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हमारे अंदर प्रसन्न रहने की क्षमता है:भव चाहे बिगड़ जाए लेकिन भाषा नहीं बिगड़नी चाहिए : डॉ. समकितमुनिजी

जावरा11 दिन पहले
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मन प्रसन्न हाेना यानी स्वयं को बहुत-सी बुराइयों से बचाना। हमारे अंदर प्रसन्न रहने की क्षमता है, जिसके साथ हम रह रहे हैं। भव चाहे बिगड़ जाए पर भाषा नहीं बिगड़ने दें। सदैव समभाव रखना चाहिए। समभाव में रहने वाला सदैव चैतन्य रहता है। यह बात आगमज्ञाता डॉ. समकितमुनिजी आदि ठाणा 2 ने दिवाकर भवन में धर्मसभा दौरान कही। उनके साथ कुशल प्रेरक भवान्तमुनिजी भी विराजित है। गुरुदेव का आगामी चातुर्मास खातर महल चित्तौड़गढ़ में होगा। श्रीसंघ अध्यक्ष इंदरमल टुकड़िया, महामंत्री कनकमल चौरड़िया, कोषाध्यक्ष महावीर छाजेड़, परामर्शदाता राजमल खारीवाल, शांतिलाल डांगी, बसंतीलाल चपड़ोद, सुशील मेहता, महेंद्र कोचट्‌टा, अनिल चत्तर, सुभाष चौरड़िया, धनसुख चौरड़िया, सुजानमल ओरा, बाबूलाल भटेवरा, राकेश मेहता आदि मौजूद थे।

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