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कोविड:‘क्रोध मनुष्य की शक्ति भी है और दोष भी, इससे जीवन विकृतियों से भर जाता है’

मंदसौर14 दिन पहले
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  • शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में जैनाचार्य विजयराज महाराज ने कहा

क्रोध भी एक मनोविकार है, प्रायः हर व्यक्ति को यह विकार घेरे रहता है। क्रोध मनुष्य की शक्ति भी है और दोष भी। दूसरों को डराने, धमकाने व अपना प्रभाव दिखाने में वह शक्ति का कार्य करता है तथा स्वयं को अशांत, असंतुलित व अधीर बनाने में दोष का कार्य करता है। क्रोध की शक्ति अपना इष्ट कम अनिष्ट अधिक करती है। इस शक्ति से बढ़कर शक्ति क्षमा व प्रेम की होती है, क्रोध में किसी को जबरन झुकाया जा सकता है, प्रेम व क्षमा में व्यक्ति स्वयं झुकता है। यह बात शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में जैनाचार्य विजयराज महाराज ने शनिवार को प्रसारित अपने मंगल संदेश में कही। उन्होंने कहा कि स्वभाव की विकृति क्रोध है, यह पुरातन संस्कारों का परिणाम है जब तक व्यक्ति अपने क्रोध के औचित्य को सही ठहराता रहेगा तब तक वह क्रोध की विकृति से नहीं बच सकता। क्रोध की विकृति से वही बच सकता है जो इसे दोष, दुर्गुण और दु:ख रूप में मानता है। बाह्य शत्रु जितनी हानि नहीं पहुंचाते उतनी हानि यह क्रोध पहुंचा देता है। क्रोध ऐसा शत्रु है जो भीतर में व्यक्ति को अशांत-असंतुलित बनाता है और बाहर में प्रतिष्ठा व इज्जत को धूल में मिला देता है। यह आत्मघातक भी और परघातक भी है। आचार्यश्री ने कहा कि क्रोध में व्यक्ति का दिल बेचैनी, दिमाग अशांत और देह रूग्ण बन जाता है। यह शारीरिक, मानसिक, आत्मिक तीनों स्तर पर स्वास्थ्य को बिगाड़ता है। इसके साथ पारस्परिक संबंधों पर भी कुठाराघात करता है। इसके रहते तलाक, आत्महत्या जैसी परिस्थितियां निर्मित हो जाती हैं। अशांत चित्त में व्यक्ति न सही ढंग से कार्य कर पाता है और न सम्यग निर्णय ले पाता है। हर समय यह क्रोधाग्नि उसे जलाती रहती है। क्रोध क्षणों में व्यक्ति अपने आपको सही व सर्वश्रेष्ठ मानता है, इसलिए वह किसी की बात को सुनता नहीं वह बस एकतरफा सुनाने में लगा रहता है, इसी से पारस्परिक बैर, विरोध, विद्वेष और विवाद पैदा होते हैं। पीढ़ियों से चले आ रहे संबंध इस क्रोध के क्षणों में टूट जाते हैं, एक बार संबंध टूटते हैं तो परिवार और समाजों का कितना नुकसान होता है, इसका आकलन नहीं हो पाता। आचार्यश्री ने कहा कि क्रोध पर विजय प्राप्त करने के लिए दो बातें अवश्य इस्तेमाल में लानी चाहिए। पहला इसे दोष मानने का पक्का बोध हो, दूसरा क्रोध के अवसर आने पर उससे बचने की सदैव जागरुकता रखना। कोविड के इस संकटकाल में हर मानव को अपने में संकल्प लेना चाहिए, क्रोध के दुष्परिणामों को समझना चाहिए। एक क्षण का क्रोध जिंदगीभर के लिए पश्चाताप छोड़ जाता है। क्रोध की आदत बुरी है जो इस बुरी आदत से बचता है वो शांति, सुकून और आनंद की प्राप्ति करता है।

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