा दिया, अब होगा जलसंकट

जावराएक महीने पहले
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  • जलसंकट से निपटने के लिए हर साल खर्च करेंगे लाखों रुपए, पानी बचाने के लिए नहीं दे रहे 8 करोड़ मुआवजा

रतलाम-मंदसौर जिले की सीमा पर स्थित निम्मजित खोड़ाना तालाब इस बार कम बारिश के कारण आधा ही भरा था। हर साल खेती के लिए इसका पानी बहा दिया जाता है क्योंकि डूब प्रभावित किसानों को सरकार मुआवजा नहीं दे पा रही है। जिस वर्ष कम बारिश से जलसंकट की स्थिति रहती है, उस वर्ष शासन-प्रशासन चाहे तो पानी व्यर्थ बहाने से रोक सकता है। 15 साल पहले मंदसौर के तत्कालीन कलेक्टर ने ऐसी पहल की थी और जलसंकट से राहत मिली थी। इस बार रविवार को तालाब के गेट खोल दिए और जो आधा-अधूरा पानी भरा था, वह भी बहना शुरू हो गया इसलिए गर्मी में जलसंकट झेलना ही होगा। विडंबना ये है कि जलसंकट से निपटने के लिए यही शासन, प्रशासन लाखों रुपए खर्च करता है। साल-दर-साल ये राशि जोड़ें तो करोड़ों में पहुंच जाएगी और जिम्मेदार हैं कि किसानों को 8 करोड़ मुआवजा नहीं दे पा रहे। वरना समस्या का स्थायी हल हो जाए। जलसंकट भी नहीं रहे। ग्राम खोड़ाना के पास करीब 1200 बीघा क्षेत्रफल में 106 साल पुराना तालाब है। इसमें रतलाम व मंदसौर जिले के करीब 152 किसानों की भूमि डूब में गई हुई है। इन किसानों को मुआवजा मिल जाए तो ये किसान दूसरी जगह भूमि खरीद लेंगे और तालाब को खाली नहीं करेंगे। अभी इन्हें मुआवजा नहीं मिला इसलिए ये रबी सीजन में तालाब खाली करके यहां खेती करते आ रहे हैं। एक तरफ शासन, प्रशासन बारिश के पानी को सहेजने की बात करता है। नए स्त्रोत बनाने के लिए लाखों-करोड़ों रुपए खर्च कर रहा है लेकिन वर्षों पुराने खोड़ाना तालाब को पानी सहेज नहीं पा रहे। ये ना केवल क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों की नाकामी का सबूत है बल्कि अफसरों के गैर जिम्मेदाराना रवैये का परिणाम भी है। बरखेड़ी के किसान गाैरीशंकर जोशी, नारायण पटेल ने कहा कि इस बार क्षेत्र के सारे तालाब खाली हैं। ऐसे में खोड़ाना का पानी रोका जाना चाहिए।

15 साल पहले पानी रोक दिया था तो अब क्यों नहीं

वैसे तो सालों से रतलाम मंदसौर के अफसर एक ही रट्‌टा लगाए बैठे हैं कि मुआवजा नहीं बंटा इसलिए पानी बहाना पड़ रहा है और हम कुछ नहीं कर सकते हैं। 15 साल पहले जब जलसंकट की स्थिति थी तो तत्कालीन मंदसौर कलेक्टर हीरालाल त्रिवेदी ने तालाब के गेट खोलने पर पाबंदी लगा दी थी और किसानों को समझाइश देकर बीच का रास्ता निकाला था। इसका फायदा हुआ कि तब जलसंकट नहीं रहा। इस बार भी रतलाम-मंदसाैर से लगी सीमा क्षेत्र में कम बारिश हुई इसलिए तालाब भी अधूरा भरा। स्पष्ट है कि जलसंकट आएगा। ऐसे में मौजूदा प्रशासन को तालाब का पानी बचाने के प्रयास करना थे जो नहीं किए। मंदसौर जल संसाधन विभाग के इंजीनियर एसके वाघेला का कहना है सितंबर में ही जल उपयोगिता समिति की बैठक में जिले के सभी निम्मजित तालाब का पानी रबी सीजन के लिए खाली करने का निर्णय हो चुका था। इसलिए खोड़ाना के गेट भी खोल दिए। इसका पानी सहेजने संबंधी अलग से ना आदेश हैं ना ही निर्णय हुआ।

एक बार राशि स्वीकृत होकर वापस चली गई तो क्या दोबारा नहीं आएगी
2007 में तत्कालीन विधायक डॉ. राजेंद्र पांडेय के प्रयासों से 8 करोड़ 29 लाख रुपए का मुआवजा स्वीकृत हो गया था लेकिन अफसरों की लापरवाही से इसलिए नहीं बंट सका क्योंकि मुआवजे की गणना तकनीकी आधार पर सही नहीं थी। बाद में पैसा वापस सरेंडर हो गया। जब उस वक्त राशि आ सकती थी तो क्या वापस ये स्वीकृति नहीं मिल सकती। वास्तव में रतलाम व मंदसौर क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों ने इसके लिए उस स्तर के प्रयास नहीं किए कि सरकार को विचार करना पड़े। मामले में जावरा विधायक डॉ. पांडेय का कहना है कि मैंने 2007 में मुआवजा स्वीकृत करवा दिया था और अब फिर से पूर्ण प्रयासरत हूं।​​​​​​​

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