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संदेश:संतुलित मस्तिष्क ही स्वस्थ चिंतन व स्थिर निर्णय लेता है : विजयराजजी

मंदसौर6 महीने पहले
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  • शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में अपने मंगल संदेश में जैनाचार्यजी कहा

हर व्यक्ति की चाह बहुमुखी विकास की होती है, उसके लिए उसे उसी राह पर चलना अनिवार्य है। इसमें संतुलित मस्तिष्क का महत्वपूर्ण योगदान हाेता है। इसके अभाव में न स्वस्थ चिंतन की धारा प्रवाहित होती है और न स्थिर निर्णय हो पाता है। संतुलित मस्तिष्क ही स्वस्थ चिंतन और स्थिर निर्णय ले पाता है, ये दोनों विकास के मेरूदंड होते हैं। इसके बिना विकास की समस्त कल्पनाएं त्रिशंकु की तरह अधर में ही झूलती रहती हैं। बौद्धिक जगत में असंतुलन की समस्या बहुत बड़ी व विकराल होती जा रही है। असंतुलित मस्तिष्क के कारण ही व्यक्ति तनावग्रस्त रहता है। ध्यान व साधना में वह शक्ति है जो व्यक्ति को तनावों से मुक्ति दिलाती है। यह बात मंगलवार को जैनाचार्य विजयराजजी महाराज ने शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में मंगल संदेश में प्रसारित किए। उन्होंने कहा असंतुलित दिमाग समस्याओं के उत्पादन की फैक्टरी बन जाता है। असंतुलित दिमाग वाले न किसी को अपना आत्मीय बना सकते है और न कोई उनका आत्मीय बनना चाहता है। परिणाम स्वरूप वे प्रगति के सुनहरे अवसरों से वंचित हो जाते हैं। वे अपना सारा समय असंतोष, अशांति, व्यग्रता और भ्रांतियों में गुजार देते हैं। एक समस्या अनेक समस्याओं को उत्पन्न करने वाली बन जाती है। आचार्यश्री ने कहा कि कभी-कभी व्यक्ति के जीवन में कुछ ऐसी अवांछित परिस्थितियां आ जाती हैं जो मस्तिष्क को तीव्र वेग से झकझोरती है। उस समय जो व्यक्ति संतुलन खो देता है वह अपने व्यक्तित्व वृक्ष के लिए पतझड़ का काम करता है। वहीं अगर वह थोड़ा-सा धैर्य, साहस और समझदारी रख लेता है तो परिस्थितियों का आंधी-तूफान निकल जाता है। ऐसे व्यक्ति विरले होते हैं जो अप्रिय परिस्थितियों का विषपान पीकर शंकर बनना जानते हैं। परिस्थितियों में अपना संतुलन न खोना अपने हाथ की बात है, जो संतुलन रख लेते हैं वे ही धैर्य की साधना में प्रगतिशील हो जाते हैं। विकास की बुनियाद में धैर्य, साहस, आत्म-विश्वास और उत्साह का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। यह बात निश्चित है, मनचाहा होने पर तो हर कोई संतुष्ट व संतुलित रह लेता है, मन के प्रतिकूल होने पर भी जिसके धैर्य का बांध नहीं टूटता वस्तुतः संतुलित वह होता है। कोविड के चलते हर व्यक्ति को अपना मस्तिष्क शांत, संयत और संतुलित रखना चाहिए। ये परिस्थिति आई है तो चली जाएगी। इसमें अपना धैर्य और संतुलन नहीं खोना है, ऐसा संकल्प सभी करेंगे।

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