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दोहरी मार:पिछले साल अप्रैल से सितंबर तक 1695 नए मरीज मिले थे, इस बार 675 ही रजिस्टर्ड हुए

मंदसौरएक महीने पहले
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  • पिछले साल अप्रैल से सितंबर तक 62 लोगों की हुई थी मौत, इस बार 18 की जान गई, अब डोर-टू-डोर अभियान चला रहे ताकि ट्रेस हों पेशेंट
  • अप्रैल से अगस्त तक सीबी नाॅट से की गई जांच में 260 नए पॉजिटिव मिले हैं

कोरोना महामारी के दौर में टीबी रोगियों की फजीहत हो गई है। कोरोना और टीबी दोनों में फेफड़े सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। इनमें खांसी-बुखार जैसे लक्षण भी समान हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पेशेंट इस डर से बीमारी छिपा रहे हैं कि कहीं जांच करवाने गए तो कोरोना पॉजिटिव ना निकल जाए। यही कारण है कि अप्रैल से अब तक सिर्फ 675 टीबी मरीज ही ट्रेस हो पाए। पिछले साल सामान्य सर्वे में ही इस अवधि में 1675 से ज्यादा पेशेंट मिले थे।

टीबी यानी क्षय कार्यक्रम के डाटा एंट्री ऑपरेटर वैभव पांडे के मुताबिक कोरोना काल में इस बार कम मरीज ट्रेस हुए हैं। ये कहा जा सकता है कि कुछ लोगों ने बीमारी छिपाई होगी। हालांकि क्षय नियंत्रण कार्यक्रम के तहत नियमित सर्वे चलता रहा और करीब 12 हजार खंखार की जांच की गई। इनमें सीबी-नॉट से जांच में 260 पॉजिटिव मिले हैं। इससे यह पता चलता है कि किस पेशेंट की बीमारी कितनी गंभीर है। उन्हें 6 महीने या 11 महीने दोनों में से कौन-सा डा‌ॅट्स कोर्स देना होगा। इसके अलावा मोबाइल वैन के माध्यम से 453 खंखार की जांच की, जिसमें 6 पॉजिटिव मिले, इसी तरह 27 मरीजों की एक्सरे रिपोर्ट में 4 पाॅजिटिव मिले, वहीं 146 लोगों की स्क्रीनिंग की जिसमें 7 पाॅजिटिव मिले हैं। आंगनवाड़ी व आशा कार्यकर्ता के माध्यम से जो मरीज ट्रेस हो चुके हैं, उन्हें भी घर-घर जाकर समय पर दवाइयां उपलब्ध करवाई जा रही हैं।

एक पेशेंट से सालभर में 10 नए मरीज संक्रमित होते हैं

पीएमटीडी एवं एचआईवी को-ऑर्डिनेटर विपिन सक्सेना के मुताबिक टीबी व कोरोना में काफी अंतर है। कोरोना ज्यादा आक्रामक है जबकि टीबी धीरे-धीरे मरीज को कमजोर करती है। बल्कि खांसी व बुखार यदि तीन सप्ताह से लगातार है तभी उसे टीबी पेशेंट की श्रेणी में मानते हुए जांच होती है। ये जरूर है कि एक टीबी पेशेंट यदि समय पर इलाज नहीं करवाता है तो वह सालभर में 10 नए मरीज संक्रमित कर सकता है। शुरुआती तीन महीने में खंखार में जो टीबी कीटाणु होते हैं, उनकी स्पूटम पॉजिटिविटी तीव्र होने के कारण संपर्क में आने वाले दूसरे व्यक्ति को टीबी होने का खतरा रहता है। इसलिए शुरू के तीन महीने गंभीर पेशेंट काे अस्पताल में रखकर दवाइयां दी जाती हैं ताकि स्पूटम एक्टिविटी पॉजिटिव से निगेटिव में बदलने लगें और वह अन्य किसी को संक्रमित नहीं कर सकता।

अप्रैल से अब तक 18 पेशेंट की मौत हो चुकी- अप्रैल में जब से कोरोना महामारी का खतरा बढ़ा, उसके बाद से अब तक टीबी के इलाजरत 18 पेशेंट की मौत मंदसौर जिले में हुई है। हालांकि पिछले साल इस अवधि में 62 पेशेंट की जान गई थी। इसलिए डेथ रेट में ज्यादा अंतर आया है। जिन लोगों की मौत हुई उसमें टीबी के साथ ही शुगर, ब्लड प्रेशर व हार्ट संबंधी अन्य समस्याएं भी थीं इसलिए जान गई।

सिर्फ 40 फीसदी स्टाफ, डॉक्टर एक भी नहीं- क्षय रोग कार्यक्रम अंतर्गत जिले में सिर्फ 40 फीसदी स्टाफ ही पदस्थ है। विशेष तौर पर जिले में क्षयरोग के लिए एक भी डॉक्टर की नियुक्ति नहीं हुई हैं। हालांकि जल्द से ही टीबी मरीजों की सुविधा के लिए एक्सरे मशीन आने वाली है। अभी केवल सीबी नॉट मशीन है। स्टाफ में एक जिला अधिकारी, एक को-ऑर्डिनेटर, तीन एसटीएस, एक एसटीएलएस, एक डाटा एंट्री ऑपरेटर है।

अधिकारी बोले : कोरोना काल चुनौती भरा रहा है

जिला क्षय अधिकारी डॉ. आरके द्विवेदी ने बताया कोरोनाकाल चुनौती भरा रहा है। इस दौरान स्वास्थ्य विभाग की टीम जब गांव-गांव में स्क्रीनिंग के लिए पहुंची तो लाेग सर्दी-खांसी होने पर सैंपल देने से घबराने लगे। इसके अलावा कई मरीज जिला अस्पताल भी नहीं पहुंचे है। वर्तमान में जिला अस्पताल का टीबी वार्ड खाली पड़ा हुआ है।

20 तक चलेगा सर्वे

डॉ. द्विवेदी ने बताया जिलेभर में 20 सितंबर से 20 अक्टूबर तक टीबी अभियान चलाया जा रहा है। इसके तहत आशा-आंगनवाड़ी कार्यकर्ता डोर-टू-डोर सर्वे करेंेगे। जो मरीज तीन सप्ताह से खांसी से पीड़ित हैं, उससे आश्वस्त करेंगे कि टीबी का इलाज 100 फीसदी संभव है इसलिए डरें नहीं।

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