मुहुर्त / आज देवशयनी एकादशी, 148 दिनों तक नहीं होंगे मांगलिक कार्य

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दैनिक भास्कर

Jul 01, 2020, 04:00 AM IST

मंदसौर. आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। इस दिन से भगवान श्रीविष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं। इसी दिन से चातुर्मास की शुरुआत भी मानी जाती है। मान्यता है कि एकादशी के बाद चार माह तक मांगलिक कार्य नहीं होते हैं। इस बार चातुर्मास में अश्विन मास अधिकमास के रूप में आ रहा है जिसके कारण चातुर्मास की समय अवधि एक माह अधिक होगी।  इस मर्तबा 1 जुलाई से 25 नवंबर तक हरिशयन का समय रहेगा। इस अवधि में विवाह, यज्ञोपवीत व चौरकर्म व सात्विक देव प्रतिष्ठा आदि करना शास्त्रोक्त वर्जित रहता है। मान्यता है कि हरिशयन के बाद पित्त स्वरूप अग्नि की गति शांत हो जाने के कारण शरीरगत शक्ति क्षीण या सो जाती है। इसलिए इन दिनों में कोई भी शुभ कार्य वर्जित माना गया है।
वहीं अन्य मतों के अनुसार चातुर्मास में वर्षा ऋतु के आगमन के साथ विविध प्रकार के कीटाणु अर्थात सूक्ष्म रोग जंतु उत्पन्न हो जाते हैं। जल की बहुलता और सूर्य का प्रकाश भी भूमि पर काफी कम म‍िलता है। इसलिए इस दौरान क‍िसी भी आयोजन-प्रयोजन से बीमारियों और अन्य दिक्कतों के बढ़ने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।

धार्मिक कार्य किए जाते हैं
मान्यताओं के अनुसार जब भगवान विष्णु चार महीनों के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं तब पृथ्वी पर सबसे ज्यादा नकारात्मक शक्तियां हावी हो जाती हैं, इसलिए इन दिनों में  धार्मिक कार्य, पूजा, हवन और जाप किए जाते हैं। चातुर्मास देवशयन के मध्य नियमों में सिर्फ यही कारण है कि आप पूरी तरह से ईश्वर की भक्ति में डूबे रहें, अधिकांश समय ईश्वर की पूजा-अर्चना करें ताकि आत्मबल को मजबूती प्राप्त हो।
देवशयनी एकादशी व्रत का महत्व

पं. कैलाश भट्‌ट ने बताया हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का बहुत ही महत्व है। खास तौर पर जब आषाढ़ महीने की देवशयनी एकादशी आती है। माना जाता है जो भी इस एकादशी का व्रत रखता है और भगवान विष्णु का नाम जपता है उसके सभी तरह के पाप नष्ट हो जाते हैं और हर मनोकामना अवश्य पूरी होती है।

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